सहजानंद सरस्वती: जीवन, संघर्ष आंदोलन और उपलब्धि

लगभग डेढ़ दषक पूर्व  साहित्यकार रामशरण शर्मा  कहा था ‘‘ आज सामाजिक न्याय की जिन ताकतों को हम बिहार में सत्तारूढ़ देखते हैं वो कतई संभव न होता यदि स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में क्रांतिकारी किसान आंदोलन न चला होता।’’sahjanand.saraswati

अनीश अंकुर
ढ़ाई दशक तक चले लंबे किसान आंदोलन के माध्यम से उन्होंने नीचे से दबाव पैदा किया फलस्वरूप, 1950 में , बिहार, देश भर में जमींदारी उन्मूलन करने वाला पहला राज्य बना। बाद में बिनोबा भावे ने देश भर में भूदान आंदोलन चलाया तो भूस्वामियों से सर्वाधिक जमीन , लगभग 6 लाख एकड़, उन्हें बिहार में ही प्राप्त हुई। बिहार में इतनी सफलता बिनोबा भावे केा कहीं नहीं मिली। इसकी वजह भी स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा चलाए गया आंदोलन ही था।

बचपन

स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म 1889 को महाषिवरात्रि के दिन हुआ था। इस वर्ष ये दिन 24 फरवरी केा मनाया जा रहा है। और उनकी मौत 26 जून 1950 को हुई थी। उनका जन्म गाजीपुर में हुआ था तथा बचपन का नाम नवरंग राय था। बेहद कम उम्र में ही नवरंग राय ने सन्यास ग्रहण कर लिया। सन्यास के पष्चात उनका नाम पड़ा स्वामी सहजानंद सरस्वती। उन्होंने देष के कई हिस्सों की यात्रा की। हिंदू धर्मग्रंथों का उन्होंने विषद अध्ययन किया और उसके आधिकारिक विद्वान बने।

आरंभिक जीवन
अपने प्रारंभिक दिनों में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने, जैसा कि उस समय प्रचलन था, जातीय संगठन भूमिहार ब्रहाण सभा , में काम करना षुरू किया। लेकिन बहुत जल्द ही उनका इन सभाओं से मोहभंग हो गया। इन सभाओं की उपयोगिता जमींदार अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया करते थे। उन्हें खुद इसका अनुभव हुआ ‘‘ जातीय सभाएं पहले तो सरकारी अफसरों केा अभिनंदन पत्र देने और राजभक्ति का प्रस्ताव पास करने के लिए बनी थी। इस प्रकार कुछ चलते-पुर्जे तथा अमीर, जातियों के नाम पर सरकार से अपना काम निकालते थे।’’
जातीय सभाओं की सीमाओं को समझ उन्होंने अपने अनुभव से किसानों के दुःख को पहचाना । इस दुःख-तकलीफ की असली जड़ जमींदारी प्रथा थीं। जमींदारी के विरूद्ध संघर्ष ज्यों-ज्यों आगे बढ़ने लगा जातीय सभाएं समाप्त होती गयी। बिहटा स्थित सीताराम आश्रम के प्रति जमींदारों में संषय पैदा होने लगा। जैसा कि उन्हें खुद इस बात का अहसास हुआ ‘‘ आश्रम के प्रति जमींदारों के विरोध ने मुझे यह भी प्रत्यक्ष बताया कि जातीय सभाएं और जाति व धर्म के नाम पर दिए जाने वाले दान का क्या अर्थ होता है। इन सभाओं केा धनिक और चलते-पूर्जे लोग अपने हाथ का खिलौना बनाकर रखते हैं और समय-समय पर कुछ पैसे देकर जमींदारी, अपना व्यापार और अपना प्रभुत्व कायम कर लेते हैं। न कि परलोक या उपकार के लिए कुछ करते हैं।’’
जैसे-जैसे स्वतंत्रता आंदोलन में किसानों की भागीदारी जैसे-जैसे बढ़ने लगी जमींदारी प्रथा के विरूद्ध भी भावना बलवती व वेगवान होती चली गयी। लेकिन कांग्रेस पार्टी जमींदारों के प्रति संघर्ष को लेकर अनिच्छुक थी। स्वामी सहजानंद सरस्वती केा ये अहसास हुआ ‘‘ बिहार के कांग्रेसी लीडर जमींदार और जमींदारों के पक्के आदमी हैं। एक-एक के बारे में गिन-गिन के कहा जा सकता है। और आखिर वे रिपोर्ट लिखते भी क्या? जमींदारी प्रथा के चलते जमींदारों ने इतने पाप और अत्याचार किसानों पर किए हैं और अभी भी करते हैं कि इंसान का कलेजा थर्रा जाता है और मनुष्यता पनाह माॅंगती है। ’’

