मकड़ी का जाला और जाले में फंसा सबरी नगर

मकड़ी के जाले में अब तक कीट-पतंगों को छटपटाते-मरते देखा होगा। पर इस जाले में इंसानों को तड़फड़ाते देखा है? महादलितों की एक पूरी बस्ती ही इस जाले में पिछले तीन दशक से फंसी हुई है। यह जाल कानून और नियमों का है। उन्हें इस जाले से निकालने में बिहार की बारह सरकारें नाकाम रहीं। अब जीतन राम मांझी सरकार की बारी है। महादलित जब यहां बसे थे तब राज्य में कांग्रेस की हुकूमत थी। उसके बाद जनता परिवार की सरकारें रहीं।

अजय कुमार, वरिष्‍ठ पत्रकार

 

बात मामूली सी लग सकती है कि यहां के करीब सौ महादलितों को जमीन का परचा तीस साल के बाद भी नहीं मिल सका है। बिहार में ऐसे हजारों महादलित होंगे, जिन्हें वासगीत का परचा नहीं मिला है। लेकिन पटना जिले के सबरी नगर की कहानी दूसरी है। विधानसभा के स्पीकर उदय नाराचण चौधरी ठस तंत्र के सामने लाचार हैं। कहते हैं कि महादलित मुख्यमंत्री के राज में महादलितों को परचा नहीं मिलेगा, तब कब मिलेगा? सबरी नगर की कहानी महादलितों के साथ सिस्टम के अन्यायपूर्ण व्यवहार का दस्तावेज है। चौधरी की अगुवाई में महादलितों को यहां तब बसाया गया था। पटना से सटे दानापुर में सबरी नगर 1984-85 में बसा था। अलग-अलग जगहों के महादलितों को गैर मजरूआ आम जमीन पर बसाया गया था। उसके बाद से शुरू हुई जमीन का परचा पाने की लड़ाई। धरना-प्रदर्शन हुआ। आश्वासन मिलते रहे पर परचा नहीं मिला।

 

अब यह बस्ती शहरी इलाके में शामिल हो गयी। शहरी इलाके में भूमिहीनों को जमीन बंदोबस्त करने का नियम नहीं है। शहरी इलाके में इस इलाके के आते ही उसके भाव आसमान छूने लगे। पैसे वालों की नजर लग गयी। उनकी कोशिश है कि सबरी नगर को वहां से हटा दिया जाये तो चालीस फुट जगह बड़ी गाड़ियों की आवाजाही के लिए निकल जायेगी। शहर के विस्तार ने सबरी नगर की जिंदगी को भारी ऊहापोह में डाल दिया है।  मगर इस ऊहापोह ने सबरी नगर को लड़ने की हिम्मत भी दी है। अरहुल देवी गुस्से में कहती हैं- कोई हमें हटाने आयेगा तो छह ईंच छोटा कर देंगे। मुसहर व अन्य दलित जातियों के बच्चे स्कूल-कॉलेज में पढ़ने लगे हैं। इंटर में पढ़ने वाले दिनेश मांझी का तममताया चेहरा सामने आता है, एक सवाल के साथ। वह कहते हैं- जब सरकार राजीव नगर को रेगुलराइज कर सकती है तो हमें परचा क्यों नहीं मिल सकता? दिनेश अखबारों से राजीव नगर की कहानी मालूम है। राजीव नगर की जमीन सालों पहले सरकार ने अधिग्रहित की थी। मगर वहां अवैध मुहल्ला बस गया। बसने वालों में कई प्रभु वर्ग के लोग हैं।

 

बिहार विधानसभा के स्पीकर उदय नारायण चौधरी कहते हैं- जब महादलितों को यहां बसाने की लड़ाई शुरू हुई थी तब मैं कुछ भी नहीं था। उसके बाद मैं विधायक, मंत्री और स्पीकर बना। लेकिन सबरी नगर के लोगों को अदद परचा नहीं मिल सका। दलित अधिकार मंच के कपिलेश्वर राम बताते हैं- लालू जी के राज में परचा बन गया था। लेकिन ऐन मौके पर उसे नहीं दिया गया। ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। सात अगस्त को स्पीकर ने महादलितों की मीटिंग की और कहा कि अगले सात सितंबर को फिर मीटिंग होगी। अगर परचा नहीं मिला तो मुख्यमंत्री को बुलाऊंगा। मीटिंग में दानापुर के एसडीओ और सीओ ने महादलितों के सामने माइक थामकर उन्हें भरोसा दिलाया कि परचों की फाइल सरकार को भेजेंगे।

 

दानापुर के सीओ कुंदन कुमार कहते हैं- 42 महादलित परिवारों को परचा देने का प्रस्ताव हमने भेजा है। अब सरकार को तय करना है। वैसे, शहरी इलाके में महादलित परिवारों को परचा देने का प्रावधान नहीं है। पर पटना के तत्कालीन कमीश्नर केपी रामैया ने उस प्रावधान को ढीला करते हुए महादलितों को परचा देने का आदेश दिया था। प्रस्ताव गया। मगर वह प्रस्ताव इस निर्देश के साथ लौट गया कि उसमें महिला का नाम बतौर गृह स्वामी को करके भेजा जाये। सीओ कहते हैं कि महादलितों के अलावा ओबीसी के लोग भी बस गये हैं। उन्हें परचा देना सरकार के हाथ में है।

 

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