1977 में लोकसभा चुनावी जीत का विश्व इतिहास रचने वाले राम विलास पासवान अपने राजनीतिक जीवन के सर्वाधिक पतनकाल से गुजर रहे हैं.chirag-reena-paswan-bash_019

इर्शादुल हक

1969 में जब वह पहली बार विधायक चुने गये तब से अब तक का उनका राजनीतिक जीवन 44 साल का हो चुका है.इतनी लम्बी पारी खेलने के बाद आज उनकी पार्टी का एक भी लोकसभा सांसद नहीं है. हां बिहार विधानसभा में अभी भी उनकी उपस्थिति नाम भर है.

68 के हो चुके पासवान अपनी राजनीतिक भविष्य और राजनीतिक विरासत को लेकर शायद इतने कभी चिंतित नहीं रहे जितना के आज हैं. ऐसे में वह उम्मीद का आखिरी “चिराग”, चिराग पासवान में देख रहे हैं.चिराग पासवान उनके बेटे हैं.

राम विलास पासवान ने, भारत के अधिकतर नेताओं की तरह अपने राजनीतिक रसूख का लाभ अपने परिवार को देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है पर आजतक उनकी विरासत को ऊचाई तक पहुंचाने का दमखम किसी में नहीं दिखा. वैसे पासवान ने भाई से लेकर दामाद और समधी तक को आजमा लिया है. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या उनके बेटे चिराग पासवान उनकी राजनीतिक विरासत को बचा पाने की दिशा में कुछ कर पायेंगे, जैसा कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कर दिखाया?

बहस

इस सवाल पर बहस करने से पहले पासवान परिवार पर एक नजर डालना दिलचस्प होगा.

1969 विधायक और 1977 में सांसद बनते ही राम विलास पासवान ने अपने भाई पशपति कुमार पारस को राजनीति के मैदान में उतार दिया था. पारस लगातार विधायक रहे और 2010 में हारे. पर एक लीडर के रूप में पारस कभी पहचान नहीं बना सके. न तो वह एक प्रभावकारी वक्ता साबित हुए और नहीं राजनीतिक दृष्टि या रणनीति के स्तर पर उन्होंने कोई उपलब्धि हासिल की.

पारस के बाद पासवान ने अपने दूसरे भाई राम चंद्र पासवान को 1998 में रोसड़ा से चुनाव लड़वाया पर वह हार गये. लेकिन रामचंद्र पासवान 1999 में चुनाव जीत गये. राम चंद्र पासवान भी राम विलास पासवान के आभामंडल से बाहर नहीं निकल पाये. रामविलास को अलग करने पर न तो पशुपति पारस की कोई अपनी निजी राजनीतिक पहचान बनी और न ही रामचंद्र की.

दूसरी तरफ राम विलास पासवान 1989 में वीपी सिंह सरकार में केंद्र में मंत्री बने. और उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनती चली गयी. वह भाजपा सरकार में भी केंद्र में मंत्री रह और कांग्रेस के दौर में भी.

पासवान कुनबा

रोहित कुमार सिंह:महासचिव लोजपा
रोहित कुमार सिंह:महासचिव लोजपा

इस दौर में रामविलास ने अपने कुनबे को आगे करने का सिलसिला जारी रखा. 2005 में उन्होंने अपने ममेरे भाई महेश्वर हजारी को विधायक बनवाया. हजारी 2009 में साथ छोड़ गये.

हजारी के अलावा रामविलास के समधी पुणित राय भी विधायक हुए. पर किसी में वह दमखम नहीं दिखा जो राजनीतिक के मैदान में अपनी पहचान बना सके. सगे भाई, ममेरे भाई और भगिन पतोह के अलावा रामविलास ने अपने अपने दामादों को भी राजनीति में आजमाने की पूरी कोशिश की. पर सच्चाई तो यह है कि पासवान परिवार का कोई भी व्यक्ति कुछ खास नहीं कर सका. भगिन पतोह सरिता पासवान 2010 मं सोनवरसा से चुनाव हार गयीं.

दूसरी तरफ राम विलास ने अपने दामादों को संगठन में लाकर उनसे उम्मीदें पालीं पर यहां भी उनके कुनबे ने कुछ असर नहीं दिखाया. उनके दो दामाद राजनीति में हैं पर गुमनामी के शिकार हैं. एक दामाद मृणाल पासवान लोजपा के बिहार इकाई के उपाध्य हैं तो दूसरे दामाद अनिल साधु लोजपा के सहयोगी संगठन दलित सेना के प्रदेश अध्यक्ष हैं. अनिल साधु और मृणाल पासवान ने 2010 में विधान सभा चुनाव में किस्मत तो आजमाया पर दोनों को निराश होना पड़ा.

