लोकप्रियता में नीतीश पर इक्कीस पड़े सुशील मोदी

नीतीश कुमार की सरकार में भाजपा के नेता सुशील मोदी का कद पदसोपान में भले उन्नीस हो, लेकिन पुस्तक की लोकप्रियता में मोदी इक्कीस साबित हुए। पिछले 11 अक‍टूबर को विद्यापति भवन में प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सुशील मोदी की पुस्तक ‘लालू लीला’ को भाजपा वाले ‘लूट’ ले गये थे, लेकिन आज लोकसभा में नीतीश कुमार के भाषणों का संकलन ‘संसद में विकास की बातें’ को कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था।

 वीरेंद्र यादव

विधान परिषद के एनेक्सी में आज नरेंद्र पाठक द्वारा संपादित पुस्तक ‘नीतीश कुमार: संसद में विकास की बातें’ का लोकार्पण राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने किया। लोकार्पण में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, विधान सभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी, विधान परिषद के कार्यकारी सभापति हारुण रसीद, मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव व श्रवण कुमार, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह समेत सरकार के कई मंत्री और भाजपा-जदयू के विधान पार्षद व विधायक बड़ी संख्या में मौजूद थे।

लोकार्पण समारोह का संचालन कर रहे विधान पार्षद रामवचन राय ने कार्यक्रम की शुरुआत में ही घोषणा की कि प्रकाशक ने सूचना दी है कि 500 रुपये की पुस्तक 300 रुपये में एनेक्सी के गेट पर बने काउंटर पर मिल रही है। यह रियायती कीमत समारोह में शामिल होने आये गणमान्य लोगों के लिए है। उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने अपने संबोधन में दो बार इस पुस्तक को खरीदकर पढ़ने का आग्रह उपस्थित लोगों से किया। उन्होंने पुस्तक खरीदने के फायदे भी बताये। यह भी विडंबना है कि सुशील मोदी की पुस्तक ‘लालू लीला’ को खरीदने वाले बिना आग्रह के विद्यापति भवन में पुस्तक काउंटर पर टूट पड़े थे। धक्का-मुक्की की नौबत आ गयी थी। और आज सुशील मोदी के आग्रह पर भी कोई विधायक या विधान पार्षद नीतीश कुमार को ‘खरीदने’ का उत्साह नहीं दिखा रहे थे। हमने कार्यक्रम के दौरान तीन बार सभागार से पुस्तक काउंटर पर आये, लेकिन काउंटर आमतौर पर खाली ही पाया। भीड़ टूटने के बाद भी पुस्तक काउंटर पर ‘शांति’ कायम रही। यह अगल बात है कि रामवचन राय द्वारा काउंटर खोलने की सूचना देने का एक मंत्री ने बाद में विरोध किया था। रामवचन राय के बगल में बैठे एक मंत्री ने कहा कि विधान परिषद परिसर में पुस्तक बेचने की सूचना उचित नहीं है।
सुशील मोदी के आग्रह के दौरान कई सदस्यों ने पुस्तक को मुफ्त में बंटवाने का एक स्वर से आग्रह किया। इससे ‘माननीय’ सदस्यों की मानसिक दरिद्रता का अनुमान आसानी से लगा सकते हैं। जिन विधायक व विधान पार्षदों को प्रतिमाह का वेतन-भत्ता डेढ़ लाख से अधिक है, उन्हें भी अपने ‘लोकप्रिय’ मुख्यमंत्री की पुस्तक मुफ्त में पढ़ने के‍ लिए चाहिए।

लोकार्पण समारोह में एक खास बात यह भी रही कि उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने लालू यादव का एक बार भी नाम नहीं लिया। जबकि आमतौर पर सुशील मोदी का कोई भी सार्वजनिक भाषण लालू यादव पर हमला के बिना पूरा नहीं होता है। हालांकि कई वक्ताओं ने प्रकारांतर में लालू यादव पर हमला करने से नहीं चुके। एक वक्ता ने कहा कि 1974 के नेता ‘कहां-कहां’ पहुंच गये। समारोह में‍ विकास की ऐसी धारा बही कि कई माननीय ‘नींदमग्न’ हो गये।

कार्यक्रम की शुरुआत में संपादक नरेंद्र पाठक ने पुस्तक की चर्चा करते हुए इसके विषयवस्तु पर प्रकाश डाला और प्रकाशन से जुड़ी अन्य बातों को साझा किया। मुख्य अतिथि के रूप में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि यह पुस्तक एक व्यक्ति के संस्था बनने की यात्रा है। 1990 से 2004 के बीच लोकसभा में उनके महत्वपूर्ण भाषणों को संकलन है। विषयों के चयन में जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने जिन समस्याओं को लोकसभा में उठाया था, बिहार में सत्ता में आने का बाद उन्होंने उन समस्याओं के निराकरण का प्रयास भी किया। नीतीश कुमार ने सत्ता का इस्तेमाल न्याय के साथ विकास के लिए किया। यही उनका लक्ष्य है और लक्ष्य हासिल करने का माध्यम भी। और अपने लक्ष्य को हासिल करने में वे सफल रहे हैं।

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