बुखारी का ऑफर ठुकरा कर केजरीवाल ने नजीर पेश की

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर का कहना है कि  भारत की राजनीति में संभवतः ऐसा पहली बार हुआ है जब  जामा मस्जिद के शाही इमाम के समर्थन का आॅफर ठुकरा कर आम आदमी पार्टी ने मिसाल कायम किया है.bukhari

इस तरह उसने देश की राजनीति में नई मिसाल कायम की है। उम्मीद है कि इससे अन्य राजनीतिक दल भी सबक लेंगे।
शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने दिल्ली के मुसलमानों से आज अपील की थी कि वे आम आदमी पार्टी का समर्थन करें। आम आदमी पार्टी ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की। और वह भी ऐसी-वैसी प्रतिक्रिया नहीं। एक असामान्य प्रतिक्रिया। ‘आप’ ने कहा कि जो व्यक्ति अपने बेटे की दस्तारबंदी में अपने देश के प्रधानमंत्री को बुलाकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आमंत्रित करे, उसका हमें साथ नहीं चाहिए।
‘आप’ ने यह भी कहा कि हम सभी तरह की सांप्रदायिकताओं के खिलाफ हैं और हम हर समुदाय के आम आदमी का समर्थन चाहते हैं। याद रहे कि शाही इमाम की अपील के बाद अक्सर दोनों पक्षों की विभाजनकारी ताकतें सक्रिय हो जाती हैं। याद रहे कि इस देश के प्रधानमंत्री भाजपा के हैं और आप का दिल्ली में भाजपा से कांटे का संघर्ष है।
‘आप’ ने भाजपा नेता श्री मोदी और प्रधानमंत्री श्री मोदी को अलग नजरों से देखा है। इस रुख से दिल्ली के मतदाताओं की नजर में ‘आप’ की इज्जत और भी बढ़ सकती है। यह राजनीतिक घटना इस देश के चुनावी इतिहास के ऐसे समय में हुई है, जब अधिकतर नेतागण वोट के लिए किसी भी तरह के तत्वों से सांठगांठ करने को तैयार रहते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो इस देश की प्रधानमंत्री की उपेक्षा करके पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आमंत्रित करे, वह किस मानसिकता का व्यक्ति होगा इसकी कल्पना मुश्किल नहीं है।
पर, कुछ नेताओं और राजनीतिक दलों की मदद से ऐसे व्यक्ति भी इस देश में फल-फूल रहे हैं।
आप ने उन्हें इस बार अच्छा खासा झटका दिया है। शाही इमाम समय-समय पर भिन्न-भिन्न दलों को वोट देने के लिए मुसलमानों से अपील करते रहते हैं। उस अपील का कितना असर होता है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में बुखारी ने भाजपा का समर्थन किया था। तब भाजपा हार गई थी।
2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस का समर्थन किया था। कांग्रेस की तो चुनाव में ऐतिहासिक दुर्दशा हुई।
बिहार में विधानसभा का चुनाव इसी साल होने वाला है। सभी समुदायों की अतिवादी शक्तियां हर चुनाव में सक्रिय हो जाती हैं। इस बार भी होंगीं। देखना है कि बिहार के राजनीतिक दल वैसी ताकतों के लपेटे में आकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में मदद करते हैं या ‘आप’ की संतुलित राह पर चलते हैं।

दैनिक भास्कर से साभार

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