सब का ‘भाई’, सीबीआई

पिछले एक सौ साल में सीबीआई एक ऐसी संस्था के रूप में उभर कर सामने आई है जो सत्ता के केंद्र में रहने वाले नेताओं का ‘भाई’ की भूमिका निभाती हुई लगती है./strong>

शशिधर खाँ

सीबीआइ के स्वर्णजयंती समारोह के समय इस जांच एजेंसी के राजनीतिक इस्तेमाल की खबरें ज्यादा सुर्खियों में रहीं. यह आरोप लगानेवालों में पहले नंबर पर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव रहे, तो दूसरे नंबर पर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह.

मुलायम सिंह यादव शायद वह दिन भूल गये हैं, जब उन्होंने 2007 में कांग्रेस को समर्थन देने के एवज सीबीआई के शिकंजे से बचाने की शर्त रखी थी. गत एक साल से मुलायम सिंह यादव को सीबीआई का ‘डर’ सता रहा है, जिसका इस्तेमाल करके कांग्रेस उन्हें कभी भी गिरफ्तार कर सकती है. द्रमुक नेता करुणानिधि की तरह मुलायम ‘कठोर’ नहीं हुए हैं.

करुणानिधि की पार्टी के जिन प्रमुख नेताओं को सीबीआई ने घोटाले में पकड़ा है, उनमें उनके परिवार के भी सदस्य हैं. ए राजा को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अगर सीबीआइ क्लीन चीट दे देती, तो करुणानिधि समर्थन वापस नहीं लेते. सीबीआइ ने मुलायम सिंह यादव के पूरे परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला 2007 में दायर किया.

मुलायम सिंह यादव उस समय क्यों चुप थे, जब सीबीआई को उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर मुकदमा वापस लेने की अर्जी देने के कारण फटकार सुननी पड़ी. उस वक्त मुलायम ने सीबीआई को ‘निष्पक्षतापूर्वक’ काम क्यों नहीं करने दिया. जिस सीबीआई ने कांग्रेस गठजोड़ के पहले शासनकाल में मुलायम का ‘डर’ दूर किया, उसी सीबीआई को वे कांग्रेस की ‘खतरनाक चाल का साथी’ बता रहे हैं.

यह बात उन्होंने दिसंबर, 2012 में सुप्रीम कोर्ट को बतायी. उन्हीं के वकील की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ को निर्देश दिया कि समाजवादी पार्टी प्रमुख और उनके पुत्रों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच रिपोर्ट सीधे कोर्ट को सौंपे.

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राजस्थान चुनाव की तैयारी के सिलसिले में सीबीआई के कामकाज पर उंगली उठायी. इसी समय सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगायी है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को बरी करने के इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ निर्धारित अदालती समय सीमा के अंदर अपील क्यों नहीं की गयी! सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दो अप्रैल को सुनवाई के दौरान इस ढिलाई के लिये सीबीआई को दोषी नहीं माना. उसने सरकार को इस संबंध में हलफनामा दायर करने का आदेश दिया. जांच प्रक्रिया में सुस्ती के लिये भाजपा ने कांग्रेस को जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया?
चुप हैं लालू व मायावती

बेहतर है कि मायावती और चारा घोटाला के आरोपी लालू प्रसाद चुप हैं. दोनों कांग्रेस गठजोड़ सरकार को समर्थन दे रहे हैं. मायावती के खिलाफ ताज कॉरिडोर घपला का मामला सुप्रीम कोर्ट से वापस लेने की अर्जी सीबीआई ने 2008 में दायर की, जो मायावती को यह अच्छा लगा. अब अगर उसमें तेजी लाने की अपील हो, तो मायावती समर्थन वापस लेने की धमकी देने लगेंगी.

चारा घोटाले का मामला उस समय से डंप है जब लालू की ‘बदौलत’ एच. डी. देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल प्रधनमंत्री बने. पिछली यूपीए सरकार में लालू रेलमंत्री थे. झारखंड में 2010 और 2012 के राज्यसभा चुनाव के दौरान ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ में शामिल 26 विधायकों में सभी पार्टियों के विधायकों के शामिल होने की रिपोर्ट के बाद सीबीआइ ने छापेमारी शुरू की है. इस हफ्ते छापेमारी के पांचवें दौर में कांग्रेस के तीन और राजद के पांच विधायकों पर गाज गिरी. कांग्रेस इन्हंम बचा सकती थी. इस पर सभी पार्टियां चुप हैं.

इस प्रसंग में केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री वी नारायणसामी का दिसंबर, 2012 मं् लोकसभा में दिया गया यह बयान उल्लेखनीय है कि सीबीआइ के अधीन वर्षो से लंबित 57 राजनीति मामलों में आठ पूर्व मुख्यमंत्री और विभिन्न दलों के 71 नेता हैं. उसके बाद पूर्व सीबीआइ निदेशक यूएस मिश्र का बयान आया कि कांग्रेस समेत सभी पार्टियों के प्रभावशाली नेता सीबीआइ का राजीतिक इस्तेमाल करते हैं और एजेंसी को काफी दबाब में काम करना पड़ता है. मिश्र भाजपा के साथ-साथ यूपीए शासनकाल में भी सीबीआइ निदेशक(2003-05) रह चुके हैं.

बहुचर्चित बोफोर्स घोटाले ने भाजपा समेत लगभग सभी गैर-कांग्रेसी पार्टियों को केंद्र की सत्ता में आने का मौका दिया. इस मामले को सबूतों के अभाव में कोर्ट ने खतम कर दिया, जिसकी जांच कांग्रेस के सत्ता से हटने के बाद सीबीआइ ने शुरू की. उस वक्त किसी भी पार्टी ने सबूत जुटाकर दोषियों को कटघरे में क्यों नहीं खड़ा किया!

अदर्स वॉयस कॉलम के तहत हम अन्य मीडिया में प्रकाशित लेखों को हू-ब-हू छापतने हैं. शशिधर खाँ का यह लेख हमने प्रभात खबर से साभार छापा है

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