मधुबनी जल उठा कौन है जिम्मेदार- जनता या नौकरशाही?

इर्शादुल हक
मां ने पैर, नाखुन कपड़े से बेटे को पहचान लिया पर मधुबनी पुलिस ने मां के ममतत्व को झुठला दिया वह भी एक अधीकारी को बचाने के लिए फिर मधुबनी जल उठा. कौन है जिम्मेदार- जनता या नौकरशाही?

वह दुनिया की कौन मां होगी जो अपने जिगर के टुकरे को नहीं पहचान सके. माना की प्रशांत का सर उसके धड़ से अलग था पर उसके हाथ, पैर, नाखुन और कपड़े तो थे जिससे उसकी मां ने अपने बेटे को पहचान लिया था. पर मधुबनी के एसपी सौरभ कुमार ने एक मां के ममतत्व को झुठला दिया.

फिर इसी के बाद मधुबनी जल उठा. क्या इसे प्रशासनिक सूझबूझ कहते हैं?

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मधुबनी पुलिस फायरिंग की असल वजह क्या यही थी कि प्रशांत के साथ उसके स्कूल में पढ़ने वाली लड़की, जिला शिक्षा कार्यक्रम पदाधिकार पजगपति चौधरी की बेटी भी लापता थी. जगपति ने इसका आरोप प्रशांत पर लगाया था. इसके बाद पुलिस ने प्रशांत के दादा को गिरफ्तार कर लिया. जिस परिवार ने अपना जवान बेटा खोया उसके साथ सहानुभूति दिखाने के बजाये उस परिवार के लोगों को हवालात में डाल देना कहां की बुद्धमानी है.

सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि प्रशांत कि हत्या इस रंजिश के कारण तो नहीं हुई क्योंकि जगपति चौधरी की बेटी के साथ उसका प्रेम था. एक अधिकारी को बचाने के लिए पुलिस वालों ने न तो प्रशासनिक दायित्व को निभाया और न ही एक मां की ममता की कद्र की.

अब जबकि मधुबनी जलकर राख हो गया है, इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. अभी तक जो खबरों के पीछे की जो सच्चाई सामने आ रही है उससे यह साफ लग रहा है कि मधुबनी के एसपी, डीएम जिम्मेदार हैं.

यह ठीक है कि सरकार ने इन दोनों को वहां से हटा दिया है पर अब होना यह चाहिए कि इस मामले की जिम्मेदारी तय की जाये और डीएम और एसपी को कानून के शिकंजे में लिया जाये.

प्रशांत की हत्या के बाद मधुबनी का जलना और एक छात्र की पुलिस फायरिंग में मौत होना और कई लोगों का घायल होना प्रशासनिक तंत्र के नाकारेपन से ज्यादा उसकी निरंकुशता, तानाशाही और एक अधिकारी की खातिर जवाबदेही को भुला देने का मामला भी हो सकता है.

सरकार ने इसके लिए सीबीआई जांच का फैसला कर लिया है, यह सराहनीय कदम है. पर अगर डीएम और एसपी की तानाशाही को अगर किसी तरह परदा डालने की कोशिश की गई तो यह दुर्भाग्य होगा.

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