यह कैसी न्याय प्रणाली है?

जब बाथे नरसंहार के आरोपियों को ऊपरी अदालत ने बरी कर दिया, ऐसे में जद यू सांसद शिवानंद तिवारी का यह लेख काफी मौजू है, पढें-

पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट

शिवानंद तिवारी, सांसद जद यू

यह कैसी न्याय प्रणाली है? निचली अदालत जिन सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर 16 लोगों को फांसी, 10 को आजीवन कारावास और 19 को रिहा करती है उनको ऊपरी अदालत साक्ष्य नहीं मानती है. यह कैसे संभव है?

क्या ऊपरी अदालत इसीलिये सही है कि उसमें निचली अदालत का फैसला पलट देने का अधिकार निहित है.

दरअसल हमारे देश में न्याय व्यवस्था का ढ़ाचा ऐसा है जहां गरीबों का शायद ही न्याय मिलता है।. अभी सुप्रीम कोर्ट ने तंदुर कांड के अभियुक्त सुशील शर्मा की फांसी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया. शर्मा ने अपनी पत्नी के शरीर का टूकड़ा-टूकड़ा कर भट्टी में झोंक दिया था।. अगर हमारे देश में फांसी की सजा की व्यवस्था है तो वह सुशील शर्मा के लिये नहीं है तो किसके लिए है? कोई गरीब और वंचित तबके के अभियुक्त के साथ क्या यह उदारता दिखायी जाती?

दरअसल देश के न्याय प्रणाली में गंभीर बदलाव की जरूरत है. इस प्रणाली पर समाज में आभिजात्य और सामंती तबको का बर्चस्व है. जब तक यह बर्चस्व बना रहेगा, बाथे जैसे नरंसहारों के आरोपी छुटते रहेंगे.

बाथे नरसंहार के अभियुक्तों की रिहाई पर भजपा की प्रतिक्रिया उसके मनुवादी वसूलों के अनुकूल है. उसने इस फैसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. मारे गये सभी पिछड़े, दलित और वंचित तबके के लोग है. दरहसल नरेन्द्र मोदी इसी तबके से आते हैं. नरेन्द्र मोदी की इसी पृष्टभुमि का प्रचार कर भाजपा इस तबके का वोट पाना चाहती है. इसी मकसद से वह मोदी को चाय बेचने वाला, पिछड़ा या अति पिछड़ा बताती है. जो वे हैं भी.

फिर उसी तबके के लोगों के नरसंहार के अभियुक्तों की रिहाई के विरोध में मद्धिम स्वर भी भाजपा नहीं निकाल रही है. इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है. आर0एस0एस0 अपने मनुवादी सिद्धांतो को अमल में लाने के लिए मोदी या बंगारू जैसे लोगों को लासा जैसा इस्तेमाल करता है। ताकि इस तबके के लोगों को फंसाकार उनके वोट से बहुमत हासिल किया जा सके और बाथे जैसे नरसंहारों के अभियुक्तों की सेवा की जा सके.

इसलिये भाजपा के अंदर भी जो शोषित-वंचित तबके के लोग है उन्हें इस पार्टी के असली चरित्र को समझ लेना चाहिये.

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