राम विलास पासवान के लिए 2005 का वर्ष बड़ा महत्वपूर्ण रहा. इसबार हुए चुनाव में बिहार विधान सभा में इनके 29 विधायक जीते. पर यह जीत काम न आ सकी क्योंकि तब किसी की सरकार नहीं बनी. तब आनंद मोहन, लवली आनंद, नागमणि, अनवारुल हक जैसे जमीनी नेता इनके साथ थे. अब पासवान अकेल पड़ चुके हैं.

तरकश का आखिरी तीर

ऐसे में चिराग पासवान को अपनी उम्मीद का का आखिरी चिराग समझते हुए राम विलास ने इस इकलौते बेटे को लोजपा संसदीय दल का अध्यक्ष बना कर अपने तरकश का आखिरी तीर चलने की कोशिश की है.

चिराग के संसदीय दल का अध्यक्ष नियुक्त किये जाने पर पार्टी के महासचिव रोहित कुमार सिंह कहते हैं- चिराग पासवान जी एक स्वाभाविक नेता हैं वह संघर्ष के रास्ते से आगे बढ़ना चाहते हैं. उनमें राजनीतिक नेतृत्व की संभावनायें काफी हैं. रोहित कहते हैं जिस गंभीरता से चिराग पासवान ने राजनीति को स्वीकार किया है उसका परिणाम आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा.

चिराग एक राजनेता के पुत्र होते हुए भी राजनीति से दूर ही रहे हैं और उन्होंने राजनीति को अपना करियर बनाने के बजाये फिल्मों को चुना. पर उनकी अनेक फिल्में असफल साबित हुई हैं. ऐसे में वह राजनीति में क्या कर सकते हैं अभी यह देखा जाना बाकी है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और आईएएनएस न्यूज एजेंसी के बिहार ब्यूरो चीफ इमरान खान, चिराग के बारे में कुछ और ही राय रखते हैं. इमरान कहते हैं. चिराग ने राजनीतिक के संघर्ष को नहीं देखा है. वह ऊपर से ठीक वैसे ही अवतरित हुए हैं जैसे कद्दावर नेते कर्पुरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर, ललित नारायण मिश्र के बेटे विजय कुमार मिश्र और जगन्नाथ मिश्र के बेटे रजनीति में अवतरित हुए.

इमारान कहते हैं- बिहार का मूड उत्तर प्रदेश, तमिल नाडू, आंध्र प्रदेस से अलग है. यहां की जनता किसी राजनेता के बेटे को सिर्फ इसलिए नेता स्वीकार नहीं करती कि वह कितने बड़े नेता का बेटा है. ऐसे में चिराग से बहुत उम्मीदें पालने वाले लोग गफलत में हैं.

हालांकि लोजपा के महासचिव रोहित कुमार सिंह कहते हैं राजनेता का बेटा स्वाभाविक नेता होता है या नहीं यह बहस का मुद्दा बना रहता है पर जिस तरह से फारूक अब्दुल्लाह के बेटे उमर अब्दुल्लाह, मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव, शीबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन ने अपने संघर्षों के बल पर खुद को स्थापित किया है. इसलिए आने वाले समय में दुनिया चिराग पासवान की काबिलियत की परख करेगी, इसमें दो मत नहीं है.

वैसे लोजपा में कर्मठ और जमीनी नेताओं की लम्बी कतार से इनकार नहीं किया जा सकता जो पार्टी में नयी जान फूकने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. इनमें कर्पूरी के निकट सहयोगी रहे पार्टी महासचिव सत्यानंद शर्मा, पूर्व विधायक अनिल चौधरी, पूर्प्रव सांसद सूर्य नारायण यादव, ललन चंद्रवंशी, महासचिव राघवेंद्र सिंह कुशवाहा, महासचिव रोहित कुमार सिंह, विजय सिंह आदि के नाम शामिल हैं.

अब चिराग अपने नेतृत्व से कितना असर डाल पाते हैं इसका अंदाजा 2014 से लगना शुरू हो जायेगा जब लोकसभा के चुनाव होंगे और उसके बाद बिहार विधान सभा के.

By Editor

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