सत्ताधारियों के तलवे चाटने वाले मुसलमान ही मुस्लिम समाज के असली नासूर हैं:अशफाक रहमान

जनता दल राष्ट्रवादी ने मुसलमानों की हालत पर जमियत उलेमा ए हिंद द्वार चिंता व्यक्त करने और एक मजबूत संगठन बनाने के विचार का स्वागत किया है.

अशफाक रहमान

अशफाक रहमान

जनता दल राष्ट्रवादी के राष्ट्रीय संयोजक अशफाक रहमान ने  कहा है कि देश के 25 करोड़ मुसलमानों की बदहाली सिर्फ संगठन बनाने से नहीं बल्कि देश की सियासत में मजबूत दखल देने से दूर होगी. उन्होंने कहा कि मुसलमानों को एक संगठित सियासी ताकत के रूप में उभरना होगा.

 

अशफाक रहमान ने याद दिलाया कि जमियत उलमा ए हिंद खुद एक मजबूत संगठन है ऐसे में मुसलमानों की हालत नहीं बदले तो किसी और संगठन की जरूरत क्या है. उन्होंने कहा कि हर गली और हर मुहल्ले में मुसलमानों के संगठन है. इन संगठनों से मुसलमानों की शैक्षिक स्थिति तो बदल सकती है लेकिन उनकी राजनीतिक तकदीर नहीं बदल सकती. उन्होने कहा कि सियासी पिछड़ापन देश के मुसलमानों का मुकद्दर बन चुका है.

अशफाक रहमान ने कहा कि इस नाजुक घड़ी में महात्मा गांधी तक को निशाना बनाया जा रहा है तो मुसलमान किस खेत की मूली हैं. उन्होंने जमियत उलेमा ए हिंद के इस तर्क से सहमति जताई कि देश में मुसलमानों की जमीन तंग होती जा रही है. लेकिन साथ ही अशफाक रहमान ने कहा कि मुसलमानों को मजबूत सियासी ताकत बना कर ही उन्हें मजबूत किया जा सकता है.

मुसलमानों का असली नासूर

अशफाक रहमान ने अपने बयान में कहा कि जो समाज अपने को मजबूत सियासी ताकत बनाने में कामयाब रहा है उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.  उन्होंने कहा कि इसी सोच के मद्दे नजर जनता दल राष्ट्रवादी का गठन किया गया था. उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया मुस्लिम नेतृत्व वाली सियासी पार्टी की इस सोच को तेजी से स्वीकार्यता मिल रही है. उन्होंने कहा कि मुस्लिम नेतृत्व की पार्टी ही मुसलमानों के सियासी अधिकार की रक्षा कर सकती है.

उन्होंने ऐसे लोगों को आड़े हाथों लिया जो मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टी का मजाक उड़ाते हैं. रहमान ने कहा कि ऐसे लोग मानिसक गुलामी के शिकार हैं. उन्होंने कहा कि ये वही लोग हैं जो दूसरे के तलवे चाटना पसंद करते हैं लेकिन अपने नेतृत्व के साथ खड़ा होना पसंद नहीं करते. अशफाक रहमान ने कहा कि सरकारी या सत्ताधारी पार्टियों की जूतियां सीधी करने को ही ऐसे लोग अपनी खुशकिसमती समझते हैं लेकिन ये वही लोग हैं मुस्लिम समाज के लिए असली नासूर है. ये सरकारी नौकर की हैसियत में भी खुद को खुशकिसमत समझते हैं.

अशफाक रहमान ने जमियत उलेमा ए हिंद से अपील की है कि अगर उसने संगठन की बात कर ही दी है तो अब उसे तमाम मुस्लिम तंजीमों को एक प्लेटफार्म पर साथ लाने की भी पहल करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद अगर इस तरह की पहल की गयी होती तो स्थिति कुछ और होती. अशफाक रहमान ने जमियत उलमा ए हिंद को सलाह दी है कि वह इस बात की कोशिश करे कि देश की तमाम तंजीमें मुस्लिम कयादत वाली पार्टी के साथ आयें. इसी में मुसलमानों की भलाई है.

 

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