लालू प्रसाद के नाम खुला खत: मुस्लिम युवाओं को ओवैसी के पाले में जाने से रोकिये

कैबिनेट गठन के बाद अब राज्य सभा में मुसलमानों की भागीदारी के मामले पर गठबंधन के रुख पर हमारे सम्पादक इर्शादुल हक ने लालू प्रसाद यादव के नाम एक खुला खत लिखा है.lalu.owaisi.nitish

आदरणीय लालू जी

राज्य सभा और विधान परिषद चुनाव की गहमा गहमी पर मुस्लिम युवाओं की सोशल मीडिया में तीव्र प्रतिक्रिया है. आप इन प्रतिक्रियाओं से अवगत होंगे. मुस्लिम समाज खुद को ठगा महसूस कर रहा है. ठगा इसलिए कि जिन मुसलमानों ने, आपके गठबंधन को भर-भर टोकरी वोट किया उनकी नुमाइंदगी राज्यसभा में गोल कर दी गयी. याद दिलाऊं कि मुसलमानों ने यादवों से भी ज्यादा आक्रामक वोटिंग गठबंधन के पक्ष में की थी. ऐसा नहीं था कि बिहार के मुसलमानों के पास कोई और विक्लप नहीं था. जिस तरह यादव समाज के पास एनडीए विक्लप के रूप में मौजूद था, उसी तरह मुसलमानों के पास असदुद्दीन ओवैसी की एआईआईएम विकल्प के रूप में सामने थी. पर मुसलमानों ने ओवैसी को धूल चटा दी और सेक्युलरिज्म की मजबूती के लिए आपके साथ हो लिये.

सेक्युलरिज्म और कम्युनलिज्म पर कुछ और बातें मैं आप से करना चाहूंगा पर उससे पहले सामाजिक न्याय की ही बात कर लेते हैं.

लालू जी ! मुसलमानों का एक बड़ा तबका गठबंधन के हर कदम को बड़ी बारीकी से देख रहा है. वह देख रहा है कि गठबंधन ने भले ही राज्यसभा में चार में से एक भी मुस्लिम कंडिडेट न दिया हो पर विधान परिषद में तीनों घटक दलों ने एक-एक मुस्लिम उम्मीदवार दिया है. यह राज्यसभा की भरपाई तो कत्तई नहीं पर राजनीतिक विवशताओं को ध्यान में रखें तो आंशिक रूप से ही सही, यह बहुत बुरा भी नहीं है. पर यहां जो सवाल है उसकी गंभीरता की तरफ आपका ध्यान खीचना जरूरी है.

सेक्युलरिज्म है पर समाजिक न्या भी दिखे
लालू जी! आपकी राजनीति के दो मूलमंत्र रहे हैं- सेक्युलरिज्म और समाजिक न्याय. सेक्युलरिज्म के मोर्चे पर आप लगातार 1990 से ले कर आज तक चट्टान की तरह डटे हुए हैं. सो सेक्युलरिज्म पर मुसलमानों की ओर से आप से कोई सवाल नहीं है. पर सामाजिक न्याय के मामले में उनका बड़ा सीरियस सवाल आप से है.

सामाजिक न्याय की जब भी बात आती है तो आप इसे हिंदू समाज के दायरे में कैद कर के लेते हैं. 2015 के चुनाव परिणामों के बाद मंत्रिमंडल के गठन से ले कर विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवारी के मामले पर गठभंधन ने जो रवैया अपनाया है वह चिंतजनक है.

चिंताजनक बात यह है कि मंत्रिमंडल के गठन में हिंदू समाज के प्रतिनिधित्व की बात आयी तो आपके गठभंधन ने काफी ठोक बजा कर इस बात का ख्याल रखा कि पिछड़ा, दलित व अतिपिछड़ा समाज की भागीदारी अनुपातिक रूप से हो. मंत्रिमंडल का चेहरा देखने से भी यह पता चल जाता है. निश्चित रूप से आपके गठबंधन ने सामाजिक न्याय के सिद्धांत का  बखूबी पालन करने की कोशिश की. पर जब बारी मुसलमानों की आयी तो आपका सामाजिक न्याय नहीं दिखा.

