संघ से निस्संग सरदार

कृष्ण द्वारका पहुंच कर रणछोड़दास हो गए, गांधी गुजरात में हिकारत की गलियों में धकेले जा रहे हैं और पटेल पर राजनीति शुरू हो चुकी है. कनक तिवारी का विचारोत्तेजक लेख-GANDHI.NEHRU.PATEL

सरदार पटेल की मृत्यु 15 दिसंबर 1950 को हुई। इससे विगत पांच बरसों में गांधी, नेहरू और पटेल की त्रयी ने भारतीय राजनीति को अपने कांधे पर उठा रखा था।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल को, (भगवान राम को नहीं), अपने ‘ट्रंपकार्ड’ की नई खोज बनाया है।

शतरंज की भाषा में कहें तो सभी विरोधियों को परास्त करने के लिए सरदार के मोहरे को मोदी ढाई घर चल रहे हैं। उन्हें एक साथ गुजराती अस्मिता का राष्ट्रीय संस्करण, किसान नेता और पिछड़े वर्ग का मसीहा बना कर संघ परिवार की चौपड़ में पौ बारह कहने के ठहाके लग रहे हैं। सरदार को कहां मालूम था कि उन्हें एक साथ गुजराती सरोवर के केंद्र में वैश्विक तकाजों की सबसे ऊंची लौह मूर्ति बनना होगा। ओबामा अगर मोदी को अमेरिका का वीजा दे देते, तो सरदार के बदले सरकार को तरजीह मिलती।

नरेंद्र मोदी का हिंदू राष्ट्रवादी फतवा है कि सरदार पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की हालत और कुछ होती। आशय नेहरू के शासन की खुली भर्त्सना है। संगठन का बहुमत पटेल के साथ होने पर यह गांधी का निर्णय था। इस तरह गांधी नरेंद्र मोदी की निंदा के असली पात्र हैं। उनके कथन का उल्था यह भी हो सकता है कि अगर गांधी 15 अगस्त 1947 के पहले मार डाले गए होते तो संभव है पटेल उनके निकटतम शिष्य होने और कांग्रेस पर अपनी मजबूत पकड़ के चलते प्रधानमंत्री बन सकते थे।

आखिर मोदी ने गांधी की स्मृति में गुजरात में अहिंसा विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा को क्यों अंतरिक्ष में बह जाने दिया।

चुनाव आचार संहिता का गुजरात में अनुपालन नहीं है। मोदी के नेहरू-विरोधी और गांधी-निंदाभाषण के पूर्वाभास के चलते पहली बार प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पार्टी का सदस्य होने में गौरव का इजहार किया। मनमोहन सिंह ने सरदार की धर्मनिरपेक्षता को भी मौजूदा संदर्भों में राष्ट्रीय आदर्श बताया। प्रोटोकॉल के चलते मोदी ने पहले भाषण दे दिया था। लिहाजा वल्लभ भाई पटेल के जन्मदिन इकतीस अक्तूबर को प्रस्तावित लौह मूर्ति का शिलान्यास करते हुए मोदी ने कहा कि देश को सरदार पटेलनुमा धर्मनिरपेक्षता चाहिए, वोट बैंक की धर्मनिरपेक्षता नहीं।

सरदार का निधन पहले आम चुनाव के पहले ही हो गया था। उन्होंने तथाकथित अल्पसंख्यक वोट बैंक को इसीलिए संबोधित भी नहीं किया था। उनकी और नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के गैरविद्यमान अंतर को तिल का ताड़ बनाया जा रहा है और इतिहास में पटेल की सीधी-सपाट, तल्ख और सत्यवादिता से भरी वाणी के कारण चौड़ा किया जा रहा है। मोदी सीधे 2013 में सरदार पटेल को जैसे का तैसा रोपने के फेर में उनको ऐतिहासिकता से च्युत कर देते हैं।

नेहरू-पटेल

नेहरू कम्युनिस्टों और मुसलिमों के प्रति उतने मुखर नहीं थे। इसी तरह सरदार पटेल, नेहरू के मुकाबले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के प्रति कम मुखर थे। यही वह बारीक छिद्र है जिसमें अपनी खोजी दूरबीन लेकर घुसने से संघ परिवार को एक वृहद अंधेरी गुफा में प्रवेश कर नायाब तर्क ढूंढ़ लाने का वाचाल आत्म-गौरव प्राप्त होने लगता है।

विभाजन के चार दिन पहले दिल्ली में सरदार पटेल ने कहा था कि सरकारी ओहदे पर बैठे कई मुसलमानों की सहानुभूति मुसलिम लीग के साथ है। यह भी कि देश को विनाश से बचाने के लिए कांग्रेस ने बहुत मजबूर होकर मुल्क का विभाजन स्वीकार किया है। मुसलमानों की जड़ें हिंदुस्तान में ही हैं। यहीं उनके धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल इतिहास के गभर्गृह में हैं।

आजादी के छह महीने बाद वल्लभभाई ने महरौली की सभा में उदास मन से कहा था कि सांप्रदायिक दंगों के कारण वे शर्मसार हैं। हिंदुओं को चाहिए कि वे मुसलमानों को इस देश में असुरक्षित महसूस न होने दें।

साफगोई के कायल सरदार ने गांधी की हत्या के पहले कलकत्ता की जनसभा में माना था कि देश में हिंदू राज्य कभी स्थापित नहीं होगा। लेकिन इस देश के (तब) साढ़े चार करोड़ मुसलमानों में से कई पाकिस्तान के निर्माण के समर्थक रहे हैं। यह कैसे भरोसाकिया जाए कि उनकी धारणा रातोंरात बदल गई होगी। मुसलमान कहते हैं कि वे भारत के प्रति वफादार हैं। इसे कहने की क्या जरूरत है। उन्हें खुद अपनी आत्मा में झांकना चाहिए।

