सानिया सईद यानी पाकिस्तान की स्मृति ईरानी

पिछले हफ्ते दिल्ली में राजेन्द्र प्रसाद के पास बैठे थे कि एक झोंका आया और सामने से पाकिस्तानी टेलिविज़न की चर्चित और नामवर अदाकारा प्रकट हुईं. मेरे बिल्कुल सामने सानिया सईद मौजूद थीं.

सानिया सईद

सानिया सईद

शेष नारायण सिंह

जिन लोगों को पाकिस्तानी टेलिविज़न के बारे में मामूली सा भी अंदाज़ है उन्हें मालूम है कि सानिया सईद का क्या मतलब है.हिन्दुस्तानी टेलिविज़न में उस टक्कर की कोई स्टार नहीं है .तुलसी का रोल कुछ दिन तक कर चुकी अभिनेत्री स्मृति ईरानी में वह संभावना थी लेकिन वे राजनीति में चली गयीं और अब टी वी की दुनिया से दूर जा चुकी हैं.

सानिया सईद आजकल भारत आयी हुई हैं. पाकिस्तानी टेलिविज़न में वे अभिनेत्री , निदेशक, प्रोड्यूसर और एंकर के रूप में जानी जाती हैं.समकालीन टेलिविज़न में उनके टक्कर की भारत और पाकिस्तान में कोई कलाकार नहीं है . बताया जाता है कि दस साल की उम्र में उन्होंने अभिनय शुरू कर दिया था.जब सानिया से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्हें याद नहीं कि कब उन्होंने अभिनय शुरू किया था. क्योंकि उनके घर में थियेटर का माहौल था ,उनके माता पिता दिल्ली के अदब की उस परम्परा से ताल्लुक रखते हैं जिसे दिल्ली की तहजीब कहा जाता है.

सानिया ने बताया कि उन्होंने जब औपचारिक रूप से काम करना शुरू किया उसके पहले वे थियेटर को अपने बचपन के किसी खिलौने की तरह जानने लगी थीं .

सानिया का बचपन पाकिस्तान में जिया उल हक की तानाशाही के दौर में बीत रहा था. उनके पिता मंसूर सईद पाकिस्तान में तानाशाही निजाम के राजनीतिक दर्शन को हर मुकाम पर चुनौती दे रहे थे. भाई मंसूर उस तूफ़ान के हरावल दस्ते में शामिल थे और उसी दौर में उनकी यह बच्ची बड़ी हो रही थी. अपने इंतकाल के पहले उनसे जब दिल्ली में मेरी मुलाकात हुई थी तो उन्होंने गर्व से बताया था कि उन दिनों उनको पाकिस्तान में सानिया सईद के वालिद के रूप में पहचाना जाता है .

दिल्ली में मुलाक़ात के करीब तीन दिन बाद सानिया सईद से मुंबई में अचानक मुलाक़ात हो गयी. वर्सोवा के अपनी ममेरी बहन के फ़्लैट में फर्श पर बैठकर जब उसने मुझसे बात की तो मुझे लगा कि भाई मंसूर और आबिदा हाशमी सईद की यह बेटी उनके मिशन को आगे ले जा रही है .सानिया ने पाकिस्तान के हर ज्वलंत मुद्दे पर अपने अभिनय के ज़रिये हस्तक्षेप किया है .परिवार नियोजन जैसे मुद्दे पर पाकिस्तानी टी वी पर जिस कार्यक्रम ने तूफ़ान मचाया था उसकी मुख्य कलाकार सानिया सईद ही थीं.

जब कार्यक्रम बानाने वालों ने उनसे कहा कि मामला परिवार नियोजन का है और ऐसी बहुत सारी बातों का उल्लेख होगा जिनको पाकिस्तानी समाज में बहुत बोल्ड माना जाता है इसलिए उन्हें चाहिए कि वे अपने माता पिता से परमिशन ले लें तो सानिया ने कहा कि उनके पैरेंट्स को उनपर पूरा भरोसा है वे उनसे बात तो ज़रूर करेगीं लेकिन परमिशन जैसी कोई चीज़ उनके पालन पोषण में नहीं डाली गयी है .

उनको हर हाल में सही फैसले लेने की तमीज सिखाई गयी है .बहरहाल उन्होंने इस प्रोग्राम में काम किया और आहट नाम का यह कार्यक्रम पाकिस्तानी टी वी का बहुत महतवपूर्ण कार्यक्रम है. सानिया सईद ने यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की पढाई की है .शायद इसीलिएय जब वे किसी भी पात्र को परदे पर पेश करती हीं या नाताक में उसका रोल करती हैं तो लगता है कि सानिया नाम की अभिनेत्री कहीं चली गयी है ,उनके रोम रोम में उसी पात्र का बसेरा हो जाता है .

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सानिया कम्युनिस्ट माता पिता की बेटी हैं और यह उनके हर रोल में साफ़ नज़र आता है. कहीं नहीं लगता कि वे उपदेश दे रही हैं.उनका झुमका जान वाला रोल हर पाकिस्तानी को याद है . झुमका जान एक पारंपरिक रक्कासा थीं लेकिन उन्होंने औरत के रूप में अपनी ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जिया .पाकिस्तान के उस समाज में भी जहां कट्टरपंथियों की ही चलती है उस समाज में भी सानिया की झुमका जान एक सशक्त स्टेटमेंट के रूप में देखी गयीं..

सानिया सईद के परिवार के बारे में जब तक ज़िक्र न किया जाए समकालीन भारतीय की समझ में ही नहीं आएगा कि आज बुड्ढा यह क्या लिखने बैठ गया . उनके पिता मंसूर सईद ने भारत में छात्र राजनीति को दिशा दी थी लेकिन अपनी जिस कजिन से इश्क करते थे उनके माता पिता १९४७ में कराची पाकिस्तान जा बसे थे. आप शादी करने के लिए पाकिस्तान गए थे. भाई मंसूर ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय में नाम लिखाया तो स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य बने और आस पास के लोगों को पक्का यक़ीन हो गया कि बस अब इंक़लाब आने में बहुत कम अरसा रह गया है.

यह अलग बात है कि भाई मंसूर को ऐसा कोई मुगालता नहीं था. भाई मंसूर ने कभी किसी को धोखा नहीं दिया. अपने बचपन की दोस्त और अपनी रिश्ते की चचेरी बहन से जब वे शादी करने कराची गए तो किस को उम्मीद थी कि दोनों मुल्कों के बीच लड़ाई शुरू हो जायेगी. लेकिन लड़ाई शुरू हुई और वे वापस नहीं आ सके .

दिल्ली और कराची में बाएं बाजू की राजनीतिक सोच को इज्ज़त दिलाने में भाई मंसूर का बहुत बड़ा योगदान है .उन्होंने बाएं बाजू की राजनीति करने वालों को पाकिस्तान के खूंखार जनरल जिया उल हक से पंगा लेने की तमीज सिखाई थी.

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