हाशिमपुरा की पीड़ा: कहां हो मुस्लिम परस्तो ?

42 निर्दोष अल्पसंख्यकों की हत्या के आरोपियों को अदालत द्वारा बरी किये जाने के बाद आम लोग हत्प्रभ हैं. पर याकूब  कुरैशी जैसे धंधेबाज नेता अपने घर से कुछ किलोमीटर के फासले पर हाशिमपुरा झांकने तक नहीं पहुंचे

याकूब कुरैशी

याकूब कुरैशी

वसीम अकरम त्यागी

राजनीतिक दृष्टी से भी मेरठ चर्चाओं का केंद्र रहता आया है, इसकी एक खास वजह यह भी मानी जाती है कि मेरठ जनपद के अंतर्गत आने वाली हस्तिनापुर विधानसभा पर जिस पार्टी का प्रत्याशी चुनाव जीतता है उसी पार्टी की राज्य में सरकार है। वर्तमान में मेरठ की तीन की विधानसभा सीटें समाजवादी पार्टी के पास हैं, सपा जिसके बारे में कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में सपा मुसलमानों की पहली पसंद है। खैर 22 मार्च को अदालत का फैसला आने के बाद जहां हाशिमपुरा के लोग गमजदा हैं वहीं शहर के नेताओं से भी नाराज नजर आते हैं। यह नाराजगी इसलिये भी है क्योंकि अभी तक किसी भी पार्टी के नेता ने जाकर उनका गम बांटने की कोशिश नहीं की है। जबकि हाशिमपुरा से कुछ ही कदम की दूरी पर राज्य सरकार के दर्जा प्राप्त मंत्री रफीक अंसारी, और अय्यूब अंसारी रहते हैं।

मगर किसी ने भी जाकर उनकी सुध तक नहीं ली है। पूर्व सांसद और मेयर हाजी शाहिद अखलाक भी शहर में ही रहते हैं जिनके पिता हाजी अखलाक मरहूम ने इस त्रासदी के बाद नाराद दिया था कि दंगा नहीं व्यापार देंगे, नफरत नहीं प्यार देंगे, मगर उनके वारिस जो मेरेठ से सांसद और मेयर भी रहे उन्होंने भी हाशिमपुरा के पीड़ितों से मिलना जरूरी नहीं समझा। हाशमिपुरा के पीड़ित मोहम्मद नईम कहते हैं कि अभी तक हमारे पास शहर का कोई नेता नहीं आया है, वही नेता जो चुनाव के वक्त जब वे वोट पाने की मजबूरी में होते हैं तब उनके पास आते हैं मगर आज हम परेशान हैं, अदालत के फैसले से दुःखी हैं, हमें न्याय नहीं मिला है मगर किसी ने भी हमारे पास आकर हमारा दुःख बांटने की कोशिश नहीं की है, नईम कहते हैं कि शायद हम गरीब और मजदूर वर्ग से आते हैं इसीलिये नेता लोग हमसे दूरी बनाये हुए हैं।

मुस्लिम नेताओं की चुप्पी

नईम की बातों में सच्चाई भी दिखती है जिसका अंदाजा उस वक्त हो जाता है जब पूर्व सांसद शाहिद अखलाक पत्रकारों तक से बात करने के लिये भी तैयार नहीं हो पाते। यही हाल पूर्व मंत्री और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चर्चित नेता हाजी याकूब कुरैशी का है उन्होंने भी हाशिमपुरा के पीड़ितों को सांत्वना देने के लिये कोई कदम नहीं उठाया है। शहर की राजनीति की धुरी पर उसी पहिये पर घूम रही है जिस पर राज्य सरकार टिकी है हाशिमपुरा को लेकर जो रवैय्या प्रदेश सरकार का है वही इस शहर की राजनीति का है, शहर में ही कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर रहते हैं मगर जहां से इस दुःखी बस्ती की दूरी महज एक या डेढ़ किलो मीटर है।

