यूपी से आंध्रा तक, बिहार से गुजरात तक दलित उत्पीड़न

हाल के दिनों में आंध्रप्रदेश से ले कर यूपी तक, बिहार से ले कर गुजरात तक दलित उत्पीड़न, हत्या, ब्लात्कार में हुई बेतहाशा वृद्धि पर पत्रकार संजय कुमार इसके कारणों पर प्रकाश डाल रहे हैं.dalit.attrocity

देश में दलित उत्पीड़न की घटना की गूंज सड़क से संसद तक सुनाई पड़ी है। प्रधानमंत्री को जनसभा में कहना पड़ता है कि, दलितों को मत मारो,अगर मारना है तो मुझे मारो। इसके बाद सरकार राज्य सरकारों को फरमानजारी कर हर हाल में दलित उत्पीड़न को रोकने की अपील भी होती है। इसके बावजूद दलित उत्पीड़न रूकने का नाम नहीं ले रहा है?

प्रधानमंत्री की अपील और संसद में घटनाओं के विरोध के स्वर के बीच आंध्रप्रदेश के पूर्वी गोदावारी जिले में एक मृत गाय की खाल उतारने की कोशिश कर रहे दो दलित युवकों की पिटाई और आरोप में पुलिस की ओर से 10अगस्त को आठ लोगों को गिरफ्तार किया जाना,शर्मनाक है, 8 अगस्त की रात को घटने वाली इस घटना को गाय और दलित से जोड़ देखा जा रहा है।

आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने इस घटना परनाराजगी जाहिर करते हुए चेतावनी दी है कि दलितों पर हमला करने वाले या कानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

तो वहीं, उत्तर प्रदेश के संभल के थाना गुन्नौर क्षेत्र के गांव गंगुर्रा में चिलचिलाती व उमसभरी गर्मी में खेत में काम कर रही एक 13 साल की दलित बच्ची जब डूंडा बाबा के मंदिर में लगे नल पर पानी पीने से मंदिर के पुजारी द्वारा पानी पीने से रोका जाता है। बच्ची ने जब यह वाकया अपने पिता को बताया तो उन्होंने पुजारी से इसका विरोध जताया। इस पर मंदिर के पुजारी नें अपनी गलती मानने के बजाय दलित बच्ची के पिता पर त्रिशुल से जान लेवा हमला कर दिया। पुलिस ने पहले मामले को रफादफा करना चाहा, लेकिन विरोध के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। त्रिशुल से घायल चरनसिंह को गंभीर अवस्था में गुन्नौर के सीएचसी में भर्ती कराया गया है।

गुजरात,बिहार,उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश सहित अन्य राज्य में तेजी से दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटना ने देश व समाज के समक्ष एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड के बाबूटोला में सामंतों द्वारा दो दलित युवकोंके मुंह में पेशाब करने की घटना ने समाज को शर्मशार कर दिया है.

राजनीतिक एवं सामाजिक आलोचना में गुजरात हो या फिर बिहार, हर जगह सामंती ताकतों पर घृणित स्तर पर उतरकर दलितों पर दमन ढाहने और उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार करने को सभी ने बेहद शर्मनाक है।

पेशाब पिलाने की घटना

मोटरसाइकिल चोरी का आरोप लगा कर दलित युवकों को मारा पीटा गया साथ ही उन्हें पेशाब पिलाया गया। इस दलित उत्पीडन की घटना के पीछे राजनीतिक संरक्षण का भी आरोप सामने आया है। भाकपा-माले की एकजांच टीम ने 24 जुलाई को घटनास्थल का दौरा किया कर मीडिया के सामने सच को लाने का काम किया है। जांच टीम ने कहा है कि बाबूटोला में दो दलित नवयुवक, जो आपस में साला-बहनोई हैं, राजीव पासवान और मुन्नापासवान अपनी बाइक से यज्ञ देखने गए थे। जब वे यज्ञ से लौटे तो जहां पर उन्होंने अपनी बाइक खड़ी की थी, उस स्थान पर बाइक नहीं थी। वे अपनी बाइक ढूंढने लगे। तभी बगल के सुमन ठाकुर व सुशील ठाकुर ने पूछा क्याढूंढ़ रहे हो? जब इन दोनों युवकों ने कहा कि हमारी बाइक नहीं मिल रही, तो उन्होंने बाइक दिखलाते हुए कहा कि इसका कागज दिखलाओ। फिर कहने लगे कि यह चोरी का बाइक है और दोनों दलित युवकों की पिटाई करने लगे। उन्हें राॅड से पीटा गया व रूम में बंद कर दिया गया। उसके बाद गांव का मुखिया पति मुकुल ठाकुर पहुंचा और उसने कहा कि इनके मुंह में पेशाब कर दिया जाए। उसके आदेश पर उन दलित युवकों के मुंह में पेशाब करदिया गया। जब इन युवकों को बचाने के लिए उनके पिता आए तो उनके गर्दन में कपड़ा लपेटकर उन्हें भी पीटा गया। उसके बाद यज्ञ में खड़ी पुलिस ने आकर उन दलित युवकों से कहा कि यहां से भागो। जब ये दोनों थाना पहुंचे,तो थाना ने दबाव में मुकदमा लेने से मना कर दिया। यहां तक कि आवेदन फाड़ दिया। बाद में प्रतिवाद आंदोलन के बाद मुकदमा दायर किया गया। इस घटना के पीछे सामंती सोच के सामने आने की खबर है। पंचायत चुनाव मेंइन लोगों ने दबंगों को वोट नहीं किया था, जिसका बदला उन्होंने इस पाश्विक तरीके से लिया। बिहार की मीडिया में भी यह खबर आयी। लेकिन केवल एकआध जगह। खबर के सोशल मीडिया पर चलने से मामला गरम हुआ।फिर राजनीति भी गरमाई।

सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्य की दलित उत्पीडन रूके इस पर पहल तो जारी है।

दलित बनाम द्विज

लेकिन, दलितों पर उत्पीड़न का बढ़ता मामला लोकतंत्र का सरासर अपमान प्रतीत होता है। तमाम कोशिशों के बावजूद दलित उत्पीड़न कोलगातार बढ़ना चिंतनीय व सोचनीय है। मंदिर में प्रवेश के सवाल पर, 15 अगस्त के मौके पर तिरंगा फहराने के सवाल पर, मजदूरी मांगने के सवाल पर, दलित लड़के का दिव्ज लड़की से पे्रम का सवाल….हो या फिर कोई औरसवाल। दलितों पर दंबग द्विजों का कहर समय-समय पर ढाया जाता रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि राजनीति-सत्ता-प्रशासन में वंचितों के काबिज रहने के बावजूद यह कहर जारी है? दलित उत्पीड़न की घटना के बादमामले पर राजनीतिक दलों के बीच बयानों से हमला का जो सिलसिला शुरू होता है उसमें मूल मुद्दे को दबाने की बू आती है।

जिस राज्य की घटना होती है तो वंहा के विपक्षी दलों का सत्तारूढ़ दल पर हमला शुरू हो जाता है।गुजरात दलित मुद्दे पर भाजपा पर हमला होता है। तो वहीं, बिहार में दलित मुद्दे पर राजद-जदयू-कांग्रेस घेरे में आते है। कोई भी घटना के मूल में नहीं जाता है। आखिर यह होता क्यों है। दलित उत्पीड़न पर दलितों के नेताओं काखामोश चेहरा भी सवालों के घेरे में आता है।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)।

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