खतरे में है शैक्षणिक संस्थानों का वजूद

वरिष्ठ समाजवादी नेता व जनता दल यू के बिहार प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह इस लेख में उन बिंदुओं को रेखांकित कर रहे हैं जो बताते हैं कि केंद्र की पालिसियां उच्चा शिक्षा को ध्वसत कर रही हैंbashisht.narayan

उच्च शिक्षा की स्वायत्तता क्या वाकई खतरे में है? भाजपा सरकार की ओर से क्या शिक्षकों और प्रोफेसरों को भी नौकर मान लिया गया है? एन.सी.इ.आर.टी के पाठ्यक्रमों मे क्या सरकार अपनी विचारधारा को थोप रही है?
यदि हाँ,तो फिर देश का अकादमिक वर्ग,बौद्धिक,शिक्षाविद व शिक्षकों को इसका विरोध करना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र मे राजनीतिक हस्तक्षेप को किसी भी तरीके से हम जायज नहीं ठहरा सकते। हमारे यहाँ लोकतन्त्र मे विरोध की संस्कृति के लिए के लिए पर्याप्त अवसर हैं।सरकारें जब जब भी निरंकुश हुई है तब तब बौद्धिकों ने ही सरकार को अनुशासित किया है। इतिहास मे ऐसे कई प्रसंगों की मौजूदगी है। खैर.

अमर्त्य सेन का उदाहरण

मुझे याद है कि नीतीशजी के ड्रीम-प्रोजेक्ट ‘नालंदा यूनिवर्सिटी’ के चांसलर पद से इस्तीफा देने के ठीक बाद अमर्त्य सेन ने ‘न्यूयार्क रिव्यु आफ़ बुक’ के अगस्त अंक में ”The stormy revival of an international university’ के नाम से अपने लेख मे यह बात उठायी थी कि उन्हें विश्वविद्यालय के भीतर मुक्त होकर काम नहीं करने दिया जा रहा था। उन्होने केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया था कि शैक्षणिक व अनुसंधान संस्थानों की ‘स्वायत्तता’ पर संकट है। सार्वजनिक सेवाओं के महत्व को सरकार तवज्जो नहीं देती है, जबकि अर्थव्यवस्था भी इसके बिना फल-फूल नहीं सकती।

इस पूरे संदर्भ को पढ़ते हुए मुझे बहुत दुख हुआ था। चूंकि नालंदा के ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए ही नीतीश जी ने उसके पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया था। नालंदा विश्वविद्यालय किसी जमाने मे विश्व विख्यात रह चुका है। अमर्त्य सेन को पाकर इस विश्वविद्यालय ने कई ठोस व अकादमिक निर्णय लिए थे ,जिससे संभवतः यह संस्थान अपनी पुरानी पहचान को कायम कर सकता था। अफसोस,लेकिन वह नहीं हो सका।

लेख के भीतर उन्होने जिन तथ्यों को उठाया था,आज के हालात में अक्षरसः घटित हो रहा है।

देश के कुछ संस्थानों को छोडकर अब ‘स्वायत्तता’ की बात कोई नहीं करता। ऐसे में जो संस्थान बचे हैं,उन्हें ही यह लड़ाई लड़नी है। लेकिन हालत ऐसे हैं कि ये संस्थान सरकार के सीधे सीधे रुचि को प्रभावित करते हैं।

हजारों प्रोफेसर होंगे बेरोजगार

पिछले दिनों हैदराबाद यूनिवर्सिटी,जे.एन.यू आदि की घटनाओं से इस बात को समझी जा सकती है। दिल्ली विश्वविद्यालय भी इस तरह के हस्तक्षेप से सबसे अधिक प्रभावित है। केंद्र सरकार के नए गज़ट के मुताबिक देश भर मे हजारों प्रोफेसर बेरोजगार कर दिये जाएंगे। एक ओर हम इस चिंता से ग्रस्त थे कि उच्च शिक्षा मे शिक्षकों की कमी को जल्द से जल्द दूर किया जाये तो दूसरी ओर यह विरोधाभासी फैसला।यह सब कुछ निजी विश्वविद्यालय को स्थापित करने और उसे आगे बढ़ाने की कोशिशों का नतीजा है। इस पूरे प्रकरण में शिक्षा की गुणवत्ता का हाल कैसा होगा,आप अंदाज लगा सकते हैं।
कैसी और कितनी स्वायित्तता

