राजनीति में नया प्रोयग या एक सिरफिरे का दिवास्वप्न

एक केंद्रीय मंत्री ने मुझसे पूछा था कि अन्ना और जनरल वी के सिंह अगर साथ निकलें, तो क्या होगा? मेरा जवाब था कि ज्यादा असर नहीं होगा। मंत्री महोदय चकित थे।HAZARE

आशुतोष

सरकार दोनों से चिंतित थी। उनको लगता था कि दोनों समाज में बड़ा उभार पैदा करेंगे और सरकार को नुकसान होगा। उनकी नजर में अरविंद केजरीवाल की कोई हस्ती नहीं थी। मैंने कहा कि सरकार को खतरा अरविंद से ही होगा, अगर होगा तो। इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि अन्ना का पूरा आंदोलन अरविंद के दिमाग की उपज था। अन्ना हजारे उस आंदोलन का चेहरा भर थे। अन्ना की सात्विक छवि ने आंदोलन को नई ऊंचाई दी। पर अरविंद नहीं होते, तो शायद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ही नहीं होता। अरविंद ने आंदोलन की रूपरेखा बनाई, लोगों को इकट्ठा किया और आंदोलन के लिए जरूरी कैडर खड़ा किया। यह बात आज सही साबित होती दिख रही है। अन्ना और जनरल आज कहीं नहीं हैं। आंदोलन खत्म होते ही अरविंद की अगुआई में एक धड़े ने राजनीतिक पार्टी बनाने की भूमिका शुरू कर दी थी। वे महसूस करने लगे थे कि आंदोलन अपनी उम्र जी चुका है। सरकार के अड़ियल रवैये और अन्ना में दूरदृष्टि के अभाव ने आंदोलन को उस जगह ला खड़ा किया था, जहां से आगे का रास्ता बंद था।

अन्ना आंदोलन को यहां से नई दिशा अख्तियार करनी थी, लेकिन वह शीर्ष पर ‘इगो’ के टकराव में उलझ गया। अन्ना आंदोलन के निर्विवाद नेता थे। उन्हें बदले संदर्भों में नई रणनीति बनानी थी, लेकिन वह अपनी छवि के मोहपाश में फंसे रहे और अपनी ताकत को संगठन से ऊपर समझने की भूल कर बैठे। उनको लगता था कि आंदोलन उनकी वजह से था और वह जब चाहेंगे, तब जन-उभार पैदा कर देंगे। यह उनकी गलती थी।

अन्ना और अरविंद एक-दूसरे के पूरक थे। अरविंद समेत आंदोलन के एक तबके ने यह मान लिया था कि राजनीतिक तंत्र इतना ढीठ हो गया है कि उसे बाहर से बदलना नामुमकिन है। अंदर जाए बिना बदलाव संभव नहीं। अन्ना राजनीतिक दल बनाने के सख्त खिलाफ थे। लिहाजा दोनों अलग हो गए। अरविंद धड़े की योजना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ने की थी। आम आदमी पार्टी बनी और दिल्ली पहली प्रयोगशाला। लेकिन प्रश्न था कि धन और बाहुबल के बगैर चुनाव में तर्कसंगत मौजूदगी दर्ज कराना क्या मुमकिन है? सीमाओं के बावजूद अरविंद ने जो प्रयोग किया, दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसे नजरंदाज करना कांग्रेस, बीजेपी और विशेषज्ञों के लिए आसान नहीं होगा।

