शंकर बिगहा: तो सुनिये इस कलयुगी बनवास की कहानी

संयोग है कि श्री राम चौदह बरस बनवास रहे, ठीक इतने वर्षों में ही कल फैसला आया कि शंकर बिगाह नरसंहार के मुल्जिमों के खिलाफ सुबूत नहीं. वरिष्ठ पत्रकार रजनीश उपाध्याय 14 वर्ष पहले उस गांव गये थे . सुनिये उनकी जुबानी इस कलयुगी बनवास की कहानी. तब राम के बनवास का सत्य जीता था, पर आज का सत्य कहीं हार तो नहीं गया.shankarbigha

वह 26 जनवरी की सर्द भरी सुबह थी.  झंडे-पताकों से सजे स्कूलों व सरकारी भवनों में झंडोतोलन की तैयारी थी. लाउडस्पीकर पर देशभक्ति गीत गूंज रहे थे – ऐ मेरे वतन के लोगों…

गणतंत्र दिवस के पहले की रात

इधर, 50वें गणतंत्र दिवस की चहल-पहल से अलहदा शंकर बिगहा की गलियों में ‘गम’ था, तो उससे कहीं अधिक ‘गुस्सा’ था. ठीक एक दिन पहले 25 जनवरी (साल 1999) की रात रणवीर सेना ने दलितों और अति पिछड़ों की बहुलतावाले इस गांव के 23 लोगों को गोलियों से भून दिया था. इस घटना की खबर देर रात पटना पहुंची थी और दूसरे दिन अहले सुबह (26 जनवरी को) पत्रकारों की अलग-अलग टोलियां इस घटना के कवरेज के लिए शंकर बिगहा के रास्ते थीं. तब सूचना और संचार के माध्यम आज की तरह अत्याधुनिक नहीं थे. टीवी चैनल भी कम थे. ‘प्रभात खबर’ की ओर से कवरेज के लिए मुङो भेजा गया था.

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पटना से औरंगाबाद जानेवाली सड़क पर वलिदाद के नजदीक एक छोटी नहर के उस पार शंकर बिगहा जाने के लिए हमलोगों को कुछ दूर पैदल भी चलना पड़ा. यह गांव रणवीर सेना की सामंती क्रूरता की दुखद कहानी कह रहा था. एक झोंपड़ी में चार शव पड़े थे और उनके बीच एक नन्ही बच्ची (करीब चार साल की) अल्युमिनियम की थकुचायी थाली में भात खा रही थी. शायद मौत के पहले रात में मां ने अपने बच्चों के लिए थाली में भात परोसा था. परिवार में कोई नहीं बचा था. यह दृश्य देख हम और हमारे साथी पत्रकार अंदर से कांप गये. डबडबायी आंखों से सब एक-दूसरे की ओर देख रहे थे, लेकिन मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था. वह बच्ची कभी कैमरे की ओर देखती, तो कभी अपनी थाली की ओर.

वहशीपन की पराकाष्ठा थी

इस घटना में जो 23 लोग मारे गये थे, उनमें पांच महिलाएं और सात बच्चे थे. यह वहशीपन की पराकाष्ठा थी कि 10 माह के एक बच्चे और तीन साल के उसके भाई को भी नहीं बख्शा गया.

