हिन्दी के महान काव्य-तपस्वी थे ‘रुद्र’ और ‘वियोगी

हिन्दी के महान काव्य-तपस्वी थे ‘रुद्र’ और ‘वियोगी’,
अंग्रेजों को भयभीत कर रखा था मनोरंजन बाबू की ‘फिरंगिया’ ने /
जयंती पर साहित्य सम्मेलन में तीनों साहित्यिक विभूतियों को दी गई काव्यांजलि ।

पटना, २ नवम्बर। हिन्दी काव्य के महान तपस्वी थे ‘रुद्र’ और ‘वियोगी’ । मोक्षभूमि गया के ये दोनों काव्य-पुरुष, पं मोहन लाल महतो ‘वियोगी’ और छंदों के मर्म-स्पर्शी गीतकार रामगोपाल शर्मा ‘रुद्र’ हिन्दी साहित्य की धरोहर हैं। ‘वियोगी जी आधुनिक हिन्दी साहित्य के निर्माताओं में से एक और बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों में अग्र-पांक्तेय हैं। उनकी साहित्यिक-प्रतिभा, अद्भुत काव्य-कल्पनाएँ और विपुल-लेखन अचंभित करते हैं।


यह बातें बुधवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, आयोजित जयंती-समारोह एवं कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, गद्य और पद्य पर समान अधिकार से लिखने वाले और साहित्य की सभी विधाओं को समृद्ध करने वाले वियोगी जी ने अपने विपुल साहित्य में, मानव-जीवन को मूल्यवान बनाने के अमूल्य सूत्र दिए हैं। उन पर वैदिक-साहित्य का गहरा प्रभाव था। वहीं रुद्र जी मनुष्य के कोमलतम भावों और अंतर्द्वंद्वों के मर्मस्पर्शी चित्रकार थे। वे तन-मन से कवि थे। उनको पढ़ना गीत की अभिराम-यात्रा की भाँति सुखद है।
उन्होंने भोजपुरी और हिन्दी के यशस्वी कवि आचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा को स्मरण करते हुए कहा कि, जिस प्रकार बाबू रघुवीर नारायण की एक रचना ‘बटोहिया’ ने उन्हें हिन्दी साहित्य में अमर कर दिया, उसी प्रकार उनका गीत ‘फिरंगिया’ ने उन्हें स्थायी यश प्रदान किया। भोजपुरी में लिखा गया मनोरंजन बाबू का यह गीत, स्वतंत्रता आंदोलन में, पूर्वांचल के क्रांतिकारियों का मंत्र बन गया था। इस गीत ने अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न कर दिया था। इस गीत पर पाबंदी लगा दी गई थी।
समारोह के मुख्यअतिथि और बिहार के पुलिस महानिदेशक आलोक राज ने कहा कि मनोरंजन बाबू को ‘फिरंगिया’ से अवश्य ही पहचान बनी, जो गीत स्वतंत्रता-आंदोलन के क्रांतिकारियों को प्रेरणा देता रहा, किंतु उन्हें सर्वाधिक ख्याति बाबू कुँवर सिंह पर लिखी उनकी अमर रचना से मिली।
सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, वरिष्ठ कवि और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी बच्चा ठाकुर, डा वीरेंद्र कुमार दत्त, डा बी एन विश्वकर्मा, ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चर्चित कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने अपने एक मधुर गीत से किया। उनके पश्चात कविता की ऐसी धारा फूटी कि, अंधेरा गहराने तक कविगण और श्रोता उसमें डूबते उतराते रहे।
वरिष्ठ शायरा तलत परवीन, सागरिका राय, डा शालिनी पांडेय, जय प्रकाश पुजारी, अर्जुन प्रसाद सिंह,श्याम बिहारी प्रभाकर, अजीत कुमार भारती, डा महेश राय, अंकेश कुमार, बेबी यादव, अमरेन्द्र कुमार सिंह आदि कवियों ने भी अपनी रचनाओं से कवि-सम्मेलन को सार्थक किया। मंच का संचालन कवि सुनील कुमार दूबे ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
राज कुमार चौबे, डा महफ़ूज़ रहमान, अशोक कुमार सिंह, डौली कुमार, डा कुमारी लूसी, सच्चिदानंद शर्मा, चंद्रशेखर आजाद, रामाशीष ठाकुर,यशस्वी कांत, दिनेश वर्मा दुःख दमन सिंह समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।

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