निष्कपट पटेल

सरदार पटेल इस तरह की टिप्पणियां एकदम निष्कपट भाव से करते थे। उनके व्याख्याकार तत्कालीन परिस्थितियों से केंद्रीय नेता के रूप में जूझ रहे लौह पुरुष की कठिनाई को समझे बिना उसे मौजूदा हिंदुस्तान के हालात में अंतरित करते हैं। उन्होंने गांधी की हत्या के एक पखवाड़े पहले मुंबई में दो विरोधाभासी बातें देशभक्ति के तरन्नुम में डूब कर कही थीं। एक ओर उन्होंने कहा कि यहां कुछ लोग मुसलिम-विरोधी नारे लगा रहे हैं। ऐसे वहशी इरादों वाले क्रोधियों से पागल ज्यादा अच्छे हैं जिनका इलाज तो किया जा सकता है। फिर ठहर कर उन्होंने मुसलमानों को भी झिड़का और कहा कि वे मुसलमानों के दोस्त हैं। मुसलमान अगर उन्हें वैसा नहीं आंकते तो वे भी पागल आदमियों की तरह हैं क्योंकि उनमें सही और गलत को समझने का विवेक नहीं है।

संघ और कुसेवा

भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में हिंदू और मुसलमान के संवैधानिक अधिकारों में कोई फर्क नहीं है। सरदार आरएसएस की भूमिका को लेकर एक साथ आशंकित और आशान्वित थे।
यह मन:स्थिति उन्हें नेहरू से अलग करती है। संघ परिवार और मोदी को ऐसे दृष्टिकोणीय अंतर को वैचारिक दरार कहना बहुत सुहा रहा है। सरदार पटेल ने ही जयपुर में कहा था कि उन्हें संघ के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं। अगर आग नहीं होगी तो धुआं कैसे होगा। संघ की लाठियों से मुट्ठी भर मुसलमानों के सिर तोड़ देने से देश की प्रगति नहीं होती। यदि नौजवान संघ के अनुयायी हो जाएंगे तो वह देश की कुसेवा होगी।

लखनऊ की बहुचर्चित सभा में पटेल ने संघ को कांग्रेस में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया था। ऐसा आज तक किसी अन्य कांग्रेसी नेता ने नहीं किया। उन्होंने कांग्रेसियों से भी कहा कि वे संघ के स्वयंसेवकों को चोर या डाकू न समझें। वे देशभक्त हैं। इसलिए उन्हें डंडे से हकालने का खयाल ही छोड़ देना चाहिए।

गांधी से पटेल की शिकायत

चूंकि लखनऊ में ही भारत विभाजन का विचार मुसलमानों के बीच पनपा था। इसलिए सरदार ने तल्खी में उनसे सवाल किया कि वे अपने सम्मेलनों में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में चलाई जा रही हिंसक गतिविधियों का विरोध क्यों नहीं करते। इस मुद््दे को लेकर मुसलिम संगठनों ने गांधीजी से सरदार पटेल की शिकायत भी की थी।

स्पष्टवादी के बदले इतिहास में मुंहफट करार दिए गए सरदार ने मद्रास की जनसभा में यह भी तो कहा था कि संघ इस देश में जबरिया हिंदू राज्य अथवा हिंदू संस्कृति को थोपना चाहता है। उसे कोई सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी। सरदार पटेल ने आरएसएस को यह भी झिड़की दी थी कि वह अपने कार्यक्रम बदले। गोपनीयता को तिलांजलि दे। सांप्रदायिक संघर्ष से हटे। संविधान का सम्मान करे और राष्ट्रध्वज के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करे, जिससे सरकार का उस पर भरोसा कायम हो। कहना कुछ और करना कुछ और की शैली उसे छोड़नी होगी।

गुजरात में गांधी की हिकारत

एक तीर से दो शिकार के मुहावरे का पहाड़ा मोदी को खूब आता है। गांधी तो उपेक्षा, विस्मृति और हिकारत की अंधेरी गलियों में गुजरात में धकेले ही जा रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्तानशीन नेहरू-गांधी परिवार पर हमला करना मोदी के लिए डार्विन की थ्योरी को श्रद्धांजलि देना है। विश्व की उच्चतम लौह-प्रतिमा के चरणों के पुजारी मोदी ने अपने अग्रज तथाकथित लौह पुरुष आडवाणी को भी उनके विशेषण-पद से वंचित कर दिया है। सरदार के बाद नरेंद्र मोदी इतिहास के लौह पुरुष बनने की महत्त्वाकांक्षा और गलतफहमी के बीच पेंगें भर रहे हैं।

केंद्र की कांग्रेसी सरकारों पर सरदार की स्मृति की उपेक्षा का आरोप लग सकता है। लेकिन गुजरात में ही सत्ता की हैट्रिक लगाने वाले मोदी अब तक कहां थे? आडवाणी ने सोमनाथ का राजनीतिक शोषण किया। कृष्ण द्वारका पहुंच कर रणछोड़दास हो गए। इसलिए राम का मंदिर बनाना मुफीद लगा। सुप्रीम कोर्ट और देश के मतदाता राम मंदिर के प्रयोजन को आगे नहीं बढ़ाने देते। तब किसी दीवाने-खास में बैठ कर सरदार पटेल का यश-चंदन अपने माथे लीपने की जुगत बनी। सच है सरदार! केवल अंगरेज फूट डालो और राज करो की नीति के अन्वेषक नहीं हैं।

जनसत्ता से साभार

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