सुनों राजनेताओं यह मुसलमानों की हिस्सेदारी का सवाल है

 

बिहार में 17 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम वोट के लिए सब एड़ी चोटी का दम लगाते हैं पर वाजिब हिस्सेदारी की बात पीछ रह जाती है. वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार इन पेचीदगियों से पर्दा उठा रहे हैं.

फोटो लाइव मिंट

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राजनीति और वह भी चुनावी राजनीति के लिहाज से मुसलमान वोट खास मायने रखता है. सभी पार्टियां इस आबादी को अपने साथ करने के उपक्रम करती हैं. मगर वाजिब हिस्सेदारी का सवाल पीछे छूट जाता है.

यह दीगर है कि इस आबादी के बारे में एक खास किस्म का भ्रमजाल है जो पूर्वाग्रह की जमीन तैयार करने में मददगार होता है. शायद  जिम्मेवार राजनीति मुसलमानों की शैक्षिक, आर्थिक हालातों के साथ संसद और लोकसभा में उसके प्रतिनिधित्व की बात तथ्यों के सहारे करती, तो तसवीर दूसरी होती. 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में मुसलमानों की आबादी 16.9 फीसदी है. लेकिन हैरान करने वाला तथ्य है कि इस आबादी को उसकी तुलना में न तो विधानसभा में प्रतिनिधित्व मिल रहा है और न ही लोकसभा में.

सबसे कम नुमइंदगी

2010 के विधानसभा चुनाव में केवल 15 मुसलमान विधायक बने जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मात्र चार सांसद बने. आजादी के बाद विधानसभा और लोकसभा में मुसलमान प्रतिनिधियों की यह  सबसे कम संख्या है. दरअसल, यह भी सच है कि मुसलमान वोट के लिए चिंतित तो सभी रहते हैं, पर उनकी आबादी के लिहाज से उन्हें टिकट भी नहीं मिल पाता.

तब 40 सीटें थी सुरक्षित

बिहार में मुसलिम राजनीति की मौजूदा तसवीर पर आने के पहले इसकी पृष्ठभूमि पर एक नजर डालना बेहतर होगा. राज्य में आजादी के पहले जिस तरह पिछड़ी जातियों ने राजनीतिक हिस्सेदारी व अपनी पहचान के लिए त्रिवेणी संघ  बनाया था, उसी तरह अब्दुल कयूम अंसारी ने मोमिन तहरीक नामक संगठन के जरिए पसमांदा मुसलमानों को एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश की थी. मगर यह सिलसिला दूर तक नहीं जा सका. 1937 और 1946 के चुनाव में मुसलमानों के लिए  40 सीटें सुरक्षित थीं. पहले चुनाव में 40 सीटों में से 18 पर कांग्रेस और 20 सीटों पर मुसलिम इंडिपेंडेंट पार्टी के उम्मीदवार विजयी हुए थे. दो सीटों पर मुसलिम लीग के उम्मीदवार चुनाव जीतने में कामयाब हो सके थे.

मुस्लिम लीग की लोकप्रियता

1946 के चुनाव में हालात पूरी तरह बदल गये थे. अंग्रेजी राज में हुए दूसरे चुनाव में मुसलिम लीग की सीटें बढ़कर 34 हो गयीं थीं. तब मोहम्मद अली जिन्ना का गांधी मैदान में भाषण हुआ था. दरअसल, 1937 के चुनाव के बाद मुसलिम इंडिपेंडेट पार्टी के प्रमुख मोहम्मद युनूस के सरकार बनाने के चलते जो सलूक किया गया, उसका बहुत खराब संदेश मुसलिम आबादी के बीच गया था. इसका नतीजा 1946 के चुनाव में मुसलिम लीग की सीटों में भारी इजाफे के रूप में सामने आया. जबकि उस चुनाव में जमीअत मोमिन को पांच और कांग्रेस को एक सीट पर कामयाबी मिली थी.

