संकटग्रस्त कांग्रेस और दुविधाग्रस्त राहुल

एक दर्जी ने मूर्ख बादशाह को नंगा किया और कहा कि ऐसा लिबास तो कभी किसी ने नहीं पहना। चाटुकार  बादशाह को नंगा देख  लिबास की झूठी तारीफ करते लेकिन बाजार में बादशाह को देख कर एक बच्चा बोल पड़ा- ‘बादशाह तो नंगा है?’

तब्बसुम फातिमा

फोटो साभार न्यु इंडियन एक्सप्रेस

फोटो साभार न्यु इंडियन एक्सप्रेस

क्या राहुल की हालत कुछ ऐसी ही है?
बागियों की बढ़ती संख्या के बावजूद कांग्रेस में यह बच्चा दूर तक कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। कांग्रेस में सच बोलने पर पाबंदी है। लोकसभा में मिली भयानक पराजय के बाद भी कांग्रेस ने कोई सबक नहीं सीखा। राहुल की स्थिति उसी बादशाह की तरह है, जो निरन्तर मिलती हुई पराजय से दुखी है। दूख यह भी है कि सोनिया की मौजूदगी में राहुल पार्टी का फैसला लेने में भी सक्षम नहीं। 56 दिन बाद उनकी वापसी पर भले कांग्रेस नेताओं ने जश्न मनाया हो लेकिन भारत की जनता उनके भगोड़े व्यवहार पर राहुल को अपनी उम्मीदों से अलग कर चुकी है। कभी समय था जब राहुल बाबा और शहजादे के नाम से राहुल को लेकर युवाओं में उत्साह और रोमांच  हुआ करता था लेकिन राहुल के भगोड़े व्यवहार ने जनता की उम्मीदों ठंडा कर दिया है. इसी तरह निर्भया रेप कांड पर हुए जन आंदोलन में लाखों युवाओं को निराश करते हुए वे नहीं पहुंचे।  इसी कारण ऐसा लगता है कि वह नंगे बादशाह की तरह खुशफहमी के शिकार हैं.  राहुल के आगे पीछे घूमते चाटुकारों ने उन्हें आंदोलन से बाहर रखकर उस निराशा की ओर ढकेल दिया, जिसके एक तरफ मृत कांग्रेस है और दूसरी ओर सपनाविहीन धराशायी राहुल।

अज्ञातवास

56 दिन तक राहुल कहां छिपे थे, इसमें आम जन की दिलचस्पी नहीं है। 23 फरवरी संसद का बजट सत्र आरम्भ होने से पहले वे आज्ञातवास में क्यों गये, इसपर मीडिया में भी किरकिरी हुई, और यह मैसेज गया कि कांग्रेस के भगोड़े शहज़ादे में समय से आंखें चार करने का साहस नहीं। उनके राजनीतिक मंथन और चिन्तन-मनन की कहानी को कांग्रेस नेताओं ने दूहराया अवश्य लेकिन शीला दीक्षित से संदीप दीक्षित तक बागी स्वर में यह कहते नजर आये कि जब देश ग्रामीण किसानों को लेकर भूमि विधायक मुद्दे पर उलझ रहा था, ऐसे समय विपक्ष को कमजोर करने के लिए बाहर जाने की क्या जरूरत थी? इस अज्ञातवास का लाभ क्या मिलता, उल्टे कांग्रेस नेताओं तक ने राहुल को आयोग्य ठहराते हुए सोनिया को अध्यक्ष पद पर बने रहने की नसीहत दे डाली। पहली बार भूमि विधेयक मुद्दे पर कांग्रेस में जोश नजर आया और विपक्ष को लाम्बन्द करने और एकजुट करने की भूमिका भी सोनिया ने ही निभाई।
राहुल चाहते तो एनडीए की  विफलताओं का लाभ उठा कर कांग्रेस में उर्जा भर सकते थे। लेकिन निर्भया वाले जनआंदोलन में अनुपस्थिति के बाद यह दूसरा अवसर था, जहां वे चूक गये और भाजपा को यह कहने का मौका मिला कि जो बार-बार भाग जाये उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। इसीलिए राहुल की वापसी के बाद भी जहां निराशा है वहीं पार्टी दो हिस्से में विभाजित दिख रही है। एक हिस्सा राहुल को अध्यक्ष पद सौंपे जाने के विरूद्ध इसलिए भी है कि राहुल के भगोड़े चेहरे से अधिक आशा की किरण उसे सोनिया में दिखाई दे रही है। यह वर्ग यह मानने को तैयार नहीं कि राहुल पार्टी की दिशा और दशा बदल सकते हैं।

अलफ्रेड द ग्रेट 

मेघालय के मुख्यमंत्री मुकूल संगम ने राहुल की तुलना अलफ्रेड द ग्रेट से की थी। अलफ्रेड एक राजा था। 1100 वर्ष पहले युद्ध हारने के बाद वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गये। वापस आये तो हर मोर्चे पर उन्हें जीत मिली। लेकिन सवाल यह है कि हर मोर्चे पर धराशायी कांग्रेस के साथ राहुल यह चमत्कार  दिखा सकते हैं क्या। राजनीति की ‘बाॅडी लैंगवेज’ में जहां मोदी विदेशों में अपने लिए तालियां बटोर रहे हैं, राहुल, सेना के थके हुए सिपाही लगते हैं। जिसके पास न साहस है न सपना और न कोई आशा की किरण। भारतीय जनता कांग्रेस को टूजी स्पेक्ट्रम, काॅमन वेल्थ स्केंडल, कोयला घोटाला, मंहगाई और हर मुद्दे पर असफल होने के लिए हाशिये पर फेक चुकी है। यह भी सच है कि समय और अवसर बार बार नहीं आते। राहुल भयानक निराशा के साथ 131 वर्ष पुरानी कांग्रेस को दोबारा जीवित करने का जोखम इसलिए भी नहीं उठा सकते कि उनमें करिश्माई व्यक्तित्व की कमी है। इसलिए फिलहाल कांग्रेस को सोनिया के भरोसे ही चलना चाहिए। लेकिन सोनिया के साथ मुश्किल यह है कि पार्टी अध्यक्ष और मां होने की चुनौती दोनों के बीच वह पिस कर रह गई है। कांग्रेस की विरासत को भी संभालना है और राहुल को भी निराश नहीं करना है। अभी कांग्रेस का जनता में खोया हुआ विश्वास हासिल करने के लिए एक लम्बी जंग बाकी है।

तबस्सुम फातिमा से  tabassumfatima2020@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है

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