बीमार लोकनीति, बदहाल राजनीति

लोकनीति का अर्थ है लोक राजनीति और राजनीति का अर्थ है सत्ता की राजनीति। 1974 का बिहार आंदोलन लोकनीति का ही परिणाम था। 1990 के बाद सिविल सोसाइटी की भी सक्रियता बढ़ी। दोनों ही सरकार पर जनपक्षीय नीति लागू करने के लिए प्रेशर ग्रुप का काम करते हैं।parlament2

कुमार अनिल, पत्रकार दैनिक भास्कर

बहुतोंं के लिए ‘लोकनीति’ अनजाना शब्द हो सकता है, पर इसी बिहार में आज से 40 साल पहले बिहार आंदोलन के दौरान लोकनीति तब की राजनीति के समानांतर खड़ी थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चला आंदोलन लोकनीति का ही परिणाम था, जिसने देश की राजनीति को ही बदल दिया। लोकनीति मतलब लोक राजनीति और राजनीति मतलब सत्ता की राजनीति। जेपी के नेतृत्व में शहर के मुहल्लों से लेकर गांव तक कई तरह के संगठन थे, जो जनता के सवालों को मजबूती से उठाते थे, जिसकी कोई दल और नेता उपेक्षा करने की स्थिति में नहीं थे। तब ‘जनता सरकार’ थी, जो ‘जनता कर्फ्यू’ तक लगाती थी। बाद के दिनों में ‘जन सुनवाई’ लोकनीति का कारगर स्वरूप बना। लोकनीति ने लोगों में भारी उम्मीदें पैदा की थीं। पर आज हालात क्या हैं?

राजनीति का अर्थ हो गया है किसी भी तरह से सत्ता हासिल करना। अपशब्दों आरोपों का इस्तेमाल इस प्रकार हो रहा है कि सब एक ही रंग में रंगे दिखें और जनता के लिए फर्क करना मुश्किल हो जाए। जाति और धनबल का महत्व बढ़ता जा रहा है। अब जेपी हैं और 1974 जैसा आंदोलन, तो क्या राजनीति ऐसे ही स्वेच्छाचारी ढंग से बढ़ती रहेगी और पब्लिक असहाय रहेगी?

सिविल सोसाइइटी
पश्चिमी देशों में लोकनीति से मिलता-जुलता नाम रहा है सिविल सोसाइटी। इसमें तमाम गैर सरकारी संगठन आते हैं, जो जन कल्याण अथवा सरकार पर प्रेशर ग्रुुप का काम करते हैं।
वैश्वीकरण के बाद कई संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं। इनमें मानवाधिकार, पर्यावरण जैसे मुद्दों पर काम करनेवाले संगठन चर्चित रहे हैं, जो अनेक देशों की सरकारों को अपनी नीतियों में बदलाव के लिए प्रेरित करने में सफल रहे हैं। हेगेल ने सिविल सोसाइटी को सामाजिक वर्गों के अंतरविरोध के रूप में देखा और माना कि यह राजसत्ता के ऊपरी संस्थानों में, जहां उच्च नीति संबंधी मानकों पर काम होता है, हल किया जा सकता है। हेगेल के विपरीत मार्क्स ने सिविल सोसाइटी को पूंजीवादी संस्थाओं के बीच अंतरविरोध के रूप में देखा और कहा कि इसका हल उस पूंजीवादी राजसत्ता में संभव नहीं है।

भविष्य में यह वर्ग संघर्ष में परिवर्तित होगा, जो खुद उस राजसत्ता का विलोप कर देगा। शायद इसीलिए भारत में मार्क्सवादी दलों ने सिविल सोसाइटी के महत्व को शुरू में नहीं माना, जबकि इसी दौर में कई एनजीओ सरकार पर जनपक्षीय नीति बनाने के लिए प्रेशर ग्रुप के बतौर सफल रहे। मार्सवादी उन्हें पूंजीवादी व्यवस्था का शॉक एब्जार्बर ही मानते रहे हैं। बहुत बाद में ग्राम्सी के विचारों को कई कम्युनिस्ट पार्टियों ने स्वीकारा कि सांस्कृतिक संगठनों से लेकर ट्रेड यूनियनों और गैर सरकरी संगठनों, एनजीओ के रूप में काम कर रहे अनेक स्वतंत्र संगठनों की भी राजनीतिक बदलाव में सकारात्मक भूमिका हो सकती है।
बाकी हैं उम्मीदें

दिल्ली में आप सरकार से पहले चला आंदोलन भी एक हद तक लोकनीति का ही परिणाम था। इसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलानेवाले से लेकर पर्यावरण तक के लिए सक्रिय संगठन शामिल थे। बाद में आंदोलन में शामिल नेताओं ने राजनीतिक दल बना लिया। स्वाभाविक तौर पर आंदोलन की तीव्रता कम हो गई। 1974 आंदोलन के बाद 1977 में जनता सरकार बनने के बाद भी ऐसा हुआ था। हालांकि 1977 के बाद भी पीयूसीएल और छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी जैसे संगठन राजनीति और सरकारी नीतियों पर सवाल उठाते रहे। 1990 के बाद उदारीकरण के दौर में लोकनीति पर काम करनेवाले संगठन कमजोर होते गए।

बदलाव के वाहक

अन्ना आंदोलन की सफलता के बाद कई विशेषज्ञों ने कहा कि चूंकि दिल्ली में बड़ा मध्य वर्ग है, इसीलिए वहां सिविल सोसाइटी सक्रिय है, पर बिहार में सिविल सोसाइटी उतनी मजबूत नहीं है, इसीलिए यहां ऐसा प्रयोग सफल नहीं हो सकता। यह कृषि प्रधान राज्य है और यहां शहरी मध्य वर्ग का विस्तार नहीं है। ऐसे विचार को 1974 का बिहार आंदोलन खारिज करता है। तब बिहार के शहर और कॉलेज ही नहीं, गांव-गांव में विभिन्न तरह के संगठन सक्रिय हो उठे थे। जेपी तो स्वतंत्रता आंदोलन को भी राजनीति के बजाय लोकनीति से ही जोड़ कर देखते थे।

हां यह ठीक है कि जिस तरह दिल्ली में सिविल सोसाइटी ने एक दौर में राजनीति को प्रभावित किया, उसे बिहार में उसी रूप में दुहराया नहीं जा सकता, पर आज की राजनीति के कई नकारात्मक पहलुओं से चिंतित में तबके लिए उम्मीदें खत्म नहीं हुई हैं। उम्मीदों का स्रोत लोकनीति ही है। ठीक है कि आज जेपी नहीं हैं, लेकिन छोटे-छोटे समूह बनाए जा सकते हैं, जो अपने बच्चों को मैट्रिक परीक्षा में नकल कराने के लिए स्कूल की दीवारों पर चढ़ते लोगों से भी सवाल करे और वोट के लिए जातीय उन्माद पैदा करनेवाले प्रयासों से भी सावधान करे। ऐसे छोटे-छोटे समूहों का गैर दलीय होना जरूरी होगा। लोकनीति को मजबूत करके ही राजनीति को जनपक्षीय बने रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

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