यूपी चुनाव:यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं बल्कि यादव व जाटव के खिलाफ नयी जातीय गोलबंदी है

यूपी विधानसभा चुनाव परिणाम 2017 का सामाजिक स्वरूप गौर से देखने से पता चलता है कि यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाये जातीय ध्रुवीकरण था- गैर यदावों का यादव के खिलाफ तो गैर जाटवों का जाटव वर्चस्व के खिलाफ.lalu.mulayam.mayawati

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डाॉट कॉम

उत्तर प्रदेश और बिहार दो ऐसे हिंदी भाषी राज्य हैं जहां 90 का दशक खत्म होते-होते पिछड़ी-दलित जातियों में यादव और जाटव(पारम्परिक पेशे के रूप में चर्मकार) समाज के राजनीतिक नेतृत्व का उभार हुआ. बिहार में लालू प्रसाद यादव इसके नेतृत्वकर्ता के रूप में सामने आये तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव उभरे. दूसरी तरफ जाटव समुदाय की नेतृत्वकर्ता के रूप में कांशीराम ने मायावती को पेश किया.

 

अपने आरंभिक काल में लालू प्रसाद न सिर्फ यादव बल्कि तमाम पिछड़े, अतिपिछड़े और यहां तक कि दलितों की आवाज बन गये. कुछ यही हाल यूपी में मुलायम सिंह यादव का था. उधर मायावती में तमाम दलित जातियों ने अपना चेहरा देखा. और यही कारण रहा कि 1990 से ले कर 2005 तक बिहार में लालू  एकक्षत्र रुप से बने रहे. दूसरी तरफ 2007 के चुनाव तक यूपी में मायावती और 2012 चुनाव तक  समाजवादी पार्टी का वर्चस्व कायम रह सका.

गैर यादव गैर जाटव चेतना का प्रश्न

लेकिन इस दौरान राजद और सपा में यादवों का वर्चस्व एकक्षत्र रूप में उभरता चला गया. इसी तरह बहुजन समाज पार्टी(बसपा) में जाटवों का एक तरह से कब्जा होता चला गया. लगभग डेढ़ दशक तक इस यादव-जाटव वर्चस्व ने गैर यादव और गैर जाटव समुदायों को हाशिये का वोटर बने रहने और ठगे जाने की पीड़ा का शिकार बना डाला. यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में यादव की कुल आबादी 12 प्रतिशत के करीब है, जबकि राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर उनकी नुमाइंदगी 25 प्रतिशत तक पहुंच गयी. लेकिन यूपी में समाजवादी पार्टी इससे भी दो कदम आगे निकल गयी.  दूसरी तरफ नियुक्ति की जाने वाले तमाम गैरराजनीतक पदों पर भी यादवों के वर्चस्व से गैरयादव में अंदर ही अंदर कुंठा भरता चला गया. कालांतर में यह कुंठा, क्रोध और फिर अंत में यह क्रोध , विरोध के रूप में सामने आने के लिए तैयार हो गया. उधर इन दो-ढाई दशकों के बीच जब-जब यूपी में मायावती की सरकार बना, जाटवी वर्चस्व हमेशा सर उठाता चला गया. अगर आंकड़ों के आईने में देखें तो पता चलता है कि लगभग 54 प्रतिशत आबादी वाली पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों में से बाकी की 44 प्रतिशत दीगर पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों की नुमाइंदगी हाशिये पर ही बनी की बनी रह गयी. इन अतिपिछड़ी जातियों में वैसे तो जातीय चेतना का उभार बाद में आया लेकिन नेतृत्व के स्तर पर उन्हें कोई मजूबत विकल्प नहीं सूझा. दूसरी तरफ कमोबेश यही स्थति यूपी में गैर गैर जाटव की एससी जातियों की बनती चली गयी.

भातरतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक ने इसी समीकरण को मजबूती सम समझा. और इसी रणनीति पर उसने  2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त से ही काम करना शुरू कर दिया. नरेंद्र मोदी को अतिपिछड़ा के रूप में प्रचारित किया जाना और यूपी में केशव प्रसाद मौर्य को गैर यादव के रूप में सामने करना उसी रणनीति का दूसरा कदम था. इसी प्रकार गैर जाटव समाज को गोलबंद करने और उनकी जातीय चेतना को मजबूत करने के लिए भाजपा ने सारे प्रास किये. नतीजा यह हुआ कि गैर यादव और जाटव में पिछले दो-ढाई दशक में पनपे असंतोष ने  उन्हें भाजपा में अपना विकल्प देखने को मजबूर कर दिया.

बिहार का अपवाद

हालांकि 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में गैरयादव पिछड़ी जातियों के एक बड़े हिस्से ने राजद व जद यू के खिलाफ वोट जरूर दिया लेकिन इसका गणितीय स्तर पर महागठबंधन पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ सका. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि यही स्थिति आगे भी रहेगी.

मंडल मसीहाओं के लिए सबक

मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद और मायावती जैसे नेताओं के लिए यह आत्ममंथन और परीक्षा की घड़ी की है. उनमें पिछड़ी, अतिपिछड़ी और दलित जातियों ने अपना चेहरा देखा है तो उन्हें यादववाद और जाटववाद से आगे सोचना ही होगा. इसी तरह जहां तक मुसलमानों का सवाल है तो इन नेताओं को यह भी याद रखना होगा कि पिछले दो-ढ़ाई दशक में मुसलमानों की पिछड़ी जातियों में भी अपनी आइडिंटिटि पालिटिक्स का स्पेस खोजना शुरू किया है. इसलिए उनकी नुमाइंदगी उन्हें जहां सुनिश्चित लगेगी, वे वहां जा सकते हैं. भूलना न होगा कि भाजपा की पिछड़े मुसलमानों पर भी नजर है.

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इर्शादुल हक ने बर्मिंघम युनिवर्सिटी इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त की.भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की.फोर्ड फाउंडेशन के अंतरराष्ट्रीय फेलो रहे.बीबीसी के लिए लंदन और बिहार से पत्रकारिता करने के अलावा तहलका समेत अनेक मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे.अभी नौकरशाही डॉट कॉम के सम्पादक हैं.

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