सृजन संसार में मगन आईएएस दीपक आनंद की कविता- मैं ‘वो’ नहीं हूं

आईएएस अफसर दीपक आनंद इन दिनों सृजन संसार में मगन हैं. उन्होंने एक कविता में गांधी, मार्क्स, योगी, भोगी लेफ्ट, लेफ्ट राइट- गोया सबका अंजाम एक सा होने का उल्लेख करते हुए बताया है कि दर असल इंसान एक यात्री है. वह इस कविता में खुद को तलाशने की भी कोशिश कर रहे हैं.

मैं ‘वो’ नहीं हूं 

जीतोगे ?
जाओ जीत लो ,दुनिया जीत लो
याद रखना ,सिकंदर महान को ,
आकर लेटा था वहीं, जहां लेटे थे सब
गांधी -मार्क्स ,योगी -भोगी ,साधु -शैतान
राजा – रंक ,लेफट -राइट ,पूरब -पश्चिम
सब लेटे थे ,सब ….साथ में

पाओगे ?
पा लो ,प्रेम – यश – धन -राज
सब पा लो

हो ?
कलाकार /चित्रकार /रचनाकार
नेता /अभिनेता /दाता -विधाता
प्रभावशाली ( Impressive)
रहो …..

मैं ?
मैं तो य़ात्री हूँ ,य़ात्रा मेरी जारी है
कुछ ‘करने ‘ या ‘बनने ‘ की
दौड़ में नहीं हूँ
मैं ‘वो ‘ नहीं हूँ .

About The Author

2007 बैच के बिहार कैडर के आईएएस अफसर दीपक आनंद मूल रूप से सीतामढ़ी से ताअल्लुक रखते हैं. वह अनेक जिलों के डीएम के अलावा बिहार सरकार में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं.

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