मौत का निवाला

धर्मासती गंडामन गांव के तकरीबन दो दर्जन बच्चों की अकाल मौत और उनके परिजनों की चीत्कार आम इंसान की रूह को कंपा दे रही है जबकि राजनेता सियासी बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे है.midday

अनिता गौतम, पटना

इसी में राजनेताओं की बयानबाजी और अपना दामन बचाने के तरीके से आम लोग हतप्रभ हैं.सबका कलेजा मुंह को आ रहा कि आखिर कौन है इस तरह की घटना के लिए जिम्मेदार.

क्या रोटी के चंद टुकड़ों के लिए उनके बच्चे काल के गाल में समा गये. शिक्षा और रोटी तो एक दूसरे का पर्याय है पर क्या रोटी इतनी बड़ी त्रासदी भी बन सकती है. न बीमारी, न कोई महामारी और न ही किसी तरह की प्राकृतिक आपदा फिर इतने मौतों का जवाबदेह कौन?

जर्जर भवन में चलने वाले विद्यालय जहां ठीक से बच्चों के बैठने के लिए स्थान नहीं है, फिर इसे समझना मुश्किल नहीं कि मिड-डे मिल के लिए जो जगह निर्धारित होगी वह कितनी साफ सुथरी और रखरखाव भरी होगी.जाहिर है कहीं खुले आसमान तो कहीं तंग गलियों में मध्याह्न भोजन तैयार होता है. मिड-डे मील में छिपकिली, काकरोच और बरसाती कीड़ें का बहाना बना कर पहले भी स्कूल प्रशासन इस तरह की घटनाओं में बीमार बच्चों की जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ता आया है. मिड डे मील के नाम पर घटिया भोजन परोसे जाने की शिकायतें बार बार और लागातार आती रहती हैं ,पर दुर्भाग्यवश उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता जब तक कि कोई बहुत बड़ी घटना न हो जाये.

रेटिंग में नीचे

प्रशासनिक अधिकारियों की माने तो सरकारी स्कूलों में छात्रों के लिए मध्याह्न भोजन का एक मेन्यू निर्धारित है पर न तो स्कूल प्रशासन को और न ही स्थानीय प्रशासन को इसकी फिक्र है कि स्कूलों में दिया जाने वाला भोजन कितना सही है. मिड-डे मील केंद्र सरकार की योजना है जिसे अमलीजामा पहनाने की जिम्मेवारी रारज्य सरकार की है पर रेटिंग में बिहार दूसरे राज्यों से हमेशा नीचे ही रहा है.

इस योजना की तह तक जायें तो इसमें कोई खामियां नहीं है, क्योंकि इसे बनाने के पीछे अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल तक लाना एवं साथ साथ रहने और खाने के नाम पर सामाजिक न्याय को कायम करना भी है. साथ ही खाने की गुणवत्ता भी निर्धारित है, जिसमें प्राथमिक कक्षा तक के बच्चों को खाद्य में पोषण भी उपलब्ध करवाना.इतने सुंदर और तरीके की योजना को महज राजनीति और घोटालों के लिए बर्बाद किया जा रहा है. सिर्फ अपनी जेबे भरने के लिए इसे बिना किसी जांच और सुधार रिपोर्ट के महज खाना पूर्ति के रूप में चलाया जा रहा है.

स्थानीय नागरिकों एवं विद्यालय के शिक्षकों की बातों पर गौर किया जाये तो जिन पर इस योजना को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी है उन्होंने अपना पल्ला इसे ठेकेदारों के हवाले कर के झाड़ लिया है. और ठेकेदार अधिक से अधिक बचाने और कमीशन खोरी से त्रस्त होकर बच्चों को केवल चावल परोसते हैं. आलम यह रहा कि मध्याह्न भोजन में कीडे़ और छिपकिली मिलने की शिकायतें आम हो गई। छात्रों की मानें तो स्कूलों में मेन्यू के अनुसार भोजन कभी नहीं दिया जाता. ज्यादातर तो खिचड़ी ही दी जाती. इसे सीधे समझा जा सकता कि सिर्फ खिचड़ी बच्चों को कुपोषण से कैसे बचा सकता.

लाशों पर राजनीति

शिक्षा के बहाने बच्चों का पेट भर जाये इस उम्मीद में स्थानीय जनता अपने बच्चों को विद्यालय की राह दिखा रहे हैं, पर दुर्भाग्य वश इस योजना की सफलता का जिम्मा लेने वालों की कतार खड़ी है पर मासूमों की मौत पर जिम्मेवारी लेने की बजाय अनावश्यक बयानबाजी कर ठीकरा एक दूसरे के सर फोड़ने की कवायद चल रही है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश तो दे दिए हैं पर घटना स्थल पर जाने की जरूरत नहीं समझी. जबकि पिछले सप्ताह बोध गया ब्लास्ट के बाद आनन फानन में उन्हों ने घटना स्थल का दौरा किया था.

बच्चों को पौष्टिक भोजन देने, घटिया भोजन परोसे जाने की शिकायत पर कार्रवाई करने, पूरे प्लान की रूपरेखा तय करने एवं बच्चों को खिलाए जाने वाले भोजन पर विद्यालय शिक्षा समिति की नजर रखने की बात पूरी तरह बेमानी साबित हो चुकी है. स्तरहीन और घटिया भोजन वैसे भी बच्चों के लिए जहर साबित हो रहा था पर इस मर्माहत करने वाली घटना ने तो सारी हंदे पार कर मासूमों को ही अपना निवाला बना लिया.

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