बीबीसी उर्दू के शकील अख्तर का यह लेख बताता है कि अखिलेश सरकार जहां मुसलमानों से छल कर रही है वहीं मजहबी संगठन भी इसी राह पर हैं.muslims-up

कुछ दिनों पहले उत्तरप्रदेश सरकार की तरफ से अखबारों में लड़कियों की शिक्षा के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया गया था. इस इश्तेहार में यह बताया गया था कि सरकार ने मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के लिए एक विशेष स्कॉलरशिप शुरू की है.

इस में यह भी बताया गया था कि हुकूमत ने यह कदम अल्पसंख्यकों के कल्याण के मद्देनजर बनायी गयी विशेष पॉलिसी के तहत उठाया है.

राज्य सरकार की ओर से एक दूसरे विज्ञापन में स्कॉलरशिप की इस स्कीम को राज्य की सभी बालिकाओं के लिए बताया था. जो स्कीम सभी के लिए थी उसे राज्य सरकार मुसलमानों के लिए बता कर उन्हें तो गुमराह कर ही रही थी, बाकी आबादी की नजरों में भी उसे एक विशेष सुविधा पाने वाली बिरादरी के तौर पर पेश करके नफरतों को जन्म दे रही थी.

भारत में मुसलमानों को अकसर ऐसे ही हालात का सामना रहा है.

मुसलमानों का हमदर्द समझे जाने वाले मुलायम सिंह यादव की पार्टी की सरकार का मुसलमानों के सिलिसले में किरदार संदेहास्पद रहा है. पिछले एक साल में मुसलमानों के खिलाफ एक दर्जन फसाद हो चुके हैं.

राज्य के मुसलमान मुजफ्फरनगर के दंगों की स्थितियों से अभी उबरने की कोशिश कर रहे हैं. पर यह किसी की समझ में नहीं आया कि आखिर इस दंगे को इतने दिनों तक क्यों चलने दिया गया. दंगे कई रोज चले, हजारों मुसलमान अपने घरों से भाग गये और कई हजार अब इतने खौफजदा हैं कि वे अपने घरों को कभी नहीं लौटेंगे.

भारत में पांच महीने में चुनाव होने वाले हैं. राजनीतिक दलों के साथ साथ राजनीति में सरगर्म रहने वाले मुस्लिम संगठन भी मुसलमानों के हवाले से अपनी पनी हिस्सेदारी के लिए मैदान में उतर चुके हैं.

मनमोहन का मायावी जाल

मनमोहन सिंह की सरकार जब सत्ता में आयी थी तो उसने मुसलमानों के पिछड़ेपन का जायजा लेने के लिए सचर कमेटी बनायी थी. सचर कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी थी उसके मुतबिक, भारत के मुसलमान शिक्षा और आर्थिक लिहाज से देश के सबसे पिछड़ा थे.

हर तरह के नाटकी घोषणा और गुमराह करने वाले विज्ञापनों और अल्पसंख्यकों के कल्याण के दावों के बाद मुसलमानों की हालत सात साल पहले जैसी थी उससे अब शायद कुछ ज्यादा खराब हो चुकी है. मुसलमानों की बस्तियां, शहर,कसबे और गांव आज भी मुफलिसी और गुरबत की तस्वीर बने हुए हैं. सरकारें आज भी इन बस्तियों में स्कूल, कॉलेज, बैंक, अस्पताल और सरकारी संस्थान खोलने से बच रही है.

एक तरफ राजनीतिक पार्टियां जनता से, बड़ी बड़ी सड़कें, बंदरगाहें, हवाई अड्डे, उद्योगिक क्षेत्र, कारोबारी केंद्र, मेडिकल और इंजिनियरिंग कॉलेज बनाने के वायदे कर रही हैं और दूसरी तरफ देहाती क्षेत्र हों या शहरी हर जगह गरीब आबादी में मुसलमानों की बड़ी संख्या बदलते भारत की तरक्की का हिस्सा नहीं बन सकी हैं.

चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक पार्टियां और मुसलमानों के धार्मिक संगठन, मुसलमानों की गुरबत, पिछेड़ेपन और उन्हें ऊपर लाने के तरह तरह के नारे लगाने शुरू करेंगे. कोई भी संगठन मुसलमानों की शैक्षिक बदहाली और आर्थिक हालात बेहतर बनाने और उन्हें देश की मुख्यधारा में लाने की बात नहीं करेंगे.

पिछले 60 सालों से ये राजनीतिक पार्टियां क्या वायदा करती रही हैं और उन्होंने मुस्लिम बिरादरी की हालत बेहतर बनाने के लिए क्या किया है, यह सिर्फ सियासी जमायतें और मजहबी संगठन ही बता सकते हैं.किसी ने तरक्की की हो या न की हो इन राजनीतिक और मजहबी संगठनों ने जरूर तरक्की की है.

By Editor


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