साम्प्रदायिक उन्माद का हथकंडा

जब बिहार में बीजेपी और जनता दल ( यू ) के बीच झगडा शुरू हुआ था तो जो डर राजनीतिक जानकारों के मन में था वह सही साबित हो रहा है.betiah

शेष नारायण सिंह

बिहार में धार्मिक और साम्प्रदायिक बुनियाद पर राजनीतिक मोबिइलाजेशन शुरू हो गया है . देखा यह जा रहा है कि बिहार में दो संप्रदायों के बीच में झगड़े की शुरुआत किसी भी मामूली बात से होती है और साम्प्रदायिक तनाव की शक्ल अख्तियार कर लेती है . वर्ना नवादा में किसी ढाबे पर खाने के बारे में विवाद, या बेतिया में किसी जुलूस पर फेंके गए कुछ पत्थर साम्प्रदायिक दंगे की बुनियाद नहीं हो सकते. पिछले कई वर्षों से बिहार में साम्प्रदायिक तनाव के हालात पैदा भी नहीं हुए थे क्योंकि बीजेपी और जनता दल ( यू ) के नेता और उनके लुम्पन तत्व सरकार के समर्थन में थे और हर स्तर पर कोशिश की जा रही थी कि साम्प्रदायिक दंगे न फैलने पायें क्योंकि उससे अपनी सरकार की बदनामी होने का डर था . लेकिन अब सरकार जनता दल यूनाइटेड की तो अपनी सरकार है लेकिन बीजेपी के लिए वह पराई हो चुकी है . अब अगर यह सरकार प्रशासनिक स्तर पर फेल होती है तो बीजेपी को राजनीतिक फायदा ज़रूर होगा . बिहार में नवादा, बेतिया और खगड़िया में हुए साम्प्रदायिक तनाव को इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए.

नीतीश को बदनाम करने की कोशिश

आज तो अखबारों में वे फोटो भी छप गए हैं जिनको देखकर साफ़ लगता है कि सत्ता से अलग हुई पार्टी फ़ौरन से पेशतर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नाकारा साबित करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है .इस बात में दो राय नहीं है कि बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड के बीच विवाद और अलगाव होने के बाद राज्य सरकार के समर्थन का राजनीतिक बेस कमज़ोर पड़ा है क्योंकि बीजेपी वाले अब समर्थन नहीं सरकार को फेल करने की कोशिश कर रहे हैं उनको मालूम है कि अगर सरकार फेल होती है तो उनकी उपयोगिता पर सही राजनीतिक मुहर लग जायेगी और उनको उससे फायदा होगा. यह भी सच है कि नीतीश कुमार अब राजनीतिक प्रबंधन में पहले से ज़्यादा समय दे रहे हैं और राज काज में उनका ध्यान उतना नहीं लग रहा है जितना पहले लगता था . लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सत्ता से हटाये जाने के बाद बीजेपी वालों में गम भी है और गुस्सा भी है जो मामूली से मामूली बात पर फूट पड़ रहा है.

जिस तरह की तख्तियां जुलूस में नज़र आ रही थीं उनमें साफ़ कहा गया था कि यू पी ए और जनता दल यूनाइटेड वाले माइनारिटी वोट बैंक के लिए सब कुछ कर रहे हैं और उनकी राजनीति इसी वोट बैंक को खुश करने के लिए है . एक तख्ती ऐसी भी थी जिसे नीतीश सरकार के हाथ में दिया गया था और उसपर लिखा था कि हम माइनारिटी वोटर को अपना दामाद बनाने के लिए भी तैयार हैं.
इस जुलूस को जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने उत्तेजना फैलाने वाला माना

बिहार में राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप के दौर भी चल रहे हैं . जनता दल यूनाइटेड का आरोप है कि केन्द्र की यू पी ए सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति के लिए बहुत ही उपजाऊ ज़मीन तैयार कर दिया है . अब इस बयान का क्या मतलब है वह तो पार्टी के प्रवक्ता के सी त्यागी ही बता पायेगें लेकिन वे कहते हैं कि बीजेपी वालों का अब कोई दोस्त नहीं है , बीजेपी के नेता पाकिस्तानी सीमा पर हुई भारतीय सैनिकों की दुखद हत्या को युद्ध का उन्माद फैलाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं . उन्होंने कहा कि बिहार की सत्ता से हटने के बाद बीजेपी वालों के रुख को देखकर लगता है कि वे फिर से सरकार में शामिल होने या सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं . जनता दल यूनाइटेड का आरोप है कि इसी वजह से बीजेपी के मुकामी नेता मामूली विवादों को भी साम्प्रदायिक हालात बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं .

