मुसलमानों का एक वर्ग भाजपाई खौफ की ग्रंथी का शिकार क्यों है?

मुसलमानों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो दिन-रात मुसलमानों को ही कोसते रहते हैं। मुसलामानों के बीच मामूली हलचल से भी उन्हें इस बात का डर सताने लगता है कि इससे बीजेपी को कहीं कोई फायदा न पहुँच जाए।

इमामुद्दीन अलीग

ऐसे लोगों का मानना है कि मुसलमानों के बोलने से बीजेपी को लाभ मिलता है इसलिए उन्हें अपनी जुबान बंद रखनी चाहिए। मुसलमानों का कोई प्रोटेस्ट हो, सियासी प्रोग्राम हो, मज़हबी इज्तिमा या जलसा हो, हर चीज़ उन्हें नागवार गुज़रती है।

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यहाँ तक कि फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर  मुसलामानों का लिखना/बोलना भी उन्हें बुरा लगता है. मुस्लिम नेताओं का बोलना तो गोया क़यामत है उनके लिए। इनकी मानें तो सारी मुस्लिम क़यादत भजपा की एजेंट है।

 

वैसे लोगों के अनुसार-  ओवैसी ब्रॉदर्स तो बीजेपी से करोडो रुपया खाये बग़ैर मुंह तक नहीं खोलते! ऐसे लोगों के अनुसार मुसलमान न अपने हक़ की बात करें और ना ही अपने ऊपर हुए अत्याचार और नाइंसाफी के विरुद्ध आवाज़ उठायें, क्योंकि इन सब से धुर्वीकरण होता है, संघी खुश होते हैं और बीजेपी को लाभ मिलता है। यहाँ तक कि मुसलमान दाढ़ी रखना, टोपी कुरता पहनना तक छोड़ दें। इसके उलट ऐसे लोगों का खुद दिन-रात एक ही काम होता है सिर्फ और सिर्फ भाजपा-विरोध।

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कोई भी माध्यम हो, शायरी हो या लेख, सोशल मीडिया हो या परिचित लोगों से बातचीत, ये लोग कोई भी मौक़ा भाजपा-विरोध से खाली नहीं जाने देते। ख़ास तौर से मुसलमानों की बूढी नस्ल में ऐसे बहुत से लोग आपको मिल जाएंगे.

 

दरअसल ऐसे लोगों के आसाब पर बीजेपी का खौफ इस क़दर सवार हो गया है कि उन्हें इसके अलावा कुछ सुझाई ही नहीं देता.

 

दूसरों के भाजपा-विरोध से उन्हें लगता है कि इससे बीजेपी को फायदा पहुँच जायेगा लेकिन उन्हें खुद का भाजपा विरोध दिखाई नहीं देता। ये मुसलमानों के खामोश रहने की बात तो करते हैं मगर खुद की ज़ुबान बंद नहीं रख पाते। अब आप ही बताएं ऐसे लोगों को बीमार ज़ेहन और नफसियाती मरीज़ न कहा जाये तो तो और क्या कहा जाये?

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