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों को यह तय कर लेना चाहिए कि उनकी स्वायत्तता किन किन अर्थों में है। क्या उन्हें प्रशासनिक,वित्तीय व अकादमिक तीनों ही स्वायत्तता प्राप्त है ?या फिर स्वायत्तता का सीमा निर्धारण पहले से किया जा चुका है। या फिर स्वायत्तता महज नारेबाजी का शक्ल अख़्तियार कर चुकी है। अब तक उन्हें व्यावहारिक रूप में केवल अकादमिक स्वायत्तता प्राप्त थी। जिस कारण वे अपना पाठ्यक्रम,एडमिशन जैसे मुद्दों का नीति निर्धारण कर पाते थे। लेकिन अब वह अधिकार भी छीने जा चुके हैं। उनको क्या पढ़ना है,कितने घंटे पढ़ाना है,कहाँ पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है,यह सभी कुछ सरकार निर्धारित करेगी और वह भी अपने एजेंडे के साथ । यह भी संभव है कि उनके विरोध को सरकार जनता के बीच गलत तरीके से पेश करे ।चूंकि इस तरह के कृत्य में सरकार पीछे नहीं रहती है।
कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति गए हुए थे। वहाँ उन्होने निराश होकर कहा था कि विश्व के प्रथम दो सौ विश्वविद्यालयों में भी हमारे एक भी विश्वविद्यालय के नाम नहीं हैं।लेकिन उनकी यह मांग कैसे पूरी की जा सकती है जब सब कुछ केन्द्रीय मंत्री ही तय कर लिया करेंगी।यदि यही हालात रहे तो दूर दूर तक उनका सपना पूरा नहीं हो सकता है।

दिमागी रूप से कैद शिक्षक

मुझे लगता है कि कोई भी विश्वविद्यालय बेहतरीन तभी बनता है जब उसके पास तीन संसाधन प्रभावी रूप से हों। पहला पूर्ण स्वायत्तता ,दूसरा अभावरहित वित्त और तीसरा योग्य शिक्षक। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का हरण पहले हो ही चुका था,वित्त में पचपन फीसद की कटौती सरकार कर ही चुकी है । अंत में बचे थे शिक्षक उन्हें भी अब दिमागी रूप से कैद कर लिया गया है या उनपर विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए दबाब बनाया जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रपति जी की चिंता कैसे ख़त्म होगी,मेरे समझ से परे है।

यदि सरकार ‘शिक्षा की गुणवत्ता’की बात करते हैं,तो उसे मानदंडों की बात भी करनी होगी। ‘सेंट्रल यूनिवर्सिटी बिल’ के जरिये वह गुणवत्ता को कभी हासिल नहीं कर सकती। प्रशासनिक नियुक्तियाँ जब तक पारदर्शी नहीं होगीं,तब तक शिक्षकों की आस्था ज्ञान-केन्द्रों में नहीं बनेगी,यह सरकार को भी समझ लेनी होगी।

निजी संस्थानों का मोह 

सरकार को निजी संस्थानों का लोभ त्यागना होगा और शिक्षा के क्षेत्र से पूँजीपतियों को दूर रखना होगा। विश्वविद्यालयों की स्थिति सुधारनी होगी और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी व्यवस्था भी लानी होगी। हम अपने प्रदेश में जिस तरीके से शिक्षकों का चयन कर रहे है,उसकी प्रशंसा सभी कर रहे हैं। सरकार योग,वेद और अध्यात्म को पाठ्यक्रम में बाद में लाये,पहले संस्थानों की बुनियादी दिक्कतों को दूर करे।
सरकार ने यू.जी.सी का गठन वित्त की व्यवस्था के लिए किया गया था,आज वह बौद्धिकों का बॉस बन बैठा है। वह उन्हें बता रहा है कि शिक्षण का उद्देश्य क्या है। बाबजूद इसके कि यू जी सी के एक्ट के तहत उसे इस तरह की आजादी बिलकुल नहीं है।अजीब विडम्बना है।

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