गांधी का प्रभाव
महात्मा गाॅंधी के पष्चात किसी अन्य नेता ने किसानों में लोकप्रियता हासिल की वे थे स्वामी सहजानंद सरस्वती। इन्हीं वजहों से सोवियत संघ में हिंदुस्तान में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले दो ही षख्सीयतों को मान्यता प्राप्त थी। महात्मा गाॅंधी और स्वामी सहजानंद सरस्वती। आज से सौ वर्ष पूर्व ही 1917 में महात्मा गाॅंधी ने किसानों का चंपारण सत्याग्रह षुरू किया था। किसानों के सवालों को उठाने के बाद ही महात्मा गाॅंधी को राष्ट््रीय दर्जे का नेता माना जाने लगा।
स्वामी सहजानंद सरस्वती अपने प्रारंभिक दिनों में महात्मा गाॅंधी से बेहद प्रभावित थे। पटना में उनकी मुलाकात भी उनसे हुई । उन्हीं से प्रभावित होकर वे सन्यास का जीवन छोड़ कांग्रेस और स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हुए लेकिन किसानों के मसले जमींदारों के खिलाफ स्पष्ट स्टैंड न लेने की वजह से वे धीरे-धीरे उनसे दूर होते चले गए। यहीं गाॅंधी जी से उनके मतभेद उभरते गए। महात्मा गाॅंधी चाहते थे कि अॅंग्रेजों के खिलाफ सभी तबकों का एक संयुक्त मोर्चा बने। स्वामी सहजानंद सरस्वती का मानना था कि अॅंग्रेजों का औपनिवेषिक षासन जमींदारों पर टिका है।
अॅंग्रेजी साम्राज्यवाद का देशी आधार यही जमींदार है अतः इन्हें यदि उखाड़ फेंका जाए तो देश को औपनिवेषिक शासन से मुक्ति मिल जाएगी। कथा सम्राट मुंषी प्रेमचंद भी अपने अंतिम दिनों में लगभग ऐसे ही निष्कर्ष पर पहॅंुच रहे थे। उनकी कहानी ‘आहूति’ इसका परिचायक है जिसमें वे साम्राज्यवाद के देषी आधार यानी जमींदारी का प्रष्न उठा रहे थे। महात्मा गाॅंधी जमींदारों के विरूद्ध आर्थिक लड़ाई को आजादी के राजनैतिक संघर्ष से अलग रखना चाहते थे। स्वामी सहजानंद ठीक इसके उलट सोचते थे ‘‘ मैं आर्थिक लड़ाई को छोड़कर आजादी की लड़ाई का विरोधी हूॅं। मैं आर्थिक युद्ध को ही राजनीति युद्ध में परिणत करना चाहता हूॅं। मैं सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्रांति चाहता हूॅं।’’
महात्मा गाॅंधी के प्रति स्वामी सहजानंद की टिप्पणियां तल्ख व व्यंगात्मक होती चली गयी ‘‘ एस समय तो गाॅंधी जी इस होली ;विदेषी कपड़ों की होलीद्ध के बड़े ही हामी थे। उन्हें या उनके अनुयायियों को ऐसी बातों में हिंसा की बिलकुल गंध ही न मालूम पड़ती थी। मगर जमाने ने ऐसा पलटा खाया कि साम्राज्यवाद के नाष, पूंजीवाद के नाष तथा जमींदारी प्रथा के नाष में और इनके पुतले जलाने में भी उन लोगों को हिंसा की बू आने लगी है। मालूम होता है कि आजकल उनकी नसिका बहुत तेज हो गयी है। पहले ऐसी न थी। संसार परिवर्तनषील है।’’

भूमि के संकेंद्रण का गहरा संबंध फिरकापरस्ती से रहता है। आज बिहार में सांप्रदायिक शक्तियां सत्तासीन नहीं हो पायी है उसकी मुख्य वजह भूमि संबंधों में आयी गतिशीलता है जो मुख्यतः स्वामी सहजानंद सरस्वती की देन है। स्वामी सहजानंद सरस्वती की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले वामपंथी पूरे हिंदी प्रदेष में सबसे अधिक उपस्थिति बिहार में ही रही है।

