सम्पादकीय टिप्पणी: रक्षक पुलिस छिनतई और पिटाई पर उतर आये तो यह शर्मनाक है

बेशक सारे पुलिसकर्मी बुरे नहीं हैं. पर कुछ पुलिसकर्मियों के चलते पुलिस महकमे की छवि खराब हो ही जाती है. बुधवार को पटना पुलिस के मुतल्लिक दो खबरें आयीं-आरपीएफ के एक जवान ने एक युवक से 80 हजार रुपये लूटा था. दूसरी खबर यह कि एसआई अनिल कुमार ने हेलमेट नहीं पहनन पर एक जूनियर डाक्टर की पिटाई कर दी और फिर प्रतिक्रिया में जूनियर डॉक्टरों ने अनिल को जम कर कूटा.

एएसआई अनिल कुमार की बेरहमी से हुई पिटाई( फोटो केशव कुमार)

एएसआई अनिल कुमार की बेरहमी से हुई पिटाई( फोटो केशव कुमार)

पिछले दस दिनों से पुलिस बिना हेलमेट और पिछली सवारी के लिए अनिवार्य हेलमेट के अभियान में जुटी है. हजारों लोगों को जुर्माना किया गया. लेकिन इसी आड़ में कुछ पुलिसकर्मियों ने वसूली का धंधा शुरू कर दिया. कुछ ने मारपीट भी शुरू कर दी. जुर्माना, धड़पकड़ तो ठीक है पर मार-पीट करने का अधिकार पुलिस को किसने दे दिया.

 

खबरों में बताया गया है कि पुलिस वाले को प्रतिक्रिया स्वरूप पिटाई लगने के बाद जूनियर डॉक्टरों को अरेस्ट किया गया. इस मामले में एएसआई अनिल कुमार का तर्त सुनिये जिस पर सहज ही विश्वास करना कठिन है. वह कहते हैं दो लड़के बिना हेलमेट के आईजीआईएमएस में घुस रहे थे. उन्हें हमने रोका. फाइन काटने की बात कही तो गालीगलौज करने लगे’. जरा सोचिये अनिल कुमार के साथ दो-तीन पुलिसकर्मी थे और इसके बावजूद बिना हेलमेट के दो लोग पुलिस वालों को गाली देने लगे. क्या अनिल कुमार की इस बात पर यकीन किया जा सकता है. जबकि छात्रों का तर्क है कि हेलमेट चेकिंग के दौरान एक छात्र को पीटा गया.

 

इस मामले में पटना के एसपी चंदन कुशवाहा का कहना है कि वीडियो फुटेज के आधार पर चार छात्रों पर एफआईआर की गयी है. चारों गिरफ्तार किये जा चुके हैं. लेकिन उन्होंने इस पर कुछ नहीं कहा कि एएसआई अनिल कुमार पर क्या कार्रवाई की जायेगी.

 

इसी रोज अखबारों में यह खबर छपी है कि आरपीएफ के जवान अशोक कुमार ने फरीदाबाद के युवक से 80 हजार रुपये छीने थे. पुलिस अशोक की गिरफ्तारी में लगी है.

 

पुलिस के इन दो व्योहारों से पुलिस के प्रति नाउम्मीदी बढ़ती है. हालांकि यह आम पुलिस बल का व्योहार नहीं है. ज्यादतर पुलिसकर्मी अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार हैं. पर नाकारात्मक खबरें ही ज्यादा चर्चा में आती हैं इसके कारण पुलिस की छवि और उसके भरोसे पर सवालिया निशान तो लग ही जाता है. उस पर से अगर बड़ा अफसर अपने कर्मियों के बचाव में आ जाये तो इससे गलत करने वालों का मनोबल बढ़ता है. मेडिकल छात्रों की पिटाई मामले में पुलिस के आला अफसरों ने एएसआई के सुलूक पर कोई टिप्पणी तक नहीं की जबकि जूनियर डाक्टर एसोसिएशन का कहना है कि उन्होंने ही पहले छात्र को पीटा. और उसकी प्रतिक्रिया में छात्रों ने एएसआई की बेरहमी से पिटाई की.

बेशक पुलिसकर्मी हमारे समाज का ही हिस्सा जो हमारे समाज के चरित्र का ही प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन जिम्मेदारी मिलने के बाद उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपनी वर्दी का सम्मान करेंगे. पर इन दोनों मामले में ऐसा नहीं दिखा.

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