हम सब आगे बढ़े, तो एक जगह चार-पांच शव खटिया पर रखे हुए थे-  लाल झंडे से लिपटे हुए. भाकपा माले के नेता रामजतन शर्मा, रामेश्वर प्रसाद, संतोष, महानंद समेत कई अन्य सुबह में ही पहुंच चुके थे. मुख्यमंत्री (तत्कालीन) राबड़ी देवी और लालू प्रसाद गांव में पहुंचे, तो शवों की दूसरी तरफ खड़े लोगों ने नारे लगाने शुरू कर दिये- रणवीर सेना मुरदाबाद. मुआवजा नहीं, हथियार दो. लालू प्रसाद ने समझाने की गरज से कुछ कहा, तो शोर और बढ़ने लगा. तब तक राबड़ी देवी ने एक महिला को बुलाया और उससे कुछ पूछना चाहा. गुस्से से तमतमायी उस महिला के शब्द अब तक मैं नहीं भूल पाया हूं. उसने कहा – हमको आपका पैसा नहीं चाहिए. हमलोगों को हथियार दीजिए, निबट लेंगे. तब तक हल्ला हुआ कि पुलिस ने बबन सिंह नामक व्यक्ति को पकड़ा है. गांव के लोग उसे सुपुर्द करने की मांग करने लगे. बोले, हम खुद सजा दे देंगे. डीएस-एसपी ने बड़ी मुश्किल से लोगों को शांत किया. मौके पर लालू प्रसाद व राबड़ी देवी ने विशेष कोर्ट का गठन कर छह माह में अपराधियों को सजा दिलाने का एलान किया था.

गांव के एक व्यक्ति रामनाथ ने हमें बताया था कि यदि बगल के धेवई और रूपसागर बिगहा के लोगों ने गोहार (हल्ला) नहीं किया होता, तो मरनेवालों की संख्या और भी ज्यादा होती. शंकर बिगहा के पूरब में धोबी बिगहा गांव है, जहां के 21 लोग इस जनसंहार में अभियुक्त बनाये गये थे. पूरे गांव में एक को छोड़ बाकी सभी मकान कच्चे या फूस के थे, जो यह बता रहा था कि मारे गये सभी गरीब और भूमिहीन थे. आततायी ललन साव का दरवाजा नहीं तोड़ पाये, क्योंकि एकमात्र उनका ही मकान ईंट का था, जिसके दरवाजे मजबूत थे. उन्होंने पत्रकारों को बताया था – मैंने तीन बार सिटी की आवाज सुनी और फिर रणवीर बाबा की जय नारा लगाते सुना.

घटना के बाद  की चर्चा

घटना के बाद ऐसी चर्चा रही किशंकर बिगहा में नक्सलवादी संगठन पार्टी यूनिटी का कामकाज था, इसीलिए रणवीर सेना ने इसे निशाना बनाया. एक चर्चा यह भी थी कि यह नवल सिंह, जो मेन बरसिम्हा हत्याकांड का अभियुक्त था, की हत्या का बदला था. वह दौर मध्य बिहार के इतिहास का एक दुखद व काला अध्याय था, जिसमें राज्य ने शंकर बिगहा के पहले और बाद में भी कई जनसंहारों का दर्द ङोला. दिसंबर, 1997 को लक्ष्मणपुर बाथे और नौ फरवरी, 1999 को नारायणपुर जनसंहार हुआ. इसके पहले 1996 में भोजपुर के बथानी टोला में 23 लोग मारे गये थे. सभी कांडों को अंजाम देने का आरोप रणवीर सेना पर लगा था. लेकिन, बाथे और बथानी टोला के अभियुक्तों को हाइकोर्ट ने बरी कर दिया, जबकि शंकर बिगहा कांड के आरोपित निचली अदालत से ही बरी कर दिये गये. अदालत ने माना कि आरोपितों के खिलाफ साक्ष्य नहीं थे. अदालत का फैसला तो आ गया, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रहा कि फिर शंकर बिगहा में 25 जनवरी, 1999 की रात जिन 23 लोगों के हत्यारे कौन थे? क्या वे कभी पकड़ में आ पायेंगे? आखिर यह जवाबदेही कौन लेगा? ठीक यही सवाल बाथे और बथानी टोला जनसंहार के पीड़ित पहले पूछ चुके हैं, जिनका जवाब अब तक उन्हें नहीं मिला है.

लेखक प्रभात खबर से जुड़े हैं. यह आलेख प्रभात खबर से साभार

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