यौन उत्पीड़न: तेजपाल बनाम ‘साहब’ का ऐंगल

इस मामले में सबके दामन दागदार हैं. चाहे वह राजनीतिक पार्टियां हों, मीडिया हो, कार्पोरेट हो या बॉलिवुड. मतलब जहां सत्ता है वहां शोषण है. यह शोषण आर्थिक भी है और शारीरिक भी. अगर मामला महिलाओं का है तो यौन उत्पीड़न भी इसमें शामिल है.Tarun-Tejpal

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

पर तुरूण तेजपाल की घटना ने कुछ राजनीतिक दलों और मीडिया घरानों को बड़ा मौका दे दिया है.जिसके कारण वे तरुण तेजपाल के मामले को काफी गंभीरता से ले रहे हैं. इसमें उनकी अपनी रणनीति भी कम महत्वपूर्ण नहीं, जितना की यह मामला.

हालांकि तरुण तेजपाल अगर गुनाहगार हैं तो उनके साथ कानून को अपना काम करना चाहिए और जरूर करना चाहिए.

पर यहां मामला सिर्फ इतना नहीं है. तहलका ने पिछले दस सालों में जिस तरह की खोजी पत्रकारिता की है उसका खामयाजा राजनीतिक दलों को भुगतना पड़ा है. इसमें भाजपा भी शामिल है. भाजपा सरकार के दौराना कोफिन घोटाले, तोप खरीद गोटाले और खुद पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्षमण का रिश्वत कांड तहलका ने उजागर किया था. ऐसे में गोवा की भाजपा सरकार कानून के सख्ती से पालन की बात कर रही है तो इसे सिर्फ इतना ही मान लेना कि वह हर अपराध पर इतना ही गंभीर होगी, यह मामले को सरलीकरण करना है.

तेजपा के शोर में दबा ‘साहब’ का मामला

तरुण तेजपाल का मामला ऐसे समय में आया है जब भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गुलेल और कोबरा पोस्ट ने उस खबर को उजागर कर दिया है जिसमें भाजपा के वरिष्ठ नेता और नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह की विडियो फुटेज जारी की गयी थी जिसमें अपने ‘साहब’ के लिए एक युवती की जासूसी कराने के लिए अनेक आईपीएस अधिकारियों के नेतृत्व में गुजरात पुलिस के दुरुपयोग का मामला सामने आया था.

अमित शाह के 'साहब' का क्या हुआ?

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लेकिन तरुण तेजपाल द्वारा एक महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न का मामला सामने आते ही भाजपा के ‘साहब’ का मामला मीडिया से गौण कर दिया गया है. यहां ध्यान देने की बात है कि ऐसे में भाजपा इस मामले को तूल देकर एक रणनीति के तहत तरुण तेजपाल के मामले को मजबूती से उठा रही है. और आने वाले दिनों में वह इस मामले को इसी तरह उठाती रहेगी. ताकि भाजपा के ‘साहब’ के मामले से लोगों को भटकाया जा सके.

दूसरी तरफ मीडिया का भी इस मामले में अपना इंट्रेस्ट है. मीडिया जहां एक तरफ इस मामले को मजबूती से उठा कर यह साबित करना चाहता है कि यौन उत्पीड़न करने वाला रसूखदार पत्रकार ही क्यों न हो वह इसे दबाता नहीं है. और दूसरे यह कि समकालीन मीडिया के सामने तहलका ने खोजी पत्रकारिता करके एक बड़ी चुनौती पेश कर दी थी, ऐसे में मीडिया का एक वर्ग यह भी चाहता है कि तरुण तेजपाल के मामले को गंभीरता से उठा कर तहलका सम्पादक की इस कारिस्तानी को इतना उठाया जाये कि वह आत्मग्लानि की शिकार हो के रह जाये.

आगे क्या होगा

पर अब सवाल है कि इस मामले में आगे क्या होगा.तरुण तेजपाल ने यौन उत्पीड़न मामले में अपना गुनाह स्वीकार करते हुए महिला पत्रकार से माफी मांगी है. तरुण ने अपनी गलती स्वीकार करके उन शक्तिशाली यौन उत्पीड़कों के सामने एक मिसाल पेश की है जो जेल की सलाखों में बंद होने तक खुद को निर्दोश कहते रहते हैं.

लेकिन जब यह मामला कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा और चीजें समान्य होती जायेंगी तो कुछ नये दृश्य भी सामने आयेंगे. चूंकि सत्ता सिंहासन पर बैठी पार्टियों के कई नेता यौन उत्पीड़न के आरोपों समेत भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं. ऐसे में तहलका ने भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. वह एक तरफ सबसे पहले तेजपालकांड से निपटने में लगा है वहीं वह आने वाले दिनों में कुछ बड़े खुलासे करने की तैयारी कर सकता है. और इस प्रकार राजनीतिक पार्टियों से बारगेनिंग की स्थिति आ सकती है.

चूंकि इस मामले में पीड़िता ने अभी तक अपनी तरफ से कोई शिकायत पुलिस में दायर नहीं की है इसलिए उस लड़की पर दबाव बनाया जा सकता है और इस प्रकार केस को कमजोर करने की संभावनायें भी हैं.
पर यहां सवाल यह है कि इस घटना का अंजाम क्या होगा. हालांकि इस सवाल का जवाब अभी दे पाना कठिन है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि जिनके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते. लिहाजा ऐसा न हो कि कुछ दिनों के शोरशराबे के बाद मामला दब कर रह जाये. क्योंकि सबके अपने अपने इंट्रेस्ट हैं.

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