‘सब सफल हों, कोई असफल न रहे’

सफलता के लिए एकाग्रता अनिवार्य शर्त है. सचिन, लता, सीवी रमण समेत तमाम व्यक्तियों की सफलता का यही राज है. आईएएस अफसर विजय प्रकाश ने वर्षों के  शोध के बाद ‘अपनी एकाग्रता कैसे बढ़ायें‘ नामक पुस्तक लिखी है. वह एकाग्रता के  मूल पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं.

विजय प्रकाश बिहार सरकार के कृषि उत्पादन आयुक्त हैं

विजय प्रकाश बिहार सरकार के कृषि उत्पादन आयुक्त हैं

आज से करीब 20-22 वर्ष पहले जब मैं शिक्षा विभाग में जन शिक्षा निदेशक के रूप में कार्य करता था तो उस समय मुझे विशेषकर विद्यालय न जाने वाले एवं विद्यालय से ड्राॅपआउट होने वाले बच्चों के शिक्षण के लिए योजनाओं को कार्यान्वित कराने का अवसर मिला था। उन बच्चों की समस्याओं का अध्ययन करते समय मैंने यह अनुभव किया कि कई बच्चों के विद्यालयी शिक्षा से विमुख होने का एक मुख्य कारण एकाग्रता का अभाव रहता है।

वैसे भी सभी सफल व्यक्तियों में एक गुण अवश्य रहता है वह है- एकाग्रता। लता मंगेशकर हो या सचिन तेंडुलकर, सी वी रमण हों या एम एफ हुसैन, रामानुजम हों या रमण महर्षि सभी ने सफलता इसलिए हासिल की क्योंकि उन्हें उच्च स्तरीय एकाग्रता हासिल थी। अतः जीवन में किसी क्षेत्र में सफल बनना हो तो मन को एकाग्र करना सीखना आवश्यक है। किसी भी परीक्षा में सफलता तभी मिलती है जब हम मन एकाग्र कर उसकी तैयारी करते हैं।

तभी से मैं एकाग्रता विकास के उपायों के संबंध में सोचने लगा। मैंने एन.सी.ई.आर.टी. के प्रोफेसरों, मनोवैज्ञानिकों तथा अन्य विद्वानों से भी इस विषय पर चर्चा की, पर कहीं से कोई विशेष मदद नहीं मिली।

विवेकानंमद से मिला सूत्र

संयोग से मैंने स्वामी विवेकानन्द की एक उक्ति देखी जिसमें उन्होंने कहा था कि -‘‘अगर मेरा दुबारा जन्म हो, तो मैं सभी पुस्तकों को अलग रखकर केवल एकाग्रता की शक्ति विकसित करूँगा। जैसे ही मुझमें एकाग्रता की शक्ति आ जाएगी, मैं उन सारी पुस्तकों को पढ़ डालूँगा जिन्हें मुझे पढ़ना होगा।’’

मुझे लगा कि शायद उनके साहित्य में इसके विकास के संबंध में कोई मार्गदर्शन भी मिल सके। तब मैं विवेकानन्द साहित्य को बड़े गौर से पढ़ने लगा। राजयोग के संबंध में स्वामी जी ने एक सूत्र दिया था।

देशबन्धः चित्तस्य धारणा।

अर्थात् किसी बिन्दु पर ध्यान केन्द्रित करना ही एकाग्रता है।

मुझे एक सूत्र मिल गया था जिसके आधार पर मैंने आगे खोज प्रारम्भ कर दिया। बाद में अन्य सूत्र भी मिले। मैंने पाया कि सभी धर्मों में एकाग्रता विकास को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है। मुहम्मद साहब ने स्वयं हीरा की गुफाओं में एकाग्र होकर मनन किया था तभी आध्यात्मिक ज्ञान हासिल हुई थी। ईसा मसीह ने कहा था –

‘अगर तुम्हारी दृष्टि एकाग्रचित्त हो जाए तो पूरा शरीर प्रकाशमय हो जाएगा।’

समाज में शैक्षणिक क्रियाएँ दो धाराओं में चलाई गई है। एक तो औपचारिक पद्धतियाँ है, जिनमें संस्थागत शिक्षा आती हैं। दूसरी ओर समाज में लोक शिक्षण पद्धतियाँ भी चलाई गईं है जिसके द्वारा आमजनों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। इसमें लोक खेल, लोक नृत्य, लोक चित्र, लोक कथा आदि आते हैं।

प्राचीन काल में आश्रमों में एकाग्रता विकास पर काफी जोर दिया जाता था। पर आधुनिक विद्यालयों में सूचना आधारित शैक्षणिक क्रियाओं पर ही केवल ध्यान केन्द्रित करने के कारण एकाग्रता जैसी क्षमताओं का विकास गौण हो गया।

लेकिन लोक शिक्षण की गतिविधियों में एकाग्रता विकास को प्रमुख स्थान दिया गया है। मैंने राज्य, देश तथा विदेशों में प्रचलित लोक शिक्षण प्रक्रियाओं का अध्ययन किया तो इसमें एकाग्रता विकास की बहुत सारी गतिविधियाँ मिली। मैंने इन सभी गतिविधियों का अध्ययन किया तथा एकाग्रता के विविध चरणों में