मुस्लिम समाज के अंदर क सामाजिक न्याय

नीतीश कैबिनेट में चार मुसलमानों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. पर आप खुद बतायें कि मुसलमानों के मामले में सामाजिक न्याय का कितना पालन हुआ? इन चार मंत्रियों में मुसलमानों के पिछड़े समाज का कौन है? बिहार के मुसलमान नवम्बर 2015 में कैबिनेट गठन से दंग थे. लेकिन अब जब दो रोज पहले विधान परिषद के उम्मीदवारों के चयन का फैसला सार्वजनिक किया गया तो मुसलमानों का बहुसंख्य वर्ग फिर हत्प्रभ रह गया. राजद, जद यू और कांग्रेस- तीनों ने एक-एक मुस्लिम प्रत्याशी घोषित किया. इन में एक भी पिछडे समाज का न था. जबकि मुसलमानों की कुल संख्या का 85 प्रतिशत पिछड़े मुसलमानों का है. और इस आबादी का प्रतिनिधित्व कैबिनेट में शून्य तो है ही, विधानसभा में भी इनका प्रतिनिधित्व केवल 4 है. परिषद में जो नये चेहरे आने वाले हैं, उससे क्या आपको लगता है कि मुसलमानों के अंदर का यही सामाजिक न्याय है?

निगम, बोर्ड व आयोगों में क्या होगा?

मुसलमानों के अंदर का 85 प्रतिशत वाला बहुसंख्य वर्ग ने कैबिनेट गठन के वक्त सब देखता रहा. चुप रहा. इसी वर्ग ने दो रोज पहले विधान परिषद में उम्मीदवारों के चयन को भी देखा. और सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दिखायी. और अब तीसरा मौका कुछ ही दिन में आने वाला है. जब राज्य के निगमों, बोर्डों, आयोगों के जिम्मेदारों का चयन किया जाने वाला है. अब मुसलमान तीसरी बार देखेंगे कि आप इन निगमों, बोर्डों और आयोगों में मुसलमानों की भागीदारी तय करते वक्त सामाजिक न्याय के किस फार्मुले का पालन करते हैं.

ओवैसी की तरफ उम्मीदें

लालूजी, सामाजिक न्याय के बात के बाद एक बार फिर से सेक्युलरिज्म पर आखिरी बात आप से शेयर करनी है. मैं ने ऊपर कहा कि मुसलमानों ने सेक्युलरिज्म की रक्षा के लिए औवसी को सिरे से नकार दिया. मुसलमानों ने आपको अपना लीडर माना. अब आपकी जिम्मेदारी है कि उनको यह महसूस हो कि उन्होंने आप पर भरोसा जता कर ठीक किया. लेकिन वोटर की हैसियत से आगे भी उनकी कुछ हैसियत है, इसका ख्याल भी आपको रखना चाहिये. यह कोशिश करनी होगी कि मुसलमानो में यह फिलिंग्स न आये कि सेक्युलरिज्म के नाम पर राजनीतिक दल उनका वोट तो ले लेते हैं पर सत्ता की भागीदारी में उन्हें औंधे मुंह पटक दिया जाता है. जब यह एहसास मुसलमानों में बलवती होगी तो यह याद रखना होगा असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम वोटरों की भावनाओं का दोहन करने के लिए बिहार में पांव पसार चुके हैं. यह नहीं भूलना चाहिए कि ओवैसी की टीम विधानसभा चुनाव में हार के बाद हाथ-पर हाथ धरके नहीं बैठी है. उनकी टीम जमीन पर मजबूती से काम कर रही है और मुसलमानों द्वार गठबंधन को वोट करने और ठगे जाने की याद बार-बार दिलाया जा रहा है. उन्हें 2019 के चुनाव का इंतजार है.

About The Author

इर्शादुल हक ने बर्मिंघम युनिवर्सिटी इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त की.भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की.फोर्ड फाउंडेशन के अंतरराष्ट्रीय फेलो रहे.बीबीसी के लिए लंदन और बिहार से सेवायें देने के अलावा तहलका समेत अनेक मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे.अभी नौकरशाही डॉट कॉम के सम्पादक हैं.

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One comment

  1. How long do Muslims have depend on Lalu’s, Mulayam’s, Maya’s . . . are muslims so incapable . . . do they lack the numbers, the intellect, the political acumen, the vision, the wisdom etc etc . . . aren’t Muslims tired of being exploited by one and all . . .

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