संत कवि कबीर की वाणी में तल्ख़ी, पर गहरा मर्म छिपा है : डॉ अनिल सुलभ

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में आज संत कवि कबीर की जयंती मनाई गई. वक्ताओं ने संत कवि को सद्गुरु और महान आध्यात्मिक चिंतक के रूप में याद किया. समारोह का उद्घाटन करते हुए, वीर कुँवर सिंह विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा नंद जी दूबे ने कहा किकबीर को ऐतिहासिक पृष्ठ-भूमि में कबीर को देखने की आवश्यकता है. वे निर्भीक और साहसी कवि थे. उन्होंने खरी-खरी सुनाने में कभी गुरेज़ नहीं किया. आज कबीर की ही आवश्यकता है.

नौकरशाही डेस्‍क

सभा की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कहा कि सद्गुरू कबीर की वाणी में अवश्य ही तल्ख़ी है, किंतु उसमें संसार का गहरा मर्म भी छिपा हुआ है. उनका हृदय भी संसार की पीड़ाओं से द्रवित होता है; रोता है. तभी तो वे कहते हैं;- “ चलती चाकी देख कर दिया कबीरा रोय/ दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय “.

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के प्रधान मंत्री आचार्य श्रीरंजन सूरदेव ने कहा कि कबीर की रचनाएँ यथार्थवादी है. सम्मेलन के साहित्यमंत्री डा शिववंश पांडेय ने विषय प्रवर्तन करते हुए यह जानना चाहा कि जो कबीर पूर्व के आलोचकों द्वारा अंशत: उपेक्षित रहे थे, वे आज एक साहित्यिक खेमे के हीरो कैसे बन गए हैं ? यह क्या हमारी दृष्टि का दोष है या विशेष राजनैतिक सिद्धांत का अंध समर्थन ? सारण ज़िला हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार ब्रजेंद्र कुमार सिन्हा, सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्रनाथ गुप्त, डा शंकर प्रसाद, डा कुमार मंगलम तथा डा मेहता नागेन्द्र सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए.

इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरम्भ कवि राज कुमार प्रेमी ने कबीर के निर्गुण ‘रहना नहीं देस वीराना है’ का सस्वर पाठ कर किया. वरिष्ठ कवि म्रितुंजय मिश्र, कवि आरपी घायल, कवयित्री आराधना प्रसाद, कवि कमलेन्द्र झा ‘कमल’, पं शिवदत्त मिश्र ने भी कबीर को कविताओं के माध्‍यम से याद किया, तो अध्यक्षीय काव्य-पाठ करते हुए डा सुलभ ने अपनी कविता ‘जीवन क्या हो तुम?” में कुछ इस तरह से जानना चाहा कि – “जीवन क्या हो तुम?/विधाता की कठपुतली? उनके मनोरंजन के खेल-खिलौने? गुड्डे-गुड़िया? रावण का वयम रक्षाम:? कंस/शिशुपाल/ दुर्योधन? जीवन क्या हो तुम?”

सम्मेलन के उपाध्यक्ष पं शिवदत्त मिश्र, अमियानाथ चटर्जी, ओम् प्रकाश पांडेय ‘प्रकाश’, राज कुमार प्रेमी, प्रभात कुमार धवन, मोहन दूबे, जय प्रकाश पुजारी, बच्चा ठाकुर, मनीष कौशिक, रामेश्वर राकेश, विनय कुमार विष्णुपुरी, पं गणेश झा, सच्चिदानंद सिन्हा, आर प्रवेश, कुंदन आनंद, कुमारी अमृता, विश्वमोहन चौधरी संत, चंद्रदीप प्रसाद, अनिल कुमार सिन्हा, रणवीर गोस्वामी तथा घनश्याम आदि ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया.

 

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