वार्ता तोड़ना नवाजशरीफ के लिए संजीवनी जैसा

पाकिस्तान एक बिखरी हुई कौम है जो आंतरिक विवादों से घिरा रहता है दूसरा यह कि नवाजशरीफ सरकार मजहबी गुरु ताहिरुल कादिरी और तहरीक ए इंसाफ के नेता इमरान खान के इस्लामाबाद मार्च के कारण मुसीबतों से जूझ रही है, ऐसे में भारत द्वारा, विदेश सचिव स्तर की बातचीत झटके में रद्द करने का फायदा  संकट में घिरे नवाजशरीफ को ही  हो रहा है.modi.nawaz

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

दर असल पाकिस्तान की विदेशनीति वहां के आंतरिक विवादों और बुनियादपरस्त ताकतों से प्रभावित रही है. सेना और आईएसआई दो अलग शक्तियां हैं जो पाकिस्तान की विदेश नीति को तय करते हैं. सात ही यह वह समय है जब पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार जबर्दस्त राजनीतिक दबाव का शिकार है. मजहबी गुरु ताहिरुल कादिरी और तहरीक इंसाफ के नेता  इमरान खान अपने हजारों हामियों को लेकर इस्लामाबाद घेर चुके हैं. अब तो वे यहां तक कह रहे हैं कि अगर नवाजशरीफ सरकार ने इस्तीफा नहीं दिया तो वह उनके आवास में घुस जायेंगे. दूसरी ओर नवाजशरीफ इमरान और कादिरी से वार्ता करने की पेशकश पर पेशकश किये जा रहे हैं लेकिन वे इस्तीफे से कम पर तैयार नहीं हैं. गोया कि पाकिस्तान की नवाज सरकार काफी मुश्किलों में हैं.

ऐसे में भारत सरकार ने 24 अग्सत को होने वाले सचिव स्तर की बातचीत यह कहते हुए एक तरफा रद्द कर दी है कि पाकिस्तान, कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बात करके भारत के आंतिरक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है इसलिए यह बातचीत नहीं होगी.

ढ़ाई महीने पुरानी मोदी सरकार की विदेश नीति के स्तर पर दर असल यह अब तक की सबसे बड़ी भूल है. वार्ता रद्द करके मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश भेजा है कि वह बातचीत में भरोसा नहीं करती. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत के इस कदम की आलोचना स्वाभाविक है.

दूसरी तरफ इस वार्ता को रद्द करने के बाद दोनों देशों के बीच जुबानी जंग भी शुरू हो चुकी है. दोनों राष्ट्र एक दूसरे पर तोहमत लगाने में जुटे हैं. पर सवाल यह है कि पाकिस्तान ने ऐसा क्या कर दिया कि भारत इतने गुस्से में आ गया? भारत का तर्क है कि वार्ता के पहले पाकिस्तानी उच्च आयुक्त भारत के अलगाववादी नेताओं से मिल रहे हैं.  बकौल भारत यह उसके आंतिरक मामलों में हस्तक्षेप है. लेकिन अगर आप 14 साल पहले के पन्नों को पलटें तो पायेंगे कि 2000 में तत्कालीन अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने परवेज मुशर्फ को आगरा शिखर वार्ता के लिए बुलाया. उस समय भी पाकिस्तान ने कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से मुलाकात की. तब तो कोई पहाड़ नहीं टूटा. उलटे भारत ने कहा कि हम लोकतांत्रिक देश हैं और हम किसी को बातचीत से रोकना नहीं चाहते. पर जब उसी भाजपा की मौजूदा सरकार आई तो उसने इसे तिल का ताड़ बना दिया.

संकट में शरीफ

ऐसा करके एक तरह से भारत ने संकट में फंसे नवाजशरीफ सरकार को संजीवनी देने की कोशिश कर दी. उनकी सरकार आंतिरक संकट में है. लेकिन भारत से उसके बढ़ते विवाद से उन्हें वहां के लोगों का जेहन भारत की तरफ मोड़ने में मदद ही मिलेगी.

इस मामले का एक पहलू और महत्वपूर्ण है. मोदी सरकार ने सत्ता हासिल करने के तुरत बाद नवाजशरीफ को आमंत्रण दे कर जिस गर्मजोशी की नजीर पेश की वह अचानक इतने सख्त क्यों हो गयी?  कुछ लोगों का मानना है कि आरएसएस के दबाव के कारण मोदी सरकार पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाने से गुरेज कर रही है. ऐसी मान्यता रखने वालों का तर्क है कि पाकिस्तान को दुश्मन बनाये रखने में ही भाजपा की भलाई है. ऐसा करने से उसका वोट बैंक मजबूत रहेगा. इस तर्क को नकारा नहीं जा सकता.

अब तक पाकिस्तान के ऊपर यह आरोप लगते रहे हैं कि वहां के कट्टरवादी नेताओं के दबाव में वह भारत से रिश्ते सुदृढ़ नहीं कर पाता, लेकिन अब यही आरोप भाजपा की मोदी सरकार पर भी लगेंगे.

पाकिस्तान का दोमुहापन

पाकिस्तान आंतिरक खलफसार की वजह से एक बिखरी हुई कौम हैं. बिखराव और हिंसा से भरे समाज को आंतिरक तौर पर एक करना,साकारात्मक तरीके से एक बनाये रखना कठिन है. ऐसे में वह भारत को दुश्मन की तरह पेश करके अपने अंदर की विभाजित श्कतियों को संगठित करने का प्रयास करता है. ऐसे में भारत ने वार्ता को रद्द करके पाकिस्तान को घेरने के बजाये अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपने सख्त रवैये का मैसेज दिया है.

सच्चाई यह भी है कि पाकिस्तान अपने दोमुहेपन से कभी बाज नहीं आता. याद कीजिए कि  अपने देश में आतंकवादी हमले के बाद, भारत ने पाकिस्तान दौरे पर जाने वाली क्रिकेट टीम का दौरा यह कह कर रोक दिया  ता कि आतंकियों का समर्तन करने वालों से खेल संबंद नहीं रखेगा. लेकिन क्या उसने इतने बरसों बाद भी भारत के खिलाफ आंतकवादी हरकतें रोकीं? नहीं.

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