‘लीव-इन’ रिलेशन: नयी समस्या, नये सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने गैर शादी शुदा मर्द-औरत के संग रहने की बुनियादी पर सम्पत्ति के मालिकाना हक पर फैसला दिया है. साइबर युग और सेक्स चैटिंग के  दौर में इस रिश्ते ने कई सवाल और समस्यायें खड़ी की हैं.live.in

तबस्सुम फातिमा

‘रिश्ते आसमान में बनते हैं’ वाली कहावत अब पुरानी और बेमानी हो चुकी है। अब नया युग है। डिजीटल और साइबर दुनिया संबंधों के नये संवाद में खो कर पसोपेश में पड़ी है। आम आदमी से उच्च न्यायालय तक की पीड़ा है कि एक्कीसवीं शताब्दी के नये अनुभवों और रिश्तों के नये मापदंड की कसौटी पर उन्हें दकि़यानूसी और पिछड़ा न समझ लिया जाये।

हर बार नये संबंधें की गाथायें और नये फैसले चैंकाने और उलझे हुए प्रश्नों के साथ नई समस्याओं के दरवाजे भी खोल रहे हैं। लिव इन संबंधों पर सुप्रिम कोर्ट का  हालिया  इसी सिलसिले की एक कड़ी है। राहत की सांस लेने वालों के लिए सम्भव है इस तरह के फैसले नयी उम्मीदें जगायें, लेकिन कट्टरपंथियों के लिए बुरी खबर है कि सुप्रीम कोर्ट की मान्यता मिलने पर विवाह की धार्मिक पद्धति हाशिये पर फेंक दी जायेगी, या बेमानी हो कर रह जायेगी।

हक की बात

कानून का अपना पेंच है कि दो बालिग यदि बिना विवाह किये कई वर्षो से एक साथ रहते हैं तो वे शादीशुदा जोड़े माने जायेंगे। पति के मरने पर महिला को उसकी सम्पत्ती का भी अधिकार एक पत्नी की तरह होगा। और यदि बच्चा होता है, तो बच्चे को भी वैध माना जायेगा।
दरअसल इस निर्णय के पीछे संपत्ति का विवाद था- एक बुजुर्ग के साथ 20 साल तक एक औरत रही, परिवार वालों की दलील थी कि दोनों ने शादी नहीं की थी इसलिए महिला का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं बनता है- सुनवाई के दौरान शादी होने का सबूत प्रदान न किए जाने के बावजूद अदालत ने इस महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि 20 साल तक अगर दोनों साथ थे तो महिला को स्वतः पत्नी का दर्जा प्राप्त हो जाता है-

कंडोम कल्चर

नये दौर में हम एक ऐसी कंडोम सभ्यता में प्रवेश कर गए हैं जहाँ माँ बाप की आँखों से नींद हराम हो गई हैं- लैपटाॅप और मोबाइल कल्चर ने यौन और स्वतंत्रा जीवन का जो मानक स्थापित किया है, उस पर प्रतिबंध लगाना सरकार और परिवार के लिए एक मुश्किल काम है- खासकर बड़े शहरों में आप रात के समय अकेले कमरे में अपने बच्चों के बारे में कैसे सोच सकते हैं कि इस समय वह क्या कर रहे होंगे? वे पढ़ रहे होंगे या किसी पोर्न साइट का मज़ा ले रहे होंगे या फिर अपनी प्रेमिका के साथ बातचीत या सेक्स चैट में व्यस्त होंगे- इस तेज़ वैज्ञानिक युग ने स्कूल और काॅलेज में पढ़ने वाले बच्चों को समय से पहले ही बालिग कर दिया है- एक सर्वेक्षण के अनुसार केवल भारत में मानसिक रोगी बच्चों की संख्या में इन दस वर्षों में भारी वृद्धि हुई है-

लिव इन रिलेशनशिप इसी सभ्यता की देन है- काफी हद तक मीडिया और फिल्मों ने भी स्वतंत्रता के इस रास्ते पर अपनी तरफ से एक सकारात्मक मुहर लगाई है- नैतिकता के उदाहरण और सभ्यता से अलग अब तक के इतिहास में दो वयस्कों का साथ रहना बुरा ही माना जाता रहा है- लेकिन शायद बड़े शहरों में यह मजबूरी भी है और कुछ की जरूरत भी- कानून अब साथ रहते हुए ऐसे संबंधों को बलात्कार की श्रेणी में नहीं मानती- इसलिए ऐसे संबंधों को भी कानून वैध होने का दर्जा देती है। पिछले कई वर्षों से कानून लिव इन मामलों को लेकर उलझा हुआ है। लेकिन अब 13अप्रैल 2015 सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले ने इस संबंध में कानूनी मुहर लगाने का काम किया है-

नयी समस्या, नये प्रश्न

यहां बहुत से प्रश्न हैं जिसका सामना भविष्य में आम आदमी से औरत और न्यायालय को करना बाकी है। पहला प्रश्न तो यही है कि क्या एक सम्पूर्ण समाज इस उदरवादी नजरिया या बिना वैवाहिक बंधन के ‘लिविंग टूगेदर’ की संस्कृति को अपनी स्वीकृति देगा? नैतिक मूल्यों के आधार पर अभी हम इतने प्रगतिशील नहीं हुए कि ऐसे मामलों में सर्वसम्मति बन सके।
सहजीवन संस्कृति पर सबसे पहले महिला ही प्रश्नों के कटघरे में आती है। एक तरफ वो आज़ाद महिला है तो समाज और टकराव की परवाह किये बिना स्वतंत्रा जीवन को सलाम करती है। दूसरी तरफ वह कमजोर महिला भी है, जिसके लिए कानूनी फैसले में अंतिम सांसों तक के लिए एक राहत है। अथार्त गुजर-भत्ता, बच्चा से लेकर कानून द्वारा मिली हुई पत्नी का अधिकार भी उसे प्राप्त है। आजाद महिला लिव इन संबंध को अपनी मर्जी के आधार पर बिना किसी दबाव के चुनती है। कानून उसे नये विकल्प चुनने के लिए कमजोर करेगा।
इन संबंधों और न्यायिक प्रक्रिया से धर्म और समाज पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। विवाह से पति-पत्नी के अलावा परिवार और समाज में उसके कई दूसरे रिश्ते भी बनते हैं। नैतिकता का बोझ उठाये हुआ एक बड़ा समाज अभी भी इन रिश्तों पर असहमति की लकीर खींचे हुआ है। इसलिए कानूनी फैसले भले ऐसे कुछ जोड़ों को राहत देने का काम करें, लेकिन अनेकों पेंच के साथ औरत अभी भी कैद और घुटन का शिकार है। इन नये संबंधों को लेकर परिवार भी उलझा हुआ है। न्याय और कानून भी।
 तबस्सुम फातिमा से    tabassumfatima2020@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

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