‘मैं हूं बोधगया का थानेदार, कोई शक’ ?

बोधगया के महाबोधि मंदिर परिसर में आठ दिनों पूर्व हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद बोधगया चर्चा में है लेकिन बोधगया थाना के थानाध्यक्ष त्रिलोकी नाथ तिवारी की चर्चा के कुछ और भी कारण हैं.

त्रिलोकी नाथ तिवारी

त्रिलोकी नाथ तिवारी

विनायक विजेता दिलखा रहे हैं त्रिलोकी नाथ तिवारी के 38 महीने के कार्यकाल की कुछ झलक

त्रिलोकी बीते 38 माह से लगातार यहां के थानाध्यक्ष हैं. जो बिहार पुलिस मैनुअल और सरकार के नियमों और प्रावधानों के खिलाफ है.

बिहार पुलिस मैनुअल में यह साफ दर्ज है कि कोई भी पुलिसकर्मी एक ही थाने में लगातार तीन वर्षों यानी 36 माह से ज्यादा नहीं रह सकता जबकि एक जिले में उसकी पदस्थापना की अवधि छह साल की ही होगी, इसके इतर एसआई स्तर के पदाधिकारी टी एन तिवारी को मई 2010 में बोधगया थाना की कमान सौंपी गई थी.

इनके 38 महीने के कार्यकाल में बोधगया थाना क्षेत्र में दर्जनों संगीन वारदात हुए जिनमें विदेशी महिला से गैंगरेप सहित कई वारदात शामिल हैं. टी एन तिवारी के कार्यकाल में बोधगया थाना क्षेत्र एवं मंदिर परिसर क्षेत्र से अबतक लगभग दो सौ मोटरसाइकिलें चोरी हो चुकी हैं पर अबतक एक भी मोटरसाइकिल बरामद नहीं की जो सकी. इसके अलावा मंदिर परिसर क्षेत्र से दर्जनों चरपहिया वाहन जिनमें एक स्कार्पियो झारखंड में पदस्थापित निगरानी एसपी की थी, के चोरी मामले को भी बोधगया पुलिस न तो सुलझा सकी और न ही चोरी गए वाहनों को बरामद कर सकी.

अपहरण, गैंग रेप, चोरी

टी एन तिवारी के कार्यकाल में बोधगया थाना क्षेत्र में कई चर्चित अपहरण भी हुए जिनमें प्रशांत अपहरण कांड सबसे ज्यादा चर्चित रहा पर उसकी गुत्थी भी अबतक नहीं सुलझायी जा सकी. इसके अलावा छह माह पूर्व बोधगया थाना क्षेत्र के ही टेकुना फारम गांव के पासवान जाति से आने वाले एक दलित युवक के हत्या की गुत्थी अबतक बोधगया पुलिस नहीं सुलझा सकी. बीते होलिकादहन (होली) के दिन बोधगया के अमुआ महादलित टोले में होलिका दहन के मामले को लेकर दो गुटों के बीच हुए हिंसक संघर्ष का कारण भी बोधगया पुलिस की निष्क्रियता ही बतायी गयी थी. इस संघर्ष में जहां एक व्यक्ति और एक पुलिस के जवान की मौत हो गई थी वहीं पुलिस की एक रायफल भी लूट ली गई थी.

बताया जाता है कि टी एन तिवारी की राज्य पुलिस मुख्यालय में जबर्दस्त पहुंच है जिसके बलबूते कभी-कभार वह यह कहने और दावा करने से नहीं हिचकते कि आईजी, डीआईजी और एसएसपी हट सकते हैं पर उन्हें बोधगया से तभी हटाया जा सकता है जब वह खुद चाहेंगे.

बोधगया में हुए सीरियल ब्लास्ट मामले में भी बोधगया पुलिस की निष्क्रियता साफ झलकती है. भले ही मंदिर के अंदर सुरक्षा की जिम्मेदारी मंदिर प्रबंध कमेटि की हो पर बाहर तो बोधगया पुलिस की ही है. मंदिर में बम रखने वाले तो आसमान से टपके नहीं वो तो सड़क के रास्ते ही बम और गैस का सिलेन्डर लेकर मंदिर के अंदर पहुंचे होंगे तो आखिर क्या कर रही थी बोधगया पुलिस.

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