सवाल बिहार का नहीं, मानसिकता का है काटजू साहब

प्राचीन काल से विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहे बिहार की महान धरती पर व्यंग्य बाण चलाने की मूर्खता वही कर सकता है जिसे इतिहास का ज्ञान न हो।मगध का साम्राज्य देश के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक का साम्राज्य पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान तक फैला हुआ था.katju

तबस्सुम फातिमा

नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष गवाह हैं कि शिक्षा के छेत्र में बिहार की क्या भूमिका रही। यहां प्राचीन इतिहास को दुहराना उद्देश्य नहीं। लेकिन उस विक्षिप्त मानसिकता का अंत होना ज़रूरी है जो मुम्बई से ले कर सुप्रीम कोर्ट के जज रहे काटजू जैसे विशिष्ट व्यक्ति के भीतर मौजूद है।


यह वही बिहार है ,जिसे साम्प्रदायिकता का गढ़ बनाने का सपना देखने वाले औंधे मुंह गिर जाते हैं। आडवाणी जी की सफल साम्प्रदायिक रथ यात्रा का चक्का जाम हो जाम होता है। जब केंद्र के बिचोलिये मीडिया वाले राजनितिक पार्टी के समर्थन में चुनाव के बहाने नफरत -राग गाने आते हैं तो बिहारी एकजुट हो कर ऐसा प्रहार करते हैं कि नफरत के सौदागरों को दिन में तारे नज़र आ जाते हैं।

 

ध्यान दें तो काटजू ने कश्मीर के साथ बिहार का तोहफा देने की बात कर के आतंकवादियों को ललकारा है। हिम्मत है तो बिहार ले के देखो। कश्मीर बचाने के लिए अकेले बिहारी अवाम काफी है। ५६ इंच का सीना केवल दिखाने के रहे। प्रधान मंत्री की जुमला बाज़िओं में दुश्मन के दस सर लाने वाला जुमला भी हांथी दांत साबित हुआ। .केवल दिखाने का। अवाम ने देख लिया कि जुमले बाज़िओं से कश्मीर का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। वह कहावत काटजू ने भी सुनी ही होगी। एक बिहारी सब पर भारी। यह प्रधान मंत्री को खुला सन्देश है क़ि बिहारिओं को सत्ता दे कर देखो। जो बिहार कर सकता है ,वह कोई दुसरा नहीं कर सकता।


मेरे विचार से काटजू ने अब तक बिहार का इतिहास अवश्य पढ़ लिया होगा। उन्हें माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं। अनायास ही उन के मुंह से एक सच निकल गया है। .बिहार ले जाओ। बिहारी रथ यात्रा की तरह आतंक का चक्का जाम करने की सलाहियत रखते हैं। .

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