राजापट्टी में रंक की सवारी

छपरा और गोपालगंज जिले के मुहाने पर अवस्थित राजापट्टी आजादी के पहले निलाह साहबों (अंग्रेजो )की कोठी के कारण जाना जाता था. 1905 में रेल लाइन बिछाई गयी थी.एक छोटा सा गांव रेलवे स्टेशन बना जिसका नाम पड़ा राजापट्टी.buffolow.riding

गोपालगंज से लौट कर अनूप नारायण सिंह

 

छोटी लाइन की ट्रेने 3 जोड़ी छपरा वया राजापट्टी कप्तानगंज तक चला करती थी.एक अप्रैल 2015 से इस रेल लाइन को अमान परिवर्तन के लिये बंद कर दिया गया है.  स्टेशन छपरा जिला और कोठी गोपालगंज जिले में है. दोनों के मध्य गंडक बराज नहर है. मेरे पैतृक गांव से यहाँ की दूर है ढाई कोस है. बचपन में दर्जनों बार बैलगाड़ी से गांव से स्टेशन तक का सफर करने की याद आज भी  ताज़ा है. 2008 के 31 दिसंबर को यहाँ नक्सलियों ने रेलवे स्टेशन का ऑउटर सिंगल उड़ा दिया था.तब रिपोर्टिंग के सिलसिले में वहां गया था.वर्षों बाद राजापट्टी जाने का मन हुआ.

ढ़ाई घंटे में ढ़ाई कोस

जा पंहुचा राजापट्टी.कुछ भी तो नहीं बदला आज भी ढाई कोस का सफर तय करने में ढाई घंटे ही लगते हैं. जो पुरानी सड़क है उसका हाल खस्ता है. भूख गरीबी आज भी सड़क के किनारे घरों से वैसे ही झांकती है जैसा 25 साल पहले झाकती थी. गर्मी का मौसम चौर के सूखे पोखरों में मछली मरते बच्चे, युवा,महिलाए,भैस की पीठ पर किसी चलताऊ भोजपुरी गीत का तान छेड़ता गांव का बच्चा,अपनी लाचारी और बेबसी का बखान करती गंडक नहर के किनारे की सड़क. लगा कि आज भी जनप्रतिनिधियो की प्राथमिकताओं में कैसे यह इलाका अछूता रह गया है ,कुछ भी नयापन नहीं इलाके के अधिकांश गावों में नवे फीसदी कमासुत आबादी पंजाब हरियाणा में बेहतर बिकल्प की तलाश में.पोल हले लेकिन तार नहीं लगा ,रासन किरासन आज भी नही मिलता.

 

तपती दुपहरी में गांव के चौक पर पीपल के पेड़ के नीचे ताश खेलने में मगन सजग पीढ़ी.चर्चा चुनावी होते ही कहते हैं हम लोगों के वोट का कोई मोल नही चुनाव के समय भी कोई प्रत्याशी इधर झांकने नहीं आता.झूठ- मूठ का नक्सली का हल्ला है.खेतों से रबी की फसल कट चुकी है. धरती जल रही है साथ में जल रही है इस इलाके के लोगो की किस्मत. पदमपुर ,पद्मौल ,सुनार आदी गावों की व्यथा के बीच मन बहुत विचलित होता है.

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