वेलनटाइन वीक: क्या हमें लुटेरे बाजार पर इतराने का हक है?

प्यार करने का हक हम सबको है, पर गरीबी, भुखमरी, बढ़ती बेरोजगारी और आत्महत्या करने को मजबूर इस देश के लुटेरे बाजार को वेलेनटाइन वीक पर इतराने का भी हक है?velentine

देशपाल सिंह पंवार

जिस देश के 60 करोड़ अन्नदाता यानी किसान जिंदगी से जंग लड़ रहे हों, दो वक्त की रोटी मनरेगा से जुटा रहे हों, 17 साल में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हों, 65 फीसदी से ज्यादा किसान कर्ज से दबे हों, 2007-2012 के बीच 3.2 करोड़ किसानों ने खेती से तौबा कर ली हो, हर रोज औसतन 2500 खेती छोड़ रहे हों, रोज 50 हजार की भीड़ शहर की ओर भाग रही हो ,क्या उस देश को “वेलेनटाइन वीक” या उसके लुटेरे बाजार पर इतराने या मचलने का हक है?

जिस देश में 30 करोड़ से ज्यादा के पास कोई रोजगार ना हो, इससे ज्यादा की आबादी के पास सिर छिपाने को छत ना हो, भूखे-नंगों की कोई गिनती ही ना हो, दवा के नाम पर करोड़ों को एक गोली तक नसीब ना हो, हर दिन हजारों महिलाओं से दुराचार होते हों, इज्जत-आबरू महफूज ना हो, घपलों-घोटालों की कोई कमी ना हो,करप्शन व महंगाई की कोई हद ना हो, खजाने में पैसा ना हो, वो देश वेलेंटाइन इस तरह से मना रहा है जैसे सारे दुखड़े ऊपर वाले ने हर लिए हो। राम राज आ गया हो।

गोरखधंधा देखिए- वेलेंटाइन का बाजार देश भर में पिछले साल 1500 करोड़ का था। इस साल वो बढ़कर 2500 करोड़ पहुंचने का अनुमान जताया जा रहा है। बाजार का काम ही है पैसा कमाना, जहां कल्चर, नैतिकता और ईमानदारी सिर्फ कहने की बातें हैं, लागू करने की नहीं। ये काम जिसका है वो खुली आंखों से तमाशा देख रहा है।

पहले मोबाइल की लत, फिर सोशल मीडिया की लत और लगे हाथ वेलेंटाइन वीक के हाथों पैसे, कल्चर और सारे संस्कारों की दुर्गत का खेल अब इस तरह हमारे देश में खेला जाने लगा है जैसे पहले यहां ना तो कोई प्यार करना जानता था और ना ही प्यार से साल भर रहना।

अब इस हफ्ते के जरिए बाजार आपको बताएगा कैसे-किससे-कब और कहां प्यार करना है, कितना धन लुटाना है, किससे छेड़छाड़ करनी है और कैसे किसको सताना है? एक तो लोकतंत्र ऊपर से उदारवाद, लिहाजा देखिए इकलौते मनमोहक नजर वाले हफ्ते के खतरनाक नजारे।

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