भारतीय किसान सभा

स्वामी सहजानंद सरस्वती 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का जब गठन हुआ तो उसके  अध्यक्ष बनाए गए। 1937 में प्रांतीय सरकारों का गठन होता है। किसान आंदोलन में तेजी आती है। जमींदारों के विरूद्ध संघर्ष तेज होने लगता है। इन आंदोलनों का ही परिणाम था कि बिहार व उत्तरप्रदेष के मुस्लिम जमींदारों ने, जिन्ना के नेतृत्व में, पाकिस्तान की माॅंग उठायी। पाकिस्तान आज यदि फिरकापरस्त ताकतों का गढ़ बना हुआ है उसका कारण है बड़े-बड़े जमींदारियों का आज तक कायम होना। बिहार में समाजवादी व वामपंथी दोनों आंदोलनों का प्रभाव था कि भूमि संबंधों किसानों को तुलनात्मक रूप से थोड़ी राहत मिली।
राष्ट््रीय नेताओं में स्वामी सहजानंद सरस्वती सुभाषचंद्र बोस के करीब आए। सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने में स्वामी जी ने उनका साथ दिया था। कांग्रेस से हटने के बाद जब सुभाषचंद्र बोस ने ‘फारवर्ड ब्लाॅक’ बनाया तो उनका साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती ने दिया। 1940 के कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेषन के समानान्तर किए गए सम्मेलन में महात्मा गाॅंधी की मौजूदगी वाले से अधिक भीड़ स्वामी सहजानंद सरस्वती के पंडाल में थी।
फिरकापरस्त ताकतें धर्म का सार्वजनिक इस्तेमाल अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए करती रही हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती धर्म को निहायत व्यक्तिगत वस्तु मानते थे ‘‘ धर्म को मेरे विचार से सोलहो आना व्यक्तिगत चीज वस्तु है जैसे अक्ल, दिल, आॅंख, नाक आदि। दो आदमियों की एक ही बुद्धि या आॅंख नही हो सकती तो फिर धर्म कैसे दो आदमियों का एक होगा? जैसे रोगग्रस्त शरीर में अन्न की भूख नहीं होती उसी तरह पराधीन तथा विवेकहीन आत्मा में धर्म या आध्यात्म की भूख कहाॅं?’’ साथ ही यह भी कि ‘‘ धर्म के नाम पर सबसे ज्यादा अॅंधेरे खाता देखते हैं। वह व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो गया है। भेंड़ों की तरह हिंदू, मुस्लिम, क्रिस्तान आदि समूह होते हैं। इस प्रकार धर्म दिल की चीज न होकर बाहरी और दिखावटी वस्तु हो गयी है। हम षिखा और दाढ़ी से ही प्रायः हिंदू और मुसलमान का परिचय करते हैं। मगर मैं इस धर्म केा नहीं मानता। बल्कि कह सकते हैं कि मैं ऐसे धर्म केा समाज, देष और मानवता का षत्रु मानता हूॅं।’’
धर्म के नाम पर किए जा रहे पाखंड के विरूद्ध उन्होंने निर्ममतापूर्वक संघर्ष चलाया ‘‘ जिस देश के परलोक और स्वर्ग-बैकुंठ का ठेका निरक्षर एवं भ्रष्टाचारी पंडे-पुजारियों के हाथ में हो, कठमुल्ले तथा पापी पीर-गुरूओं के जिम्मे हो उसका तो ‘ खुदा ही हाफिज’ है।’’

सामाजिक न्याय

स्वामी सहजानंद सरस्वती जमींदारों के प्रति दृष्टिकोण को आजादी की लड़ाई में निर्णायक मानते थे और इसी पैमाने पर सबों का मूल्यांकन किया करते थे। जमींदारों से उन्हें कैसी वितृष्णा थी उनके इस वक्तव्य से समझा जा सकता है ‘‘ किसानों और किसान सेवकों को मिट्टी के बने जमींदार के पुतले से भी सजग रहना चाहिए। वह भी कम खतरनाक नहीं होता। और नही ंतो देह पर गिर जाए तो हाथ-पाॅंव तो तोड़ ही देंगे।’’

1990 में जब सामाजिक न्याय का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली ताकतें सत्तासीन हुई। लेकिन दुर्भाग्य है कि सामंतवादविरोधी जनलहर पर सवार होकर आयी सामाजिक न्याय का प्रतिनिधित्व कहे जाने वाले दलों ने कभी भी सामंती षक्तियों से टकराने की हिम्मत नहीं जुटायी।
पिछले 26 वर्षों से भी अधिक समय तक बिहार में आज तक भूमिसुधार का न होना इस बात परिचायक है।

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