भ्रष्टाचार के ‘मुजरिम’ व ‘मुल्जिम’ का फर्क और 16 घंटे में दोबारा सरकार बनाने की क्या है कहानी ?

मात्र 16 घंटे के अंतराल पर दोबारा सीएम बनने की मिसाल शायद भारत में न मिले. अगर मिसाल हो भी तो एक दल छोड़ कर दूसरे दल के साथ सरकार बनाने की पूर्वलिखित और इतना सटीक प्लाॉट तो हरगिज नहीं मिलेगा. पढ़िये नौकरशाही डॉट कॉम के सम्पादक इर्शादुल हक का आलेख.

बिसरे साथी एक हुए

 

शाम छह बजे के करीब गवर्नर को इस्तीफा सौंपना. रात 11 बजे भाजपा के साथ मिटंग करके संसदीय दल का नेता चुना जाना. 12 बजे गवर्नर को बहुमत का पत्र सौंपना. और सुबह 10 बजे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले लेना. इसे नीतीश कुमार की तयशुदा रणनीति मानने से अगर कोई इनकार करता है तो उस पर दया की जरूरत है.

नीतीश ने आज यानी 27 जुलाई 2017 को सुबह दस बजे नयी सरकार के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. सवाल यह है कि 16 घंटे पहले तक भी वह मुख्यमंत्री ही थे. फिर महज अगले 16 घंटे में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद फिर से उस पद पर नये सहयोगी के साथ सरकार बनाने का मतलब है क्या? क्या यह सचमुच भ्रष्टाचार के प्रति उनका जीरो टॉलरेंस है? इसके लिए बहुत उधेड़बुन करने या शोध करने की जरूरत नहीं है. इसको समझने के लिए अदालती भाषा के दो शब्द को पेश करना काफी है. एक शब्द है ‘मुल्जिम’ और दूसरा शब्द है ‘मुजरिम’. मुल्जिम यानी जिस पर इल्जाम लगा हो. आरोपी. मुरिम यानी जिसने जुर्म किया हो और अदालत ने जुर्म साबित कर दिया हो. नीतीश ने 2015 में  भ्रष्टाचार के मुजरिम ( लालू की पार्टी) के साथ सरकार बनाई थी. और 2017 में लालू की पार्टी के मुल्जिम( तेजस्वी यादव) के काण मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया. गोया उन्होंने सजायाफ्ता मुजरिम के साथ सरकार तो बनाई पर महज आरोप लगने के बाद उस दल को सरकार से बेदखल कर दिया.

यह भ्रष्टाचार पर नीतीश के स्टैंड की बस दो शब्दों की परिभाषा है. यह तो हुई परिभाषा और नैतिकता की बात. इन दो शब्दों के आइने में नीतीश की जीरो टालरेंस नीति को समझने के बाद अब यह जानने की जरूरत है कि नीतीश ने उस भाजपा के साथ दोबारा सरकार क्यों बनाई जिसे छोड़ते हुए उन्होंने साफ कहा था- मिट्टी में मिल जाऊंगा पर भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा.

 

 

 

 

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