हिंदू धर्म के लिए घातक है, हिंदू राष्ट्र की कल्पऩा

वरिष्ठ पत्रकार असितनाथ तिवारी इस्लाम और ईसाइयत की तरह  हिंदू धर्म का विस्तार न होने के तीन महत्वपूर्ण कारकों की चर्चा करते हुए बता रहे हैं कि हिंदू राष्ट्र की कल्पना हिंदुईज्म के लिए घातक है.

हिंदू धर्म का विकास भारत के अलावा दूसरे देशों में बहुत ही कम हुआ। नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदू हैं वो हिंदू धर्म के विकास के साथ ही उस ज़मीन पर रहते आ रहे हैं। दुनिया के बाकी देशों में जो थोड़े-बहुत हिंदू हैं वो इसी भू-भाग से वहां पहुंचे हैं। मॉरिशस, दक्षिण अमेरिका, फीजी में जो हिंदू हैं वो कभी मजदूरी के लिए वहां ले जाए गए थे। बाद के दिनों में रोजी-रोजगार की तलाश और बेहतर अवसरों का फायदा उठाकर कुछ लोग दूसरे देशों में पहुंचे। इन सबके बावजूद हिंदू धर्म का विकास उस रफ्तार से नहीं हुआ जिस रफ्तार से इसाई और मुस्लिम धर्मों का विकास हुआ। जबकि, हिंदू धर्म का इतिहास कम से कम 22 हजार साल पुराना है। ढाई हजार पहले आया इसाई धर्म दुनिया के ज्यादातर देशों में अच्छी खासी आबादी के साथ मौजूद है और 1500 साल पहले आया इस्लाम पूरी दुनिया में धमक के साथ विस्तार पा चुका है। तो आखिर क्यों हिंदू धर्म तुलानात्मक विकास में पीछे रह गया ? 

 


हिंदू धर्म सबसे पुराना धर्म है लेकिन धर्म में सेवाभाव की कमी रही है। सेवावृत्ति मुख्य रूप से इसाई धर्म में पनपी। सेवावृत्ति की बदौलत इसाई धर्म ने बड़ी तादाद में दूसरे धर्मावलंबियों को अपनी ओर आकर्षित किया। बड़ी तादाद में हिंदू भी इसाई बने। सेवाभाव की कमी हिंदू धर्म के विकास में एक बाधा रही।
हिंदू धर्म के विकास में जो दूसरी बड़ी बाधा आई वो है वर्ण व्यवस्था की जगह जाति व्यवस्था का आना। वर्ण व्यवस्था मतलब ऊंच-नीच का भाव। वर्ण व्यवस्था में ये बात नहीं थी। वर्ण व्यवस्था में सबको समान माना गया था। चातुर्वर्ण्य में सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा समान थी। श्रमाची व्यवस्था म्हणजे वर्ण-निष्ठा श्रमाची अनास्था वर्गभेद- मतलब निरपवाद रूप से श्रमनिष्ठा अपनाने वाले सभी एक समान हैं। ये व्यवस्था टूटी और जाति व्यवस्था ने सिर उठाया। ये जाति व्यवस्था हिंदू धर्म के विकास में बड़ी बाधा बनी।


हिंदू धर्म के विकास में जो सबसे बड़ी बाधा आई वो थी हिंदू राष्ट्रवाद की कल्पना। इस सूत्र ने हिंदू धर्म को हिंदुस्तान के दायरे में समेटना शुरू कर दिया। हिंदुस्तान से बाहर हिंदू धर्म के विकास को इस सूत्र से घातक चोट पहुंची। ये सूत्र वेद के सिद्धांतों के प्रतिकूल भी है। ऋषियों का दर्शन था विश्वमानुष:। अथर्ववेद में पृथ्वीसूक्त आया है। पुत्रोअहं पृथिव्या:- हम पृथ्वी के पुत्र हैं। नाना धर्माणां पृथ्वीं विवाचसं-जिस पृथ्वी में अनेक धर्म हैं, अनेक वाणियां-भाषाएं हैं उस पृथ्वी की हम वंदना करते हैं। यह भावना थी। ये भावना पूरी पृथ्वी पर हिंदू धर्म के विकास के लिए थी लेकिन, बाद के दिनों में आए हिंदू राष्ट्रवाद के सूत्र ने वेद भावना को आहत किया। आज भारत में मुसलमानों, इसाइयों की बड़ी आबादी है। ये धर्म भारत में बाहर के देशों से आए और भारतीय समाज को अपनाकर पूरी तरह से भारतीय हो गए। लेकिन भारत से बाहर दूसरे किसी भी देश में बसे हिंदुओं को आज भी भारत से जोड़कर ही देखा जाता है। तो हिंदू राष्ट्रवाद ने हिंदू धर्म का जितना नुकसान किया उतना तो उन लोगों ने भी नहीं किया होगा जिन पर हिंदू धर्म पर आक्रमण के आरोप लगते रहे हैं।

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