मधुबनी : यादव व मुसलमान के अखाड़े में झंडा बदलने की तैयारी 

मधुबनी में यादव जीत-जीत कर और मुसलमान हार-हार कर थक गये हैं। दरअसल मधुबनी लोकसभा सीट पहली बार 1977 में अस्तित्व में आया था। उससे पहले मधुबनी का कुछ हिस्सा दरभंगा इस्ट और कुछ जयनगर का हिस्सा हुआ करता था। 1957 से अब तक रिकार्ड बताता है कि इस सीट से यादव, मुसलमान और ब्राह्मण ही जीतते रहे हैं। शुरू में एकाध बार मंडल जीते थे। 1996 से मधुबनी सीट यादव और मुसलमानों का अखाड़ा बन गया है। इसकी वजह है कि यहां सबसे ज्यादा वोट यादव और मुसलमानों का ही है। यही दो जातियां हारती और जीतती रही हैं। तीसरा स्थान पर ब्राह्मणों की आबादी है। मधुबनी से चार बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुकुमदेव ना. यादव अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़़ने की घोषणा कर चुके हैं। वैसी स्थिति में सवाल उठने लगा है कि हुकुमदेव यादव के बाद भाजपा किसे उम्मीदवार बनाएगी।

वीरेंद्र यादव के साथ लोकसभा का रणक्षेत्र – 5
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सांसद — हुकुमदेव ना. यादव — भाजपा — यादव
विधान सभा क्षेत्र — विधायक — पार्टी — जाति
हरलाखी — सुधांशु शेखर — रालोसपा — कुशवाहा
बेनीपट्टी — भावना झा — कांग्रेस — ब्राह्मण
विस्फी — मो. फयाज अहमद — राजद — मुसलमान
मधुबनी — समीर महासेठ — राजद — बनिया
केवटी — फराज फातमी — राजद — मुसलमान
जाले — जीवेश कुमार — भाजपा — भूमिहार
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2014 में वोट का गणित
हुकुमदेव ना. यादव — भाजपा — यादव — 358040 (43 फीसदी)
अब्‍दुलबारी सिद्दीकी — राजद — मुसलान — 337505 (40 फीसदी)
गुलाम गौस — जदयू — मुसलमान — 56392 (7 फीसदी)
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सामाजिक समीकरण
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मधुबनी में सबसे ज्यादा वोट मुसलमानों का बताया जाता है। इसमें अंसारी और राइन की संख्या ज्यादा है। मुसलमानों की वोट संख्या तीन लाख से अधिक है, जबकि यादव वोटरों की संख्या भी तीन लाख के आसपास है। ब्राह्मण वोटर की संख्या ढाई लाख के आसपास ही है। अतिपिछड़ी जातियों की काफी आबादी है। मल्लाह और धानुक इसमें सबसे अधिक हैं। बनिया की आबादी भी एक लाख के आसपास होगी। वोटरों की संख्या में अनुसूचित जाति भी करीब दो लाख होंगे।


नये उम्मीदवार की जमीन
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दोनों गठबंधन इस बार नये चेहरे की तलाश कर रहे हैं। भाजपा को भी नया उम्मीदवार चाहिए और राजद को भी। राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी पिछला चुनाव हार चुके हैं। अगले चुनाव को लेकर अभी स्थिति वे स्पष्ट कर नहीं कर सके हैं। इसलिए पार्टी मधुबनी से नये उम्मीदवार के नाम भी तलाश रही है। इसमें प्रमुख उम्मीदवार मधुबनी के राजद विधायक समीर कुमार महासेठ को भी माना जा रहा है। पार्टी का मानना है कि यादव और मुसलमान के साथ वैश्य वोटों का समीकरण बनता है तो भाजपा पर बढ़त आसान हो सकती है। हालांकि केवटी के विधायक फराज फातमी की नजर भी इस सीट पर है। उधर केवटी के पूर्व विधायक और हुकुमदेव नारायण यादव के पुत्र अशोक यादव भाजपा के टिकट के लिए प्रयासरत हैं। हुकुमदेव यादव भी अपने पुत्र को टिकट दिलवाने के इच्छुक हैं। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के पुत्र और पूर्व मंत्री नीतीश मिश्रा भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। हाल ही भाजपा ने संगठन में उन्हें बड़ी जिम्मेवारी दी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि कांग्रेस या राजद का मुसलमान उम्मीदवार होने का लाभ भाजपा को मिल जाता है। वोटों का धार्मिक ध्रुवीकरण का नुकसान राजद व कांग्रेस को उठाना पड़ता है। यदि महागठबंधन किसी गैरमुसलमान को टिकट देता है तो इसका लाभ उसे मिल सकता है।
तीन सीटों का ‘तिरेल’
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मधुबनी, दरभंगा और झंझारपुर तीनों का अंतरसंबंध है। कोई भी पार्टी तीनों सीटों पर टिकट बंटवारे में सामाजिक समीकरण का विशेष ध्यान रखती हैं। झंझारपुर से इस बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव चुनाव लड़ना चाहते हैं। यदि समाजवादी पार्टी और राजद में तालमेल होता है तो झंझारपुर सपा के कोटे में जा सकता है। यदि मधुबनी में राजद मुसलमान की जगह किसी और जाति को उम्मीदवार बनाना चाहता है तो समीर कुमार महासेठ को पार्टी प्राथमिकता दे सकती है। हालांकि इसके अलावा भी कई दावेदारी बांह चढ़ा कर मैदान में घुम रहे हैं। अंतिम समय में अब्दुलबारी सिद्दीकी मैदान में उतरते हैं तो समीकरण बदल सकता है। भाजपा झंझारपुर से अतिपिछड़ा को ही लड़ाना पसंद करेगी। दरभंगा पर अभी भाजपा का कब्जा है। यदि भाजपा दरभंगा सीट जदयू के लिए छोड़ती है तो स्वाभाविक रूप से मधुबनी सीट पर भाजपा का दावा बरकरार रहेगा। वैसी स्थिति में भाजपा में टिकट के लिए मुख्य मुकाबला नीतीश मिश्रा और अशोक यादव के बीच होने की उम्मीद है।

कुल मिलाकर दोनों प्रमुख गठबंधन यादव व मुसलमान के अखाड़े में नया झंडा (उम्मीदवार) लेकर उतरना चाहते हैं। पार्टियों का समीकरण और वोटों की गोलबंदी का लाभ दोनों गठबंधन उठाना चाहता है। वैसे में जातीय समीकरणों से घिरी राजनीति में राजद समीर कुमार महासेठ और भाजपा नीतीश मिश्र पर दाव लगाये तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

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