मगर विधायक हो या मंत्री या फिर राज्य सरकार में दर्जा प्राप्त मंत्री ही क्यों न हो हाशिमपुरा को लेकर अखबारों में तो एक आध बार बयान दिये हैं मगर इस पीड़ितों की बस्ती में आकर किसी ने भी उनका हाल जानने की जहमत नहीं उठाई है। प्रदेश सरकार के जो कारिंदे हैं उनकी अपनी राजनीतिक मजबूरी हो सकती थी कि वे हाशिमपुरा पर बोल नहीं सकते मगर जो विपक्ष में हाजी याकूब, शाहिद अखलाक जैसे तथाकथित मुस्लिम नेता हैं जिनका संबंध भी उस राजनीतिक दल से है/ रहा है जो शोषितों की इकलौती पार्टी मानी जाती है उनकी एसी कौनसी मजबूरी थी कि उन्होंने हाशिमपुरा को भुला दिया ? या सिर्फ राजनीति के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेलना, सियासत से मिले जख्मों को चुनाव के वक्त उठाकर ध्रुव्रीकरण करना, और सफेद कुर्ता पहनकर वातानुकूलित गाड़ियों में घूमना ही राजनीति का पर्यायवाची होकर रह गया ? गरीब अवाम इंसाफ चाहती है वह एक एसा नेता चाहती है जो उसके दुःख को समझ सके, उस पर मरहम लगा सके क्या इसमें क्षेत्रीय नेताओं की कोई भूमिका रही है कि उन्होंने हाशिमपुरा के पीड़ितों पर कोई दिलासा दिया हो ? उनके घर गये हों उनकी हिम्मत बढ़ाई हो क्या यह लड़ाई सिर्फ हाशिमपुरा के पीड़ितों की लड़ाई है ? क्या यह लड़ाई समाजिक न्याय की लड़ाई नही है ? उसी समाजिक न्याय की जिसकी राजनीतिक के मंच से हजारों बार घोषणा की जाती है। मेरठ के मुस्लिम परस्त नेताओं और राज्य सरकार को हाशिमपुरा के लोगों के इन सवालों का जवाब तो देना ही होगा। न्याय की आस में पथराई आंखों को न्याय की रौशनी दिखानी होगी। उनके साथ उनके दुःख में भागीदार बनना होगा अगर वे एसा नहीं करते हैं तो फिर किस मुंह से कहते हैं कि वे गरीबों के मसीहा और स्यंवघोषित मुस्लिम परस्त हैं ?

बोले औवेसी हाईकोर्ट जाये प्रदेश सरकार

ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) पार्टी ने उत्तर प्रदेश सरकार से हाशिमपुरा नरसंहार मामले में दिल्ली की तीसहजारी अदालत के फैसले को चुनौती देने की मांग की है। इस मामले में कोर्ट ने हत्यारोपी प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (पीएसी) के सभी 16 जवानों को संदेह के आधार पर बरी कर दिया है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘यह फैसला न्याय की बहुत बड़ी विफलता है। फैसले में खुद कहा गया है कि मामले में जांच ठीक ढंग से नहीं की गई है। बहुत से लोगों को उठाया गया और उनकी हत्या कर दी गई। ये हत्याएं सरकार ने खुद कराईं, लेकिन अपराधियों को सजा नहीं मिली।’ हैदराबाद से सांसद ओवैसी ने कहा, ‘प्रदेश में शांति व्यवस्था बरकरार रहे इसलिए राज्य सरकार को फैसले को चुनौती देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश जल्द ही निर्दोष करार दिए लोगों के खिलाफ अपील करे।’ उन्होंने कहा कि नरसंहार के पीड़ितों को न्याय दिलाना सुनिश्चित कराना कांग्रेस, भाजपा और बसपा (सभी पार्टियों की कभी न कभी प्रदेश में सरकार रह चुकी है) का भी नैतिक दायित्व था।

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