लालू की तेजस्वी से उम्मीदें

जेल जाने से पहले लालू बेटे तेजस्वी को पिछले एक साल से प्रशिक्षण दे रहे थे. सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए कितना तैयार है तेजस्वी, पढ़ें इन दो मुलाकतों के निहतार्थlalu.tejaswi

इर्शादुल हक

एक

नवम्ब 2010 के आखिरी हफ्ते में जब नीतीश आरजेडी को करारी मात देकर लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो सभी पत्रकार स्वाभाविक तौर पर अण्णे मार्ग की तरफ भाग रहे थे. इसके बरअक्स हमने फैसला किया कि हम लालू प्रसाद से मिलेंगे. एक दिन सर्दियों की सुबह हम सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी देवी के आवास पहुंचे.लालू, लुंगी पहने एक कुर्सी पर बैठे थे. उनके पैर दूसरी कुर्सी पर थे और सामने के टेबुल पर अखबारों का ढ़ेर था. आवास में सन्नाटा पसरा था. कभी लोगों के बैठने के लिए कम पड़ जाने वाली कुर्सियां थाक लगा कर एक दूसरे पर रखी पड़ी थीं.

करीब डेढ़ घंटे की लम्बी मुलाकात-बात में हम सोचते रहे कि क्या लालू कमबैक करेंगे. लालू के चेहरे पर हार का दुख तो प्रतिबिंबित हो रहा था पर भविष्य को लेकर काफी आशान्वित भी थे. वह बार बार बताते रहे कि नीतीश अपनी गलतियों से जायेंगे और हम पुनर्वापसी करेंगे. पिछले तीन सालों में बिहार उसी दिशा में बढ़ता रहा. इस बीच लोकसभा उपचुनाव हुए और लालू की पार्टी ने वापसी करते हुए जद यू को भारी अंतर से हराया भी. लालू बड़ी रणनीतिक तौर पर आगे की तरफ बढ़ रहे थे. वह सामाजिक न्याय की धारा को जहां मजबूत करने की कोशिश में थे वहीं सवर्ण समाज को भी जोड़ने में लगे थे. लालू की रैलियों में भीड़ की वापसी भी होने लगी थी.

पर चीजें बदलीं अदालत ने लालू प्रसाद को चारा घोटाले में दोषी करार दिया और वह जेल चले गये. अब कुछ विश्लेषक यह घोषित कर रहे हैं कि अब लालू के राजनीतिक जीवन का अंत हो गया. अब न लालू की पार्टी बचेगी और न लालू के सामाजिक न्याय की धारा.

लालू ने सामाजिक न्याय की धारा को पुनर्परिभाषित किया था. कर्पुरी ठाकुर और लोहिया के विचारों को आगे बढ़ाया था. पिछड़े समाज को जुबान दी थी. उनके अंदर अपने अधिखारों को छीनने का जोश और जज्बा दिया था. सामाजिक न्याय की यह चेतना अब इतनी प्रबल और इतनी मजबूत हो चुकी है कि यह किसी दबाव, किसी अवरोध के सामने रुकने वाली नहीं है. हां कुछ गतिशीलता में कमी आ सकती है.
सामाजिक न्याय एक विचारधारा है. ठीक वैसे ही जैसे दलितवाद, हिंदुत्ववाद, सेक्युलरवाद. कोई भी विचारधारा किसी संगठन से मजबूती पाती है. फलती है और फैलती भी है. आप किसी व्यक्ति के खात्मे से विचारधारा के खात्मे की बात नहीं कर सकते. जैसे हिंदुत्व की विचारधारा न तो भाजपा के वजूद के साथ आयी है और न ही उसके साथ खत्म होगी, ठीक वैसे ही सामाजिक न्याय की धारा लालू के जेल जाने से खत्म होने की उम्मीद पालने वाले गफलत में हैं.

आने वाले दिनों में सामाजिक न्याय की विचारधारा मजबूती से बढ़ेगी. सांगठनिक तौर पर इस विचारधारा में कुछ बिखराव, ठहराव दूसरी चीज है.राजनीतिक अवसरवादिता और सत्ता समीकरण के पैमाने पर विचारधारा को परखने वाले लोग जल्दबाजी में हैं.

दो

हम सितम्बर के पहले हफ्ते में लालू प्रसाद के दूसरे बेटे तेजस्वी यादव से मिले थे. यह मुलाकात लगभग दो घंटे की थी. पत्रकारों और विश्लेषकों की एक बड़ी संख्या यह स्वीकार करने को तैयार नहीं कि तजस्वी यादव सामाजिक न्याय की धारा को आगे बढ़ाने में सक्षम हो सकेंगे. यह नतीजा निकालना भी जल्दबाजी ही है.

सच्चाई यह है कि लालू प्रसाद को पिछले एक साल से यह आभास था कि उन्हें तेजस्वी को इस काबिल बनाना होगा कि वह सामाजिक न्याय की धारे को आगे बढ़ायें. बहुत कम लोगों को पता है कि तेजस्वी पिछले एक साल से सामाजिक न्याय के आंदोलन को आगे बढ़ाने की ट्रेनिंग ले रहे हैं. इस एक साल में तेजस्वी के मनमस्तिष्क में यह बिठाया जा चुका है कि दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के इंसाफ की लड़ाई में जबर्दसत पोटेनशियल हैं.

तेजस्वी का प्रशिक्षण

तेजस्वी की दीक्षा इसी पैटर्न पर जारी थी. सामाजिक न्याय के अनेक पुरोधाओं, प्रशासकों, पूर्व नौकरशहों और विशेषज्ञों की टीम ने तेजस्वी में वह आवेग और समझ भरने की कोशिश की है जिसके बूते तेजस्वी की आगे की रणनीति तय होने वाली है. लालू प्रसाद ने रात के एकांत में और फुर्सत की दोपहरी में तेजस्वी को कई महत्वपूर्ण पाठ भी पढ़ाया है. उन्होंने तेजस्वी को सबसे पहले यह सिखा दिया है कि राजनीति में उसके सबसे बड़े विरोधी कौन और किस विचारधारा के लोग है. लालू ने यह भी समझाने सिखाने की कोशिश की है कि सामाजिक न्याय के विरोधियों से छिड़ने वाली जंग में उन्हें किन और कैसे लोगों से खतरा है. लालू, तेजस्वी को लेकर आश्वस्त हैं. जिस दिन 29 सितम्बर को उन्हें चारा घोटाले में अदालत ने दोषी करार दिया उस दिन लालू ने फोन पर बात करते हुए राबड़ी से कहा भी- “घबड़ाये के कौनो बात नइके, तेजस्वी सब संभाल लिहें”.

तेजस्वी के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल नहीं है कि आरजेडी के मौजूदा सांगठनिक ढांचे में उनकी क्या भूमिका होगी. यह अलग बात है कि आरजेडी पर पकड़ मजबूत करना जरूरी है. पर उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि आने वाले दशकों में सामाजिक न्याय की धारा को मजबूती के साथ आगे ले जाने के लिए जो वैक्युम, लालू प्रसाद के न रहने से क्रियेट हुआ है, उसे कैसे भरा जाये.
तेजस्वी इसी दिशा में काम कर रहे हैं. वह लम्बी लड़ाई की तैयारी में हैं.

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