97 साल के इस बुजुर्ग के हौसले को जान कर आप भी हो जायेंगे हैरान

-अर्थशास्त्र से एमए कर रहे हैं बरेली के रहनेवाले राजकुमार वैश
-1920 में हुआ था बरेली यूपी में जन्म, तीस सालों से पटना में ही रहते हैं
पटना
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97 साल के इस बुजुर्ग के हौसले को जान कर आप भी हो जायेंगे हैरान

राजेंद्र नगर रोड नंबर पांच में रहने वाले राजकुमार वैश का हौसला ऐसा है जिसे जानकर अच्छे अच्छे पानी मांगने लगेंगे. 97 साल की उम्र में उन्हें एमए करने का जुनून है. नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी से वे प्रथम वर्ष की परीक्षा पास कर अभी दूसरे साल की परीक्षा दे रहे हैं. जिस उम्र में लोग खुद को ईश्वर और परिवार के भरोसे छोड़ देते हैं वे लगातार तीन घंटे तक नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी में लकड़ी की कुर्सियाें और बेंच पर अर्थशास्त्र की नीतियों पर लंबा लेख लिखते हैं. इस दौरान हड्डियां जवाब देने लगती है लेकिन वे ना केवल वस्तुनिष्ठ प्रश्न को हल कर रहे हैं बल्कि दीर्घ उत्तर प्रश्नाें को भी अपने दीर्घजीवी उम्र में करारा जवाब दे रहे हैं. वे कहते हैं कि मैंने सोचा कि लोगों को दिखाया जाये कि वृद्ध भी कुछ कर सकते हैं. युवाओं को भी बता रहा हूं कि कभी हार नहीं माननी चाहिए. मौके और अवसर हर वक्त रहते हैं केवल खुद पर विश्वास होना चाहिए.
बेटे बहू ने की मदद और आकांक्षा पूरी होने लगी
एमए पास करने का यह सिलसिला केवल दो साल पहले शुरू हुआ. उम्र के चौथे पड़ाव में वे भारत की अर्थनीति पर लगातार सवाल उठाते थे. सोचा क्यों ना कुछ और पढ़ा जाये? अपने तर्कों को कुछ और धार मिलेगी. अपने दिल की बात उन्होंने बेटे और बहू से शेयर की. बेटे प्रो संतोष कुमार और बहू भारती एस कुमार, दोनों पटना यूनिवर्सिटी से रिटायर हो चुके हैं, ने जब उनकी दिल की इच्छा सुनी तो बहू एक दिन गांधी मैदान के पास स्थित बिस्कोमान भवन में चली गयी और उनका एडमिशन कराने के बाद पाठ्य सामग्री घर लेकर पहुंच गयी. 2016 में उन्होंने अध्ययन करना शुरू किया. प्रो संतोष ने एक शिक्षक को भी उनकी मदद में लगा दिया. पहले साल की परीक्षा राजकुमार जी ने अच्छे नंबरों से पास किया और अभी दूसरे साल की परीक्षा दे रहे हैं. बेटे उन्हें रोज सुबह परीक्षा दिलवाने के लिए ले जाते हैं और वापस फिर घर लाते हैं.
1920 में जन्में वैश ने 1940 में कर लिया था एलएलबी
राजकुमार वैश जी का जन्म 1920 में बरेली, यूपी में हुआ था. मैट्रिक और इंटर की परीक्षा उन्होंने बरेली से ही क्रमश: 1934 और 1936 में पास किया. स्नातक आगरा यूनिवर्सिटी से 1938 में पास करने के बाद उन्होंने 1940 में एलएलबी कंप्लीट कर लिया. इसके बाद वकालत की प्रैक्टिस किया और खुद को सामाजिक कार्यों में झोंक दिया.
सामाजिक कार्यों में संघर्ष करने के बाद 1954 में वे बिहार आ गये. अविभाजित बिहार के कोडरमा स्थित डोमचांच में क्रिश्चियन माइका इंडस्ट्री में बतौर असिस्टेंट मैनेजर ज्वाइन कर लिया. इंडस्ट्री के मालिक उनके घर आते जाते थे और उन्होंने यह अवसर उन्हें प्रदान किया. यहां बेहतर माहौल में उन्होंने 27 साल तक काम किया. उनके बच्चे यहीं पले बढ़े और पटना यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की सेवा देने लगे. राजकुमार जी रिटायर हाेने के बाद कुछ दिनों तक बरेली में रहे, बच्चों को पढ़ाया लेकिन अब वे अपने बेटे और बहू के साथ निवास करते हैं. अभी अहले सुबह उठकर तैयार होना और आठ बजे नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी में परीक्षा देने जाना उनका रूटीन है. वे कहते हैं कि परेशानी तो होती है हड्डियां चुभती है लेकिन मैंने यूनिवर्सिटी से कोई भी सुविधा देने की गुजारिश नहीं की है, एमए पास कर जाऊं तो फिर सारी थकान दूर हो जायेगी.

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