मोदी से परहेज की घृणित राजनीति

राजनीतिक विरोध का जवाब राजनीति से दें तो इससे स्वस्थ राजनीति को बढ़ावा मिलता है. पर अगर सरकार ओछे तरीके अपना कर ऐसा करे तो यह दुखद है.modi

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

गुजरात सरकार ने बिहार के 76 किसानों को वाईव्रेंट गुजरात एग्रीकल्चर सम्मिट 9-11 सितम्बर, में सम्मानित करने के लिए बुलावा भेजा था. पर बिहार सरकार ने अपने किसानों को भेजने से मना कर दिया है. इन किसानों को 51-51 हजार रुपये और प्रमाण पत्र दिये जाते.

हालांकि यह कार्यक्रम पहले से तय था. किसानों को जाना था. पर भाजपा से जद यू के तूटे रिश्तों ने राजनीति को ओछेपन की हद तक पहुंचा दिया है. माना कि जद यू को भाजपा से परहेज है. नरेंद्र मोदी से परहेज है. पर गुजरात सरकार से परहेज करना लोकतांत्रिक और राजनीतिक मूल्यों के पतन की प्राकाष्ठा ही तो है. और उसपर से बिहार के कृषि मंत्री ने, राज्य के किसानों को गुजरात न भेजने का जो तर्क दिया है वह भी शर्मासार करने वाला है.

नीतीश सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह का कहना है “पिछले कुछ दिनों से ( बिहार में ) बाढ़ का कहर तेज है. इससे निपटने के लिए कृषि विश्वविद्यालय (सबौर) में वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं किसानों की बैठक 8 एवं 9 सितम्बर को बुलाई गई है. ऐसे में किसानों को राज्य से बाहर भेजना संभव नहीं है”.

माना कि जद यू को भाजपा से परहेज है. नरेंद्र मोदी से परहेज है. पर गुजरात सरकार से परहेज करना लोकतांत्रिक और राजनीतिक मूल्यों के पतन की प्राकाष्ठा ही तो है. और उसपर से बिहार के कृषि मंत्री ने, राज्य के किसानों को गुजरात न भेजने का जो तर्क दिया है वह भी शर्मासार करने वाला है.

नरेंद्र सिंह से पूछा जाना चाहिए कि बिहार में मात्र 76 किसान ही हैं जिन्हें सबौर की बैठक में हिस्सा लेने के कारण गुजरात जाने से रोका जा रहा है.? खुद सरकार का दावा है कि बिहार के 76 प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े हैं. यानी करोड़ों किसान हैं राज्य में. तो क्या वे करोड़ो किसान 9-10 सितम्बर को बिहार के सबौर की मीटिंग में हिस्सा लेंगे?

सरकारी स्तर पर ऐसे कुतर्क गढ़ना एक घृणित राजनीतिक परम्परा को जन्म देना है.

आप मोदी से परहेज करते हैं तो करिए. भाजपा से परहेज करते हैं तो करिए. पर गुजरात सरकार से परहेज करने का मतलब है आप उपराष्ट्रीयता और क्षेत्रवाद को सरकारी स्तर पर बढ़ावा दे रहे हैं.
इस से पहले बिहार सरकार ने मोदी सरकार द्वारा बाढ़ राहत में दिये पैसे लौटा कर भी ऐसी मानसिकता का परिचय दे चुकी है. ऐसा प्रशासनिक व्यवहार निंदनीय है.

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