सीधे कबीर की परंपरा से जुड़ जाती है ‘PK’

लाखों लोगों ने PK देखी और हजारों ने पक्ष-विपक्ष में अपनी राय रखी. लेकिन नवल शर्मा जब सिनेमा ह़ॉल से वापस आये तो उन्होंने इसे कबीर की परम्परा से  जोड़ने का साहस किया.  पढिये उनका दृष्टिकोण.pk

मैंने भी PK देख ली . मुझे नहीं पता था PK देखने के बाद इतना अच्छा लगेगा. ग़जब का खुमार और ग़जब की मस्ती . धर्म के बैकग्राउंड में रोमांटिसिज्म की छौंक और रोमांटिसिज्म भी कैसा..कमर मटकाने और अंखियों से गोली मारने वाला नहीं बल्कि प्यार के माध्यम से मजहबी एकता का सन्देश देनेवाला.

पूरी फिल्म का ट्रीटमेंट एक ऐसे धरातल पर किया गया है जहाँ हास्य से ज्यादा व्यंग्य पर जोर है और यह व्यंग्य भी इतना उद्देश्यमूलक है कि हरिशंकर परसाई से काफी ऊपर सीधे कबीर की परंपरा से जुड़ जाता है.

लगता है PK कोई एलियन नहीं बल्कि वह मेरे भीतर बैठा चैतन्य है जो धर्म के ठेकेदारों की करतूतों से चिंतित भी और क्रोधित भी है .

धार्म के मूल तत्व पर प्रहार नहीं

जहाँ तक मैं समझ पाया, पूरी फिल्म में धार्मिक आस्था के मूल तत्वों पर कहीं भी प्रहार नहीं है . PK के दिल में भी हम सभी के सृजनकर्ता के प्रति वही भाव है जो एक आस्तिक मानस में होता है. अगर प्रहार है तो आस्था को भुनाने के उस पुरोहितायी अंदाज़ पर , आस्था की व्याख्या के उस संकीर्ण तरीके पर जो सदियों से ” जग्गू को सरफराज से अलग ” करत आया है. प्रहार है उस कर्मकांडीय तौर-तरीके पर जिसमें PK को लगता है कि भगवान को फूल- पत्ती , गंगाजल और पैसों के बल पर बेचा जा रहा है۔ ” शिव के डमरू के टूटे मनके ” से जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है.

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चुनाव पूर्व और चुनाव बाद की नैतकिता में अंतर

धर्म के मैनेजरों द्वारा धर्म की विकृत व्याख्या और जनता की गाढ़ी कमाई को धर्म का भय दिखा कर लूटने के उस गोरखधंधे पर प्रहार है जिसके खिलाफ सूर, तुलसी, कबीर और दादू जैसे संतों और उनसे भी पहले मोईनुद्दीन चिश्ती जैसे संतों ने भी आवाज़ उठायी थी .

घर में होनेवाले पूजा – पाठ में गोबर के छोटे छोटे पिंडों में गौरी– गणेश को क़ैद होते हम सभी प्रायः देखते हैं और बिना द्रव्य चढ़ाये कार्यक्रम आगे भी नहीं बढ़ता. यही अंतर है उस भगवान, जिसने हमें बनाया और उस भगवान, जिसे पुरोहितों ने बनाया है.

निजी अनुभव 

एक बार मैं सपत्नीक जगन्नाथपुरी गया था. वहां मंदिर के प्रांगण में एक विशाल अक्षयवट वृक्ष है. ऐसी मान्यता है कि जो उस वृक्ष की शाखाओं में पत्थर बंधता है जगन्नाथ जी उसपर प्रसन्न हो जाते हैं. जैसे ही मेरे हाथ धागे में पत्थर लिए बाँधने के लिए उठे, वहां बैठे एक ‘’मेनेजर ‘’ ने मुझे रोक दिया और कहा कि इसको बाँधने का विशेष विधि-विधान है. वो मुझे वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर ले गए और बैठाकर लगे जाल फेंकने.

पहला सवाल उन्होंने किया ‘आप कौन सा ऐसा फल अर्पित करेंगे जिसका भोग भगवानत्रयी (जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा जी) सालों भर करेंगे –सेब, अंगूर या अनार’. बेरोजगारी का दौर था , मैं डर गया ,क्योंकि सारे फल महँगे थे . उस लिस्ट में पपीता या अमरुद जैसा गरीब फल कहीं था ही नहीं. दूसरा सवाल साल भर लगाये जानेवाले सूखे मेवे पर था- ‘काजू, बादाम या पिस्ता’. बाप रे ! मैंने पत्नी से बोला कि लगता है कि आज इ पंडीजीवा जान ले लेगा का ! धर्मभीरु मन में धर्म का भय भी बैठा हुआ था जैसे ‘’’ गोदान ‘’ में होरी के मन में था.‘’ ब्राह्मण के रुपये? बाप रे, एक पाई भी दब गयी तो हड्डी फोड़कर निकल जाएगी ‘’.

खैर मैंने मन को कड़ा किया और सीधे कहा कि पंडीजी एकमुश्त बताइए , छोड़िये इ सब. पंडीजी ने दस हज़ार इक्यावन से शुरुवात की और मोल– तोल करते हुए एक सौ इक्यावन पर आ गए.

बस उसी क्षण मेरे विद्रोही मानस ने एक कठोर निर्णय लिया और आसन से उठकर वहां बैठे एक भिखमंगे के पास गया और उसके कटोरे में एक सौ इक्यावन रुपये डाल दिया और जाकर वृक्ष में पत्थर बांधकर पंडीजी को बोला कि अगर भगवान में मेरी श्रद्धा होगी तो मेरी मनोकामना जरुर पूरी करेंगे .

यही वो अंतर है, यही वो पाखण्ड है जिसपर पूरी फिल्म में चोट है. हर धर्म के पाखण्ड पर चोट हिन्दू , मुस्लिम ,सिक्ख , ईसाई , जैन सभी के उन पाखंडों पर निर्मम चोट है जो मनुष्य और भगवान में और मनुष्य – मनुष्य में दूरी बनाये रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं.

धर्मान्तरण पर भी उतना ही करारा व्यंग्य है-‘’ पादरी कहते हैं कि ईसाई बनूँगा तभी मेरा उद्धार होगा. मैं पूछता हूँ कि मैं हिन्दू से ईसाई क्यों बनूँ ? अगर भगवान को मुझे ईसाई ही बनाना होता तो हिन्दू परिवार में मुझे क्यों पैदा करते? ‘’
मुझे लगता है प्रत्येक उस व्यक्ति को PK देखना चाहिए जो उस भगवान की संतान है जिसने हम सबको बनाया है. हो सकता है कुछ लोगों की नज़र में PK गलत हो पर अगर PK गलत है तो कबीर भी गलत होंगे और सबसे बढ़कर हमारे तुलसी भी गलत होंगे जिन्हें खुद ” माँग के खईबो और मस्जिद में सोइबो ” कहने में कोई गुरेज नहीं था और जिनके राम को भी शबरी के जूठे बेर खाने में आनंद मिलता था.

naval.newनवल शर्मा एक राजनीतिक कार्यकर्ता से ज्यादा राजनीतिक चिंतक के रूप में जाने जाते हैं. अपने मौलिक और बेबाक विचारों, टिप्पणियों के लिए मशहूर नवल शर्मा अकसर न्यूज चैनलों पर बहस करते हुए दिख जाते हैं.  वह जनता दल यू के प्रदेश प्रवक्ता रह चुके हैं. उनसे  nawalsharma.patna@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

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