रातों रात बिहार के खजाने के रखवाले को क्यों हटा दिया गया?

तबके मुख्यमंत्रा मांझी के तूफान में नीतीश के तमाम खास आईएएस उड़ गये थे लेकिन वित्त विभाग के प्रिसिंपल सेक्रेट्री पर आंच नहीं आयी. लेकिन चुनाव के ऐन पहले नीतीश ने अचानक उन्हें क्यों हटा दिया ?

फोटो साभार- भास्कर डॉट कॉम

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इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

बुधवार को देर रात सामान्य प्रशासन विभाग की जारी अधिसूचना के अनुसार, वित्त विभाग के प्रधान सचिव रामेश्वर सिंह को सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस सोसाइटी का महानिदेशक बनाया गया है. वे यहां अगस्त 2010 से ही पदस्थापित थे. यानी नीतीश कुमार के दुबारा मुख्यमंत्री बनने के पहले से. नौकरशाही के गलियारे में यह सवाल बड़ी तीव्रता से पूछा जा रहा है कि आखिर यह क्यों किया गया? नये सचिवालय के विकास भवन से लेकर पुराने सचिवालये के तमाम वरिष्ठ नौकरशाह गुपचुप यह सवाल कर रहे हैं. खास बात यह है कि वे खुद ही इसका जवाब भी दे रहे हैं.

रामेश्वर सिंह का हटाया जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है क्योंकि वह बिहार के खजाने के असल रखवाला थे. तमाम विभागों को कब और कितना पैसा दिया जाना है, वही तय करते थे. किस विभाग द्वारा विकास के किस काम के लिए पैसे जारी करने का काम कैसे होगा और कब होगा यह महत्वपूर्ण फैसला उनके जिम्मे था.

नौकरशाहों के बीच चर्चा

मानना पड़ेगा कि जिस अफसर पर श्री नतीश पिछले पांच वर्षों से लगातार भरोसा करते आये हों, अचानक उन्हें हटाने के पीछे कुछ बात तो होगी. नौकरशाहों की जमात इस सवाल और जवाब की भी व्याख्या कर रही है कि आखिर चुनाव होने वाले हैं, सरकार कुछ महीने इंतजार क्यों नहीं कर सकी.

एक नौकरशाह कहते हैं कि, किसी अफसर को एक विभाग में निश्चित समय तक रखने का अपना आधा है. लेकिन एक दूसरे नौकरशाह मुस्कुराते हुए कहते हैं- “निश्चित कार्यकाल के बाद ट्रांस्फर किया जाता है लेकिन वित्त विभाग के अफसर के द्वार चुनावी गतिविधियों पर ना के बारबर असर पड़ता है. ऐसे में चुनाव आयोग को भी इससे कोई ऐतराज नहीं होता”. लेकिन फिर उनको हटाये जाने पीछे जो मकसद है, वह चुनाव से ही जुड़ा है. ये नौकरशाह इस कारण की व्याख्या तो करते हैं पर शर्त रखते हैं कि उनका नाम उजागर न किया जाये. वह कहते हैं कि मौजूदा सरकार के पास दनादन फैसले लेने और उसपर  स्वतंत्र रूप से अमल करने के लिए मात्र तीन महीने बचे हैं. विकास योजनाओं के तमाम फैसलों का सीधा संबंध वित्त विभाग से है. क्योंकि यह वित्त विभाग ही है जो खजाने की गठली खोलता है. पैसों की गठली खोलने के लिए कई औपचारिकतायें पूरी करनी पड़ती है. वह कहते हैं औपचारिकताओं के जंजाल में फंसे रहना अब सरकार को गवारा नहीं. जबकि रामेश्वर सिंह एक ऐसे अफसर हैं जो बिना औपचारिकता के टस से मस नहीं होने वाले. वह नौकरशाह सवालिया लहजे में पूछते हैं- ‘समझ गये न’?

दर असल नीतीश सरकार  आचार संहिता लागू होने के पूर् अगले एक दो महीने में वित्त से संबंदी अनेक बड़े फैसले लेने वाली है. जनकल्याण की कई योजनाओं को दनादन घोषित किया जाना है. संविदा शिक्षकों के वेतनमान संबंधी मामलों पर भी फैसला लेना है. ऐसे में माना जा रहा है कि वित्त विभाग न्युनतम औपचारिकता के बाद तेजी से फैसले करे.

इसलिए वित्त विभाग के प्रिंसिपल सेक्रट्री के पद पर रवि मित्तल को लाया गया है. श्री मित्तल वाणिज्य कर विभाग के प्रधान सचिव हैं. वह उसके प्रभार में भी बने रहेंग.

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