एकाग्रता के पहलू

उनकी भूमिका को समझने का प्रयास किया। तत्पश्चात् मैंने एकाग्रता विकास के लिए ऐसी गतिविधियाँ विकसित करने का प्रयास किया जो विद्यालयों तथा घरों में आसानी से व्यवहार में लाया जा सकता है। इसी क्रम में पुस्तक में यह भी प्रयास किया गया है कि कक्षा में चाहे जो भी पढ़ाई हो, सबके साथ एकाग्रता विकास के आयामों को जोड़ा जाय। यथा – गणित के अभ्यासों के साथ एकाग्रता का कार्य जुड़े। भाषायी दक्षता के विकास के साथ एकाग्रता को जोड़ा जाय। चित्रात्मक गतिविधियों को इस प्रकार सिखाया जाय ताकि उसके साथ एकाग्रता का विकास हो। खेल की गतिविधियाँ इस प्रकार संचालित हो कि उसके द्वारा एकाग्रता स्वतः विकसित होती जाय। सृजनशीलता के साथ एकाग्रता के विकास के लिए मानसिक चित्र या मेन्टल विजुआईलेजेशन पर आधारित क्रियाओं को भी सम्मिलित किया जाय। ध्यान और प्राणायाम के साथ भी एकाग्रता के सरल अभ्यास जोड़े जाएँ। बच्चे जो करें उन्हें एकाग्रता की आवश्यकता के अनुरूप ढ़ाला जाय। इन सभी के संबंध में सुझावात्मक गतिविधियाँ इस पुस्तक में दी गयी हैं।

बच्चों में एकाग्रता

एकाग्रता विकास की क्रिया पूर्णतः वैयक्तिक है तथा इसके विकास हेतु सभी के लिए अलग-अलग कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है। यह ध्यान देने की बात है कि बच्चे अलग-अलग मेधा के होते हैं। सभी बच्चों की मेधा के अनुसार ही उनके लिए एकाग्रता विकास की कार्ययोजना बनायी जानी चाहिए। जिसमें रागात्मक क्षमता है, उनके लिए गीत के माध्यम से ही एकाग्रता विकास का प्रयास करना चाहिए, जबकि चित्र बनाने वाले के लिए चित्र के आधार पर ही एकाग्रता विकास करना चाहिए। सभी के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ सुझायी गयी हैं। गतिविधियों के साथ प्रबोधन एवं मूल्यांकन के उपाय भी बताए गए हैं।

पटना के स्कूल आॅफ क्रिएटिव लर्निंग में तो इसका नियमित रूप से प्रयोग किया जा रहा है। प्रयोग के समय इन गतिविधियों की कई पूरक पुस्तिकाओं तथा किट का भी निर्माण किया गया, यथा डेवलपिंग माईंड सीरीज भाग 1-5, डेवलप कन्सेन्ट्रेशन तथा कई अन्य सामग्रियाँ। स्कूल आॅफ क्रिएटिव लर्निंग में प्रत्येक वर्ष क्रिएटिविटी ओलम्पियाड का आयोजन भी किया जा रहा है जिससे बच्चों को एकाग्रता में अपनी उपलब्धियों को सबके बीच प्रदर्शित करना पड़ता है।

कान खीचाने की सजा

हाल में ही मुझे जानकारी मिली है कि हमारे पारंपरिक विद्यालयों में कमजोर छात्रो को दिए जाने वाले दंड – कान पकड़ कर उठक और बैठक पर जब अमेरिका में शोध किया गया तथा गतिविधि के दौरान ब्रेन की मैपिंग की गयी तो पह पाया गया कि इस क्रिया से बाएँ तथा दाएँ मस्तिष्क के बीच समन्वय बढ़ता है तथा इससे मस्तिष्क अधिक क्रियाशील हो जाता है। इसे कई देशों में ‘सुपर ब्रेन योग’ के रूप में प्रसारित किया जा रहा है। अस्पताल, विद्यालय तथा लर्निंग डिफिकल्टी वाले विशेष बच्चों के लिए केन्द्रों पर इसका नियमित अभ्यास कराया जा रहा है। यदि विद्यालयों में इसे दंड का माध्यम न बनाकर इसे एसेम्बली में नियमित व्यायाम का अंश बनाया जाय तो इससे एकाग्रता बढ़ेगी तथा बच्चों में अधिक शैक्षणिक उपलब्धि होगी। अतः स्वयं कान पकडि़ए, मुर्गासन कीजिए या उठक बैठक कीजिए – दंडात्मक रूप में नहीं वरन् मस्तिष्क के विकास के लिए, एकाग्रता के विकास के लिए।

हमारा एक ही उद्देश्य है – ऐसा शैक्षणिक वातावरण बनाना जिसमें सभी सफल हों, कोई असफल न हो। अतः सभी बच्चों में एकाग्रता का विकास कर उन्हें जीवन में पूर्ण रूप से सफल बनाया जा सकता है

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