ये समझिए कि नीतीश को समझना आसान नहीं

नीतीश कुमार भारतीय राजनीति का ऐसा चेहरा हैं जिनके बारे में अनुमान लगा पाना लगभग असंभव सा है. वह अकसर चौकाने वाले फैसले करते हैं. वह जब फैसले लेते हैं तो अमूमन ऐसा  नहीं होता कि इसका आभास उनके निकटतम लोगों को भी होता हो.nitishkumar

इर्शादुल हक

नीतीश अब मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके हैं. अब उनकी आगे की रणनीति क्या होगी, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता.

लोकसभा चुनाव परिणाम आने के दूसरे दिन बाद उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. यह फैसला आसान नहीं था. इसके लिए हौसला चाहिए. खासकर तब जब जोड़ कर के सदन में बहुमत साबित करना उनके लिए कोई खास मुश्किल काम नहीं था.

कुछ महीने पहले उन्होंने अपनी पार्टी से 3 लोगों को राज्यसभा का मेम्बर बनवाया था. इनमें एक कहकशां परवीन भी थीं. जब उन्हें इस बात की खबर लगी तो  खुशी और आश्चर्य से वह रोने लगीं क्योंकि उन्हें इस बात की पहले से कोई जानकारी नहीं थी. इससे पहले भी एक राज्य सभा के सदस्य को उन्होंने दोबारा राज्यसभा में भेजा तो उन्हें यह विश्वास ही नहीं हुआ. उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि पार्टी ने उन्हें पहले सूचित किया था कि वह राज्य सभा के बजाये लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी करें.

नीताश ने फिर चौकाया, जीतन मांझी को सीएम बनाया

नीतीश कुमार राजनीतिक दांवपेच के माहिर हैं. वह अपनी रणनीति और अपने दांव का आभास किसी को नहीं होने देते. हालांकि अपनी सम्यक रणनीति को हर राजनेता छुपा कर रखता है पर नीतीश को इसमें महारत हासिल है. सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि अण्णे मार्ग के अंदर हर पल दस्तक देने वाले भी नहीं जानते कि असल में नीतीश वही हैं जो वह जानते हैं या कुछ और.

अगर कोई नेता या उनसे मिलने-जुलने वाला कोई भी आदमी नीतीश के बारे में उतना ही जानता है जितना वह जनवाना चाहते हैं. नीतीश के हंसी-मजाक के साथी अगर कोई है तो वह यह दावा नहीं  कर सकता कि गंभीर चिंतन का भी वही साथी होगा. उनके करीबी नौकरशाह भी नीतीश के सिर्फ उसी पक्ष को जानते हैं जिस पक्ष या जिस विषय पर नीतीश उनसे चर्चा करते हैं.

उनका रसोइया उनके खाने पीने के जायके के बारे में तो बता सकता है लेकिन वह उनके कपड़ों की पसंद के बारे में यकीन के साथ कुछ भी नहीं कह सकता. इतना ही नहीं, पार्टी के अंदर की राजनीति पर गहरी मंथन, जिससे नीतीश करते हैं वह यह दावा नहीं कर सकता कि प्रशासनिक मामलो में भी नीतीश उससे राय लेते हों.

नीतीश सार्वजनिक जीवन में जितना सतर्क और चाक चौचबंद रहते हैं उतना ही निजी जीवन में भी रहते हैं. उनकी सतर्कता का आलम यह है कि उनके साथ साया की तरह मडराने वाले अधिकारी , सुरक्षा अधिकारी भी उन्हें समझ पाने का कभी दावा नहीं कर सकते.

ऐसा नहीं है कि बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार में यह बदलाव आया था. एक दौर में जब वह लालू के साथ थे तो लालू उन्हें अपना चाणक्य कहा करते थे. जब नीतीश, लालू से अलग हुए तो लालू उनकी आलोचना करते हुए कहा करते थे कि नीतीश के पेट में दांत है. लालू का इशारा हुआ करता था कि उनके अंदर की बात को कोई नहीं जानता.

अब चौंकाने वाले अपने ताजा फैसले के तहत नीतीश कुमार ने अपने साथ मंत्री रहे जीतन राम मांझी को बिहार का नया मुख्यमंत्री चुन लिया है.

 

 

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