कांशी राम का प्रयोग

भारतीय राजनीति में इस तरह का प्रयोग काफी पहले कांशीराम ने किया था। 80 के दशक में दलितों को एकजुट करने का बीड़ा कांशीराम ने उठाया था। दलित तब तक कांग्रेस के वोट बैंक हुआ करते थे और कांग्रेस सिस्टम का अभिन्न अंग। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम के त्रिकोण ने कांग्रेस के दुर्ग को अभेद्य बना दिया था। इस त्रिकोण की वजह से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में पटकनी देना लगभग असंभव था। 1989 आते-आते तीन धाराएं एक साथ कांग्रेस के खिलाफ हो गईं। एक, उग्र हिंदुवाद की धारा। इसने उत्तर भारत में सवर्णों का कांग्रेस से मोहभंग किया। दो, राममनोहर लोहिया की बैकवर्ड राजनीति, जिसकी परिणति 1990 में मंडल आयोग की सिफारिश में हुई। तीन, कांशीराम की दलित धारा। लोगों का ध्यान नब्बे की शुरुआत में लालकृष्ण आडवाणी पर थी, वीपी सिंह पर थी। मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव राजनीतिक फलक पर छाए हुए थे। कांशीराम को कोई तवज्जो देने को तैयार नहीं था। पंजाब से निकलकर यूपी को कर्मभूमि बनाने वाले कांशीराम चुपचाप दलितों को गोलबंद करने में जुटे थे। और बाबरी मस्जिद गिरने के बाद जब कांशीराम की पार्टी बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश विधानसभा में 60 के करीब सीटें मिलीं और मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम के समर्थन से यूपी में सरकार बनाई, तो सब चौंक गए।

वह जमीन पर दलित क्रांति की पहली चुनावी अंगड़ाई थी। कांशीराम तब कहा करते थे कि राजनीतिक अस्थिरता उनको पसंद है, क्योंकि अस्थिरता उनके आंदोलन को नई ऊर्जा देती है और गठबंधन के दौर में उनकी राजनीतिक सौदेबाजी को मजबूत करती है। ये इस राजनीति के अभिनव प्रयोग का नतीजा था कि मायावती ने बाद में बीजेपी की मदद से यूपी में सरकार बनाई और फिर 2007 में अपने बल पर बहुमत हासिल किया। आज तमाम विवादों के बावजूद मायावती यूपी में बेहद शक्तिशाली हैं और दलित शक्ति ने ‘सामाजिक रसायन’ को पूरी तरह से बदल दिया है।

नेता, नौकरशाह, उद्योगपति गठजोड़

वहां कांग्रेस की सामाजिक संरचना छिन्न-भिन्न पड़ी है। लेकिन अरविंद केजरीवाल का प्रयोग जाति आधारित नहीं है। यह उसके आगे की सीढ़ी है। मार्क्सवादी चिंतक मिलोवान जिलास के शब्दों में कहें, तो आजादी के बाद देश में एक नया वर्ग बना है। सत्ताधारी वर्ग। जो देश के लोकतंत्र को अंदर से खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार इस वर्ग का ऑक्सीजन है। और किसी भी तरह से सत्ता में बन रहने का मंत्र। आज शायद ही कोई पार्टी होगी, जो भ्रष्टाचार में डूबी नहीं होगी। राजनीति पैसा कमाने व ताकत खरीदने का सबसे बढ़िया जरिया हो गया है। नेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों के बीच एक ऐसा समझौता है कि लोकतंत्र में आम आदमी की कोई हैसियत ही नहीं रह गई है।

वह कांशीराम के दलित की तरह चुनाव के दौरान बस इस्तेमाल की वस्तु बनकर रह गया है। अन्ना ने आंदोलन के दौरान बार-बार कहा था कि जनता मालिक है और राजनेता सेवक, लेकिन आज मालिक सेवक हो गया है और सेवक मालिक। यानी मौजूदा लोकतंत्र में राजनीति जनता के नाम पर होती है, पर चुनाव के बाद जनता ही भुला दी जाती है। इस सिस्टम को बदलने की जरूरत है। इस एहसास ने लोगों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। अन्ना के आंदोलन ने राजनीतिक तंत्र को आईना दिखाने का काम किया। आज दिल्ली में आम आदमी पार्टी लोगों के गुस्से को नया तेवर देने की कोशिश कर रही है, इसलिए विधानसभा चुनाव में बीजेपी भी परेशान है और कांग्रेस भी। दोनों को ही अपनी जमीन थोड़ी खिसकती नजर आ रही है। पर क्या भारतीय राजनीति का यह नया प्रयोग कांशीराम की तरह कामयाब होगा, या फिर यह एक राजनीतिक दिवास्वप्न साबित होगा? इसका जवाब आठ दिसंबर को मिलेगा।

आईबीएन खबर से साभार

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