मेरे, तेरे, उसके सपने

यह सही है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी संस्थाएं तो कई हैं जो समाज के अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं बच्चों से मुजड़े मुद्दों पर काम कर रही हैं. लेकिन स्पोर्टस की फील्ड में गरीब बच्चों के उत्थान के लिए कोई संस्था बेहतर कार्य कर रही हो ऐस कम ही दिखता है. लेकिन स्टेयर्स इन्हीं युवाओं के भविष्य की बेहतरी के लिए कार्य कर रही है.

बच्चों के साथ

बच्चों के साथ

आशा मोहिनी, दिल्ली से

स्टेयर्स के संस्थापक और महासचिव सिद्धार्थ उपाध्याय मानते हैं कि उन्होंने काम करने के लिए गरीब और निचले तबके के युवाओं को इसलिए चुना क्योंकि निम्न मध्यम वर्गीय या मध्यम वर्गीय परिवार तो अपने बच्चों की बेहतरी के लिए सोचते ही है और उनका मार्ग दर्शन भी करते है. लेकिन इस वर्ग के युवाओं को न तो उचित मार्गदर्शन मिल पाता हैं और न ही पर्याप्त सुविधाएं. जिसके चलते अकसर यह युवा गलत राह पकड़ लेते हैं . वह वंचित समाज के बच्चों के खेल के सपने साकार करने में जुटे हैं.

सिद्धार्थ कहते हैं ‘‘ बचपन से ही खेलों के प्रति मेरा एक खास लगाव रहा है. स्कूल और कालेज टाइम से ही मैं न सिर्फ खेल प्रतियोगिताओं में बढ़चढ़ कर भाग लेता था बल्कि मैं क्रिकेट प्लेयर भी बहुत अच्छा था.’

इसी लिए उन्होंने खेल के माध्यम से समाज के गरीब तबके के युवाओं में बदलाव लाने की सोची.

यह सही है कि ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपनी बेहतरी पर ध्यान न देते हुए समाज में वंचित तबके की बेहतरी पर ध्यान देते हैं ! कहना गलत न होगा कि सिद्धार्थ उपाध्याय उनमें से एक हैं ! और उनको खुशी है कि उन्होंने समाज की बेहतरी और उन्नति के लिए जो सपना आज से 10-12 साल पहले देखा था, आज वह काफी हद तक साकार हो रहा है. आज देश के कई हिस्सों के बच्चे स्टेयर्स द्वारा संचालित स्पोर्टस सेंटर्स में स्पोर्ट्स एक्टिविटी का लाभ उठा रहे हैं .

विशाल की कहानी

इन्हीं में से एक हैं विशाल ! शारीरिक रुप से अक्षम विशाल राज्य, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्टीय स्तर तक मैच खेल चुके हैं . जब वह 11-12 साल के थे तो उनका एक हाथ मशीन में आ गया था . जिस वजह से उनका हाथ खराब हो गया . हालांकि 24 वर्षीय विशाल इसे दूसरे ही रुप में देखते हैं. डिफरेंटली एबेल्ड पीपुल्स को विशाल अपनी ही शैली में डिफाइन करते हैं उनके मुताबिक ‘‘ डिफरेंटली एबेल्ड ’’ यानी ‘‘ अलग तरीके से सक्षम ’’ . उनके बुलंद इरादों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी शारीरिक अक्षमता को कोई कमी नहीं मानते बल्कि उनका कहना है कि ईश्वर जब कुछ लेता है तो उससे कहीं ज्यादा देता है. बकौल विशाल ‘‘ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ मैं बचपन से ही क्रिकेट खेलता था. लेकिन इस हादसे के बाद मैंने क्रिकेट को ही अपना भविष्य बना लिया और पूरे मजबूत इरादों के साथ कूद गये क्रिकेट के मैदान में. ’’

रंजन का हौसला

18 वर्षीय रंजन कुमार भी उन युवाओं में से एक हैं वह कहते हैं “जब मैं 6-7 साल का था तब एक दिन घर से बाहर खेलते हुए मेरे बायें हाथ में 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया था . जिसकी वजह से मैं न सिर्फ 6 महीने तक कोमा में रहा बल्कि मेरा हाथ भी काटना पड़ा. शुरु से ही मुझे क्रिकेट का बहुत शौक रहा है. लेकिन जब हाथ नहीं रहा तब एक पल को एहसास हुआ कि शायद अब मै कभी न खेल पाउं . किंतु मेरे इरादे इतने बुलंद थे कि मैं लगातार खेलता रहा . फिर एक दिन जब मैंने स्टेयर्स का विज्ञापन पढ़ा तो बेहद खुश हुआ. एक पल को लगा कि कोई संस्था ऐसी भी है जो हम जैसे शारीरिक रुप से अक्षम लोगों की भी सुध लेती है.

तब मैंने कैम्प में देखा कि वहां मेरे जैसे बहुत से युवा आए हुए थे . उनको देखकर पहले एक बार तो सकपका गया लेकिन मेरे हौसले और क्रिकेट के प्रति मेरी दीवानगी इतनी अधिक थी मेरी जीत और यूपी टीम में मेरे सिलेक्शन में कोई बाधा आड़े नहीं आई. आज मुझे गर्व है कि मैं अपनी टीम का ही नहीं पूरी यूपी टीम का कैप्टन हूं .

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