मूर्तियों की जगह जीवित देवियों का सम्मान हम नहीं सीख लेते,नवरात्र का कोई अर्थ नहीं

मूर्तियों की जगह जीवित देवियों का सम्मान हम नहीं सीख लेते,नवरात्र का कोई अर्थ नहीं

जब तक मूर्तियों की जगह जीवित देवियों का सम्मान हम नहीं सीख लेते,नवरात्र का कोई अर्थ नहीं

ध्रु गुप्त, पूर्व आईपीएस

आज स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान के नौ दिवसीय आयोजन शारदीय नवरात्रि का आरम्भ हो रहा है। यह अवसर है नमन करने का उस सृजनात्मक शक्ति को जिसे ईश्वर ने स्त्रियों को सौंपा है।

 

उस अथाह प्यार, ममता और करुणा को जो कभी मां के रूप में व्यक्त होता है, कभी बहन, कभी बेटी, कभी मित्र, कभी प्रिया और कभी पत्नी के रूप में। दुर्गा पूजा, गौरी पूजा और काली पूजा वस्तुतः स्त्री-शक्ति के तीन विभिन्न आयामों के सम्मान के प्रतीकात्मक आयोजन हैं। काली स्त्री का आदिम, अनगढ़, अनियंत्रित स्वरुप है जिसे काबू करना पुरुष अहंकार के बस की बात नहीं। गौरी या पार्वती स्त्री का सामाजिक तौर पर नियंत्रित, गृहस्थ, ममतालु रूप है जो सृष्टि का जनन भी करती है और पालन भी।

 

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दुर्गा स्त्री के आदिम और गृहस्थ रूपों के बीच की वह स्थिति है जो परिस्थितियों के अनुरुप कभी करूणामयी भी है, कभी संहारक भी। कालान्तर में इन प्रतीकों के साथ असंख्य मिथक जुड़ते चले गए और इस आयोजन ने अपना उद्देश्य और अपनी अर्थवत्ता खोकर विशुद्ध कर्मकांड का रूप ले लिया। स्त्री के सांकेतिक रूप आज हमारे आराध्य बन बैठे हैं और जिस स्त्री के सम्मान के लिए ये तमाम प्रतीक गढ़े गए, वह पुरूष अहंकार के पैरों तले आज भी रौंदी जा रही हैं। जिस देश में सूअर, मगरमच्छ, उल्लूओ, बैलों और चूहों तक को देवताओं के अवतार और वाहन का दर्जा प्राप्त है, उस देश में स्त्रियों को सिर्फ इसलिए गर्भ में मार दिया जाता है कि वह कुल का दीपक नहीं, ज़िम्मेदारी है। विवाह के बाद उसे इसलिए जिन्दा जला दिया जाता है कि वह पर्याप्त दहेज़ साथ लेकर नहीं आईं। उसे इसलिए अपमानित किया जाता है कि उसने अपनी पसंद के कपडे पहन रखे हैं। उसे इसलिए रौंद डाला जाता है कि उसने घर की दहलीज़ से बाहर क़दम रखने की कोशिश की।

 

स्त्रियों के प्रति हमारे विचारों और कर्म में यह विरोधाभास हमेशा से हमारी संस्कृति का बड़ा संकट रहा है। स्त्री एक साथ स्वर्ग की सीढ़ी भी रही है और नर्क का द्वार भी। घर की लक्ष्मी भी और ‘ताड़न’ की अधिकारी भी। मनुष्यता की जननी भी और वेश्यालयों में बिकने वाली देह भी। पूजा की पात्र भी और मौज-मज़े की चीज़ भी। यह संकट कमोबेश आज भी मौज़ूद है।

 

जब तक देवियों की काल्पनिक मूर्तियों की जगह जीवित देवियों का सम्मान करना हम नहीं सीख लेते,नवरात्र के कर्मकांड का कोई अर्थ नहीं !यह आयोजन तब सार्थक होगा जब पुरूष स्त्रियों के विरुद्ध हजारों सालों से जारी भ्रूण-हत्या, लैंगिक भेदभाव, बलात्कार, उत्पीडन और उन्हें वस्तु या उपभोग का सामान समझने की गंदी मानसिकता बदलें और स्त्रियां खुद भी अपने भीतर मौजूद काली, पार्वती और दुर्गा को पहचानने और आवश्यकता के अनुरूप उनका इस्तेमाल करना सीखे !

सभी मित्रों को शारदीय नवरात्रि की शुभकामना !

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