बेतिया में दंगे की साजिश

बेतिया की घटना की फोटो अब अखबारों में छप चुकी है और उसके बारे में विस्तार से जानकारी भी मिल चुकी है . नागपंचमी के एक जुलूस को लेकर महावीर अखाड़ा वाले जा रहे थे .जुलूस में बहुत सारे ट्रैक्टर थे . ट्रैक्टरों पर कुछ ऐसी झांकियां बनायी गयी थीं जिनसे नीतीश कुमार की बिहार सरकार और केन्द्र की यू पी ए सरकार का मखौल उड़ाने की कोशिश की गयी थी. जिस तरह का प्रस्तुतीकरण किया गया था उससे सोनिया गांधी ,मनोहन सिंह और नीतीश कुमार का अपमानित होना स्वाभाविक था . जिस तरह की तख्तियां जुलूस में नज़र आ रही थीं उनमें साफ़ कहा गया था कि यू पी ए और जनता दल यूनाइटेड वाले माइनारिटी वोट बैंक के लिए सब कुछ कर रहे हैं और उनकी राजनीति इसी वोट बैंक को खुश करने के लिए है . एक तख्ती ऐसी भी थी जिसे नीतीश सरकार के हाथ में दिया गया था और उसपर लिखा था कि हम माइनारिटी वोटर को अपना दामाद बनाने के लिए भी तैयार हैं .

इस जुलूस को जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने उत्तेजना फैलाने वाला माना . इन पोस्टरों और तख्तियों के देखे जाने के बाद जो पत्थरबाजी शुरू हुई उसके बाद कुछ सरकारी वाहन और जिले के पुलिस और प्रशासन के शीर्ष अधकारियों की गाड़ियों को तोड़ दिया गया .महावीर अखाड़े वाले जुलूस , पहले भी लाठी डंडों से लैस हुआ करते थे लेकिन उनका उद्देश्य किसी को अपमानित करना नहीं होता था, युद्धकला की ग्रामीण तरकीबों का प्रदर्शन मात्र हुआ करता था लेकिन इस बार बात बिलकुल अलग थी . जिन्होंने देखा है वे बताते हैं कि इस बार तेवर बिलकुल साम्प्रदायिक थे.

बिहार में जो हो रहा है वह शुद्ध रूप से धार्मिक आयोजनों के ज़रिये राजनीति चमकाने और अपने विरोधी के सामने मुश्किल पेश करने की कोशिश का नतीजा है .बीजेपी की कोशिश है कि धर्म को आधार बनाकर राजनीतिक मोबिलाइजेशन किया जाये क्योंकि इतने वर्षों तक नीतीश कुमार के साथ सत्ता का सुख भोगने के बाद वे सरकार की नीतियों और उसके काम काज की आलोचना करके पार पाने की स्थिति में नहीं हैं.

बीजेपी की कृपा से सत्ता हासिल करने वाले नीतीश कुमार ने बीजेपी को पूरी छूट दे रखी थी कि उसके मंत्री नौकरशाही में ऐसे लोगों को जिम्मेवारी का काम दें जो आर एस एस से छात्र जीवन में जुड़े रहे हैं . बिहार में आई ए एस अफसरों में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में बीजेपी और आर एस एस के कार्यकर्ता रहे हैं . ज़ाहिर है उनके ऊपर नीतीश कुमार का नियंत्रण नहीं है क्योंकि उनकी वफादारी अपनी पार्टी के नेताओं के प्रति है .

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