70 साल में पहली बार सेना का राजनीतिकरण, खतरनाक दिशा

70 साल में पहली बार सेना का राजनीतिकरण, खतरनाक दिशा

अब तक भारतीय सेना की एक खासीयत थी कि सरकार किसी की हो, इससे उसे फर्क नहीं पड़ता था। वह अराजनीतिक थी। पहली बार सरकार की तरफ से जवाब दे रही सेना।

अब तक भारतीय सेना के बारे में यह स्थापित था कि वह राजनीति से दूर रहती है। सरकार किसी की हो, इससे उस पर फर्क नहीं पड़ता था। अब पहली बार देश देख रहा है कि अग्निपथ योजना का हर जगह विरोध हो रहा है। सारे विपक्षी दल, यहां तक की एनडीए सरकारों में शामिल गैरभाजपा दलों ने भी विरोध किया है। देश भर में सवाल उठ रहे हैं। पहली बार विपक्ष के विरोध के खिलाफ भारतीय सेना के प्रमुख सरकार का पक्ष रख रहे हैं। वे यहां तक कह रहे हैं कि योजना वापस नहीं होगी। सवाल है कि कल अगर सरकार ने योजना वापस ले ली तब? सेना की पुरानी बहाली प्रक्रिया को समाप्त कर ठेके पर बहाली का निर्णय भारत सरकार का है, सेना कैसे कह सकती है कि योजना वापस नहीं होगी।

सेना का राजनीति में दखल देना किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। इसीलिए इसका विभिन्न दलों, प्रतिष्ठित लोगों ने विरोध करते हुए चेताया है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और टीएमसी के उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने कहा- अग्निवीर योजना का बचाव करने के लिए सरकार के मंत्रियों को सामने आना चाहिए। सेना को इस विविदा में नहीं घसिटा जाना चाहिए। पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा-सेना के राजनीतिकरण के खतरनाक नतीजे हम पाकिस्तान में देख ही रहे हैं। जो बात कर्नल अनिल कह रहे हैं यही बात अमेरिका के जनरल मार्क मिलै ने कही थी जब ट्रंप सत्ता में बने रहने के लिये सेना का इस्तेमाल करना चाहता था। सशत्र सेनायें संविधान के लिये काम करती हैं कि व्यक्ति के लिये नहीं।

छात्र सत्यम सिन्हा ने सवाल उठाया कि अग्निवीर के रिटार होने पर उसे रोजगार दिया जाएगा, यह आश्वासन कोई सैनिक अधिकारी कैसे दे सकता है। आर्मी दूसरे संस्थानों के बारे में कैसे दावा कर सकती है। यह राजनीतिकरण नहीं तो क्या है। भरत राव ने कहा-पहली बार देश में सेना को किसी पॉलिटिकल स्कीम की मार्केटिंग के काम में लगाया गया है…सेना का राजनीतिकरण लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं। धीरे धीरे सभी लोकतांत्रिक संस्थायें अतिक्रमित होती जा रही है।

राजद ने कहा- 6 दिन से देश जल रहा है। प्रधानमंत्री इधर उधर रोड शो कर टाइमपास कर रहे हैं पर युवाओं को संबोधित नहीं रहे और ना ही शांति की अपील। पहली बार राजनीतिक और नीतिगत निर्णयों में सैन्य अफसरों को आगे कर के बुलवाया जा रहा है कि सब सही है! सेना में राजनीति का हस्तक्षेप ठीक नहीं!

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