हिंदी तलवार से नहीं बल्कि प्रेम से प्रसार पायेगी

पटना: हिन्दी कानून से नहीं, और न तलवार से हीं, पूरे देश में लागू नही की जा सकती। यह प्रेम से और इसकी अपनी शक्ति से भारत में आदर पाएगी।

हिन्दी संतों की भाषा है। प्रेम की भाषा है। एक अत्यंत समर्थ भाषा है। हिन्दी के चतुर्दिक विकास के लिए हिन्दी-सेवियों और शासन में दृढ इच्छा शक्ति आवश्यक है।

यह विचार आज यहाँ साहित्य सम्मेलन द्वारा हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित, ‘राजभाषा हिन्दी पखवारा’ का उद्घाटन करते हुए, त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथा वरिष्ठ साहित्यकार प्रो सिद्धेश्वर प्रसाद ने व्यक्त किए। प्रो प्रसाद ने कहा कि, हिन्दी को लेकर देश के महान चिंतक और महापुरुषों ने स्वतंत्रता से पूर्व और उसके पश्चात भी चिंतनशील और प्रयत्नशील रहे, उनमें उत्तर और दक्षिण के साहित्यसेवी, विचारक और नेतागण शामिल हैं।
आज हीं ‘राष्ट्र-भाषा-प्रहरी’ की उपाधि से विभूषित साहित्य-सेवी तथा सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेन्द्रनाथ गुप्त तथा कवि रवि घोष का, उनके 83वें जन्म-दिवस पर, वंदन-वस्त्र व पुष्प-हार पदान कर सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ द्वारा अभिनंदन किया गया।

अपने अध्यक्षीय उद्गार में, डा सुलभ ने कहा कि, 14 सितम्बर 1949 को, हिन्दी को सरकार के कामकाज की भाषा, अर्थात ‘राजभाषा’ के रूप में सिंहासनारुढ तो अवश्य किया गया, जिसके लिए हम तब से खुशियाँ और उत्सव मनाते आ रहे हैं, किंतु उसीमें शर्त रखकर इसे पुनः बेड़ियों में जकड़ दिया गया। सिंहासनारुढ होकर भी वह आज तक सिंहासन से बँधी हुई है और उसे वह अधिकार भारत की सरकार ने अब तक नहीं दिया, जिसकी यह अधिकारिणी है।

डा सुलभ ने कहा कि सरकार की उदासीनता या राजनैतिक विवशता के कारण उपेक्षिता होकर भी, हिन्दी अपनी शक्ति और उर्जा के कारण, संपूर्ण भारत वर्ष में हीं नहीं अपितु निखिल विश्व में द्रुत गति से बढ रही है और प्रतिष्ठा भी पा रही है। हिन्दी दिवस हमें सदा इस बात का स्मरण दिलाता रहता है कि, हमारे हा्थ विदेशियों ने नहीं, हमारे अपने लोगों ने हीं बांध रखे हैं।

विश्वविद्यालय सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष तथा वरिष्ठ साहित्यकार, प्रो शशिशेखर तिवारी ने कहा कि, आज साहित्य सम्मेलन का शुभ दिन है। इस राष्ट्रीय संस्था ने हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रसार में अपने लगभग सौ वर्षों की साधना और संघर्ष का आलोक-स्तंभ है। हिन्दी के विकास के लिए हमें भारत की अन्य भाषाओं को उचित सम्मान देते हुए, उनके भी विकास का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।
सम्मेलन के प्रधानमंत्री आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने कहा कि वह दिन अब अतीत के हो गए जब हिन्दी के लिए आंदोलन किया जाता था। अब हिन्दी स्वयं इतनी सम्रर्थ हो गयी है कि, उसका संसार में उसका बोलबाला है।

इस अवसर पर प्रसिद्ध समालोचक डा खगेन्द्र ठाकुर, पं शिवदत्त मिश्र, डा शंकर प्रसाद, डा शिववंश पाण्डेय, राजीव कुमार सिंह परिमलेन्दु, प्रो वासुकी नाथ झा, बलभद्र कल्याण, जनार्दन प्रसाद द्विवेदी, डा कल्याणी कुसुम सिंह, बच्चा ठाकुर, अशोक वर्द्धन, डा उपेन्द्र राय, कृष्णकांत शर्मा, राम गोपाल अग्रवाल ‘नूतन’ तथा डा वीरेन्द्र कुमार यादव ने भी अपने उद्गार व्यक्त किये। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रबंध मंत्री कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
इस अवसर पर कवि आरपी, दिनेश दिवाकर, आचार्य पांचु राम, सागरिका राय, शंकर शरण मधुकर, आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, कवयित्री शालिनी पाण्डेय, डा अर्चना त्रिपाठी, ई चंद्रदीप प्रसाद, आनंद किशोर मिश्र, मोहम्मद सुलेमान तथा आनद मोहन झा समेत बड़ी संख्या में साहित्य-सेवी व प्रबुद्ध जन उपस्थित थे। आरंभ में, स्टुडेन्ट्स फ़्रेन्ड प्रकाशन के निदेशक भोला जी तथा संजीव कुमार ने अंग-वस्त्रम तथा पुष्प-गुच्छ भेंट कर अतिथियों का स्वागत किया।

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