उस चुनाव में जमीअत और कांग्रेस के बीच चुनावी तालमेल हुआ था. जमीअत के उम्मीदवार शाहाबाद की सीट से केवल आठ वोटों के अंतर से मुसलिम लीग के उम्मीदवार के हाथों पराजित हो गये थे. जमीअत की ओर से उस चुनाव परिणाम को चुनौती देते हुए आरोप लगाया गया कि मुसलिम लीग के उम्मीदवार ने कई इंतकाल कर चुके वोटरों के वोट भी अपने पक्ष में डलवा दिये. यह चुनावी धांधली का मामला था. जमीअत की शिकायत की जांच हुई और मुसलिम लीग के उम्मीदवार मोहम्मद मोहियुद्दीन का चुनाव रद्द कर दिया गया. जमीअत के नेता थे अब्दुल कयूम अंसारी. वह रांची सह सिंहभूत सीट से निर्वाचित हुए थे. उन्हें श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में जगह मिली. जबकि कांग्रेस के डॉ सैयद चुनाव जीतने वाले एकमात्र उम्मीदवार थे.

दो धाराओं के बीच

कांग्रेस का रामगढ़ सम्मेलन 1940 में हुआ और उसके बाद ही लाहौर में मुसलिम लीग का. लीग ने अपने सम्मेलन में पाकिस्तान के समर्थन में प्रस्ताव पास कर दिया. यह मुसलिम राजनीति के सामने नयी स्थिति थी. राज्य में मुसलिम लीग का प्रादेशिक संगठन 1908 में मजहरूल हक की अध्यक्षता में बना था. तब लीग सांप्रदायिक आधार पर सियासत के रंग में नहीं डूबा था. कई इतिहासकारों ने यह तथ्य रखा है कि उस दौर में बिहार के गैर मुसलमान और मुसलमान एक साथ, कंधे से कंधा मिलाकर खिलाफत आंदोलन में शामिल थे. 1942 में कौंसिल के हुए चुनाव के दौरान दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मुंगेर और सासाराम में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए. इसके पीछे हिन्दुओं और मुसलमानों के कुछ संगठनों ने इन दंगों को खूब हवा दी. मुसलिम लीग भी तब तक सांप्रदायिक आधार पर राजनीति में खुलकर उतर चुकी थी. लीग की इस राजनीति का विरोध करने में मोमिन जमात, जमीअत उलेमा, अहरार पार्टी और खाकसार जैसी पार्टियां सामने आ चुकी थीं. इन पार्टियों ने मिलकर 8 मार्च 1927 को पटना के अंजुमन इसलामिया हॉल में सम्मेलन किया और मुसलिम लीग को गद्दार तक घोषित करने से गुंरेज नहीं किया. देश बंटवारे के बाद ये पार्टियां हिन्दुस्तान दिवस मनाती थीं तो मुसलिम लीग पाकिस्तान दिवस. मुसलिम सियासत की दो धाराएं दरअसल, दो सामाजिक बनावट की उपज थी. एक धारा के साथ उच्च वर्गीय मुसलमान थे, तो दूसरी धारा पिछड़े मुसलमानों की थी.

भारत विभाजन के बाद बहुतेरे मुसलिम लीग के नेता पाकिस्तान नहीं जा सके. उन्हें सियासी आधार की जरूरत थी. उनके लिए कांग्रेस बेहतर जगह थी. पत्रकार अली अनवर अपनी किताब मसावात की जंग में स्वतंत्रता सेनानी हबीबुर्रहमान के हवाले से लिखते हैं: कांग्रेस को गुलाम मुसलिम लीडर चाहिए थे, आजाद नहीं. सो, उसने पूर्व मुसलिम लीगियों को तरजीह दी. दरअसल, वे लीडर कांग्रेस में पनाह लेने गये थे. रूलिंग पार्टी कोई दूसरी होती, तो उसके साथ भी वे जुड़ जाते.

प्रभात खबर में प